युद्ध क्यों? : शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चर्चा प्रवर्तते

याद हो शायद आपको कि जब अटल जी ने लाहौर तक बस की यात्रा की थी और पाकिस्तान में कविता सुनाई थी कि “जंग न होने देंगे” और तत्कालीन वज़ीरे आज़म नवाज़ शरीफ़ साहब ने एक बंदिश जोड़ी थी कि “हम इस मज़ाकरात को बेरंग ना होने देंगे” तो तमाम दुनिया को अमन का इन्द्रधनुष दिखाई देने लगा था।

लेकिन संसद पर हमला, कारगिल पर कब्ज़े की कोशिश जैसे कई गद्दारियों का मौका पाकिस्तानी आर्मी और आतंकियों को मिल गया। शान्ति की परिभाषा देते हुए एक राजनयिक ने कहा था कि युद्ध की तैयारी के लिये मिले हुए समय को ही तो शान्ति कहते हैं और यह बात अक्षरशः सत्य है।

आचार्य चाणक्य के कथन का उल्लेख करके एक अनुभवी व आदरणीय ने कहा था कि देश के रूप में आपका शत्रु कौन है? तो इसका उत्तर है आपका पड़ोसी देश और आपका मित्र कौन है पड़ोसी देश का पड़ोसी। बड़ा सार छुपा है इस कथ्य में। अफ़गानिस्तान, इज़रायल और मंगोलिया के देश की मित्रता हमारे लिये क्यों ज़रूरी है ये आपको इस कथन के बाद आसानी से पता चल जायेगा।

एक चुटकुला शायद की बोझिल संवाद को शायद थोड़ा हल्का फुल्का बनाने में आपकी मदद कर दे। तो चुटकला यूँ है कि दो मित्र बात कर रहे थे कि ईसा मसीह बाइबिल में कहते हैं कि पड़ोसियों से प्यार करो और दुश्मनों से भी प्यार करो। अब सबको पता है कि प्यार तो बस एक से हो सकता है तो दो से प्यार कैसे किया जा सकता है?
तो दूसरे मित्र से समझाते हुए कहा कि भाई पड़ोसी और दुश्मन दो होते हीं कहाँ हैं ?
खैर ये चुटकुला भी आपको चाणक्य की कूट नीति की ओर हीं इंगित कर देगा।

भारत की वर्तमान सरकार का यह एयर स्ट्राइक शायद आतंक के खिलाफ़ भारत का अबतक का बेहतरीन कदम है। पाकिस्तानी सैन्य क्षमता और आम जनता ( सिविलियन ) को बगैर अपनी ज़द में लिये आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने की कोशिश के लिये आज नहीं तो कल पाकिस्तान कृतज्ञ होगा, कारण भारतीय वायुसेना ने अपनी एयरस्ट्राइक रूपी शल्यक्रिया से पाकिस्तानी किडनी के 300 से 400 पत्थर बाहर कर के थोड़ा रोगमुक्त ही किया है।

कश्मीर, चेचेन्या, सीरिया , यमन, ईराक – ईरान का मसला, सिया-सुन्नी-यज़ीदी समुदाय के सुलगते मसले, चीन के उइगर मुसलमानों का इलाका, रोहंग्या शरणार्थियों का प्रायोजित पलायन, यहूदी और फ़िलिस्तीनी समुदाय को बारी बारी संरक्षण देने का वैश्विक षडयंत्र वास्तव में पूँजीवादी – विकसित राष्ट्रों की लायसनिंग स्ट्रेटेजी का सक्रिय उदाहरण है।

विश्व के फ़ालतू उत्पादों में ये हथियार ही सबसे घटिया निर्मित सामग्री है जिसका कोई भी खरीददार स्वेच्छा से खरीदने नहीं आता और दुनिया का सबसे मँहगा उत्पाद है। मात्र युद्ध ही इसकी बिक्री का उचित मौका और माहौल है पर युद्ध को ज़्यादा दिन चलाने पर कीमती ग्राहकों की मौत भी संभव है और फिर उधार की रिकवरी भी संभव नहीं हो पायेगी।

पर आतंकवाद युद्ध रूप में एक नूरा कुश्ती है जो आतंकियों को किसी ज़ुनून के तहत हथियार खरीदने को विवश करता है और तब पीड़ित देश के लिये भी इसे खरीदना मज़बूरी हो जाती है , इसलिये अगर आतंकियों को हथियार को मुफ़्त में भी दे दिये जायें तो उस पीड़ित और त्रस्त संप्रभु देश की खरीदी से मुनाफ़ा आता रहता है।

और ये सब तभी संभव है जब एक शासक के रूप में हमारे प्रतिनिधि अपने देश की सीमा सुरक्षित नहीं रख पाते हैं। अंग्रेजों के पलायन के बाद उनकी दुरभिसंधियों के कारण भारत आज तक अपनी सीमा का निर्धारण नहीं कर पाया है। आचार्य चाणक्य लिखते हैं कि “शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चर्चा प्रवर्तते” जिसका अर्थ यह है कि अगर आपके देश की सीमाएँ शस्त्र द्वारा सुरक्षित हैं तभी आपको उस सुरक्षित राष्ट्र में शास्त्र चर्चा करने का अधिकार है।

पर आज के परिदृश्य में भारत को देखें तो आतंक के खिलाफ़ भारत के अत्यन्त सफल और कैलकुलेटेड प्रहार की निन्दा इमरान के बदले देश के सत्ताच्युत मेहरबान ज्यादा कर रहे हैं। वह काँग्रेस #saynotowar के समर्थन में खड़ी है जिसके पुरोधा नेहरू ने गोवा और पटेल ने हैदराबाद, जोधपुर, पटियाला को भारत मिलाने के लिये वहाँ की सत्ता को फूलों का गुच्छा नहीं थमाया होगा बल्कि लड़ कर ही मिलाया था और यह कहना बेवज़ह होगा कि वही तरीका ज़रूरी था और मुनासिब भी।

और वे साम्यवादी पार्टियाँ भी #saynotowar के हक में विधवा विलाप में संलग्न है जिनके आदर्श लेनिन, स्टालिन ख्रुश्चेव, चे ग्वेरा, फ़िदेल कास्त्रो, हो ची मिन्ह, माओ और डेन जियाओ पिंग हैं, जिन्होंने जितने गले कटवाये हैं उतनी बार अपने पैरों के नाखून भी नहीं काटे होंगे। भारत और नेपाल को छोड़ कर किसी भी देश में लाल सत्ता बगैर उस धरा के वहाँ के निवासियों के लहू से लाल हुए नहीं लाई जा सकी। और भारत और नेपाल ही दो देश हैं जहाँ सेक्यूलर नाम की संतानें सनातन की कोख से पैदा होती हैं वरना मुसलमानों के घर मुसलमान , ईसाइयों के घर ईसाई और यहूदी के घर यहूदी पैदा होते रहे हैं और रहेंगे भी पर हिन्दू माताओं की कोख से कुछ सेक्यूलर प्रजाति के जीव अवतरित होने लगे हैं। और जब तक ये सेक्यूलर प्रजाति भारत की भूमि पर साँसें ले रही हैं किसी मसूद अज़हर, हाफ़िज़ सईद या इमरान और ज़िया उल हक की ज़रूरत नहीं भारत के टुकड़े करने के लिये। केन्द्रीय विद्यालय के छात्र नेता गण ही बीफ़ पार्टी आयोजित करके भारतीय अस्मिता का चीर हरण करने के लिये काफ़ी हैं और उन्हें प्रेरणा देगा ये सेक्युलरिज़्म का एजेण्डा।

ये एजेण्डा इतना कारगर है कि आजकल कोर्ट भी होली में पानी के अपव्यय से चिन्तित है, दीवाली के पटाखे की वज़ह से बढ़ते प्रदूषण पर चिन्तित है पर कुरबानी के जानवरों के खून में गंगाजल की पवित्रता देख लेता है और नये साल के शोर शराबे में सन्नाटे और शान्ति को सुन लेता है।

पर ये सब इसी वज़ह से संभव है क्योंकि हमारी सीमा सुरक्षित नहीं है। अहिंसा के सन्दर्भ में दिया गया बुद्ध और महावीर के उपदेश सीमा के प्राचीरों को खोखला क्र रहे हैं, गान्धी का सत्याग्रह का तरीका भारत के टुकड़े करने वालों को बचाने का हथियार बन चुका है।

क्षमा वीर का भूषण है पर शौर्य उसकी प्रकृति। सदैव क्षमा का प्रयोग करने वाला वीर अपने शत्रुओं और निन्दकों के बीच कायर के नाम से ही चर्चित रहता है। सिंह अपनी आक्रामक प्रकृति के कारण ही मृगेन्द्र कहलाता है अन्यथा सूअर, साँड और भैंसा भी उससे ताकतवर होता है।

राजनीति कहती है कि सीमाओं पर सैन्य गतिविधियाँ सीमाओं को सुरक्षित रखती हैं और चीन इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है जिसका सीमा विवाद अपने हर पड़ोसी से है पर उसकी एक इंच भूमि भी विवादों में नहीं है और उसका प्रत्यक्ष कारण है सीमा पर उसके द्वारा प्रदर्शित उग्र गतिविधियाँ या कहें युद्ध का माहौल। आप सब जानते हैं कि इसी तेवर की वज़ह से डोकलाम पर भारत भी अपनी शर्त मनवा पाया।

सेना से सबूत माँगने वालों से सरकार न्यायिक तरीकों से निबटे। सेनाओं को बाढ़, भूकम्प और अन्य त्रासदियों के संकटमोचक की भूमिका से निकाले और उनसे शौर्य पूर्ण कार्य करवाये।

विंग कमाण्डर अभिनन्दन की वापसी में शत्रुपक्ष की उदारता के कण ढूँढ़ना एक मानवीय पहल कहा जा सकता है पर आपको नचिकेता और कालिया की याद तो होगी जिसमें पहला तो लौटा भी तो देर से पर दूसरा तो टुकड़ों में लौटा था। इस लिये इस सदाशयता प्रदर्शन के पीछे हमारे सैन्य बल के शौर्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

हितोपदेश में लिखा है कि ” विपत्काले विस्मय एव कापुरुष लक्षणम् ” मतलब विपत्ति काल में निराकरण की कोशिश के बदले कारण की विवेचना करना ही कायरता है।

और भर्तृहरि लिखते हैं कि
” निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्
अद्यैव मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्यायात् पथं प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥”

इसका सामान्य अर्थ है कि यदि आप धीर व्यक्ति हैं तो आपको अपने निर्णय पर अडिग रहना है चाहे कोई कुछ भी सोचे।

अगर हमारा पड़ोसी आतंकवादियों को भेज कर हमें प्रच्छन्न युद्ध की विभीषिका में संलिप्त करना चाहता है तो युद्ध के लिये सन्नद्ध रहना ही हमारी सर्वोचित नीति होनी चाहिये।

आगे क्या लिखूँ , बस कवि नरेन्द्र शर्मा की दो पक्तियाँ लिख कर अपनी बात खत्म करना चाहूँगा क्योंकि इन पंक्तियों में भरे भाव मेरे सैकड़ों शब्दों से ज्यादा भावों से सराबोर हैं।

कुछ भी बन बस कायर मत बन
ठोकर मार पटक मत माथा
तेरी राह रोकते पाहन
कुछ भी बन बस कायर मत बन ॥

“युद्धं देहि” कहे जब पामर
दे न दुहाई पीठ फेरकर
या तो जीत प्रीति के बल पर
या तेरा पथ चूमे तस्कर
प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है
पर कायरता अधिक अपावन
कुछ भी बन बस कायर मत बन॥
ले दे कर जीना क्या जीना
कब तक गम के आँसू पीना
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक खून पसीना
कुछ न करेगा किया करेगा
रे मनुष्य बस कातर क्रन्दन
कुछ भी बन बस कायर मत बन॥

तेरी रक्षा का न मोल है
पर तेरा मानव अमोल है
यह मिटता है वह बनता है
यही सत्य है यही तोल है
अर्पण कर सर्वश्व मनुज को
न कर दुष्ट को आत्मसमर्पण
कुछ भी बन बस कायर मत बन॥

तस्मात्युद्धस्वभारत

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