स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना आपका अधिकार, पर अपनी वास्तविक पहचान छुपाकर नहीं!

रवीश जी/ एनडीटीवी, आप लगातार अपील कर रहे हैं कि लोग दो महीने के लिए न्यूज़ चैनल देखना छोड़ दें।

सच तो यह है कि जब आपने देखा कि आप और आपके गिरोहों की साज़िशों और ज़हरीले बयानों के बावजूद सरकार और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है तो आपने ये पैंतरा अपनाया।

आपकी घबराहट बता रही है कि आपको भी यक़ीन है कि प्रधानमंत्री की व्यापक अपील है, आपको भी यक़ीन है कि आम लोग आप और आप जैसे सेलेक्टिव एजेंडा चलाने वाले बुद्धिजीवियों के झाँसे में नहीं आने वाले।

यह किसने हक़ दिया आपको कि आप अपनी तुलना में आम भारतीयों की सोच को कमतर मानें? निरीक्षण-परीक्षण-विश्लेषण की एकमेव मठाधीशी किसने आपको सौंपी? आपके आकाओं ने या आपके अंधानुयायियों ने?

आपकी बौद्धिक मठाधीशी बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली। आपकी पत्रकारीय निष्पक्ष चेतना तब कहाँ गई थी जब राडिया प्रकरण में तमाम पत्रकारों का नाम दलाली जैसे घिनौने काम के लिए उछला था?

मुझे तो नहीं याद कि आपने आज तक उनके विरुद्ध एक वक्तव्य भी दिया हो? आप स्वयं एक ही चैनल में एक ही मालिक के नीचे बीसियों सालों से काम करते हुए मलाई मार रहे हैं और दूसरों से अपील कर रहे हैं कि वह चैनल भी न देखे?

यह ब्रह्मज्ञान आपको कहाँ से आया कि आपके अलावा शेष सभी पत्रकार पत्रकारीय धर्म का निर्वाह नहीं कर रहे? क्या सरकार की नीतियों और निर्णयों का पूर्वाग्रह पूर्ण विरोध ही पत्रकारिता है? दुनिया के दूसरे मुल्कों में तो ऐसा नहीं होता? पत्रकारिता का धर्म राष्ट्रीय धर्म से बड़ा तो नहीं होता? सोचिए कि आपने कब राष्ट्रीय धर्म का निर्वाह किया और कब-कब उसे ठेस पहुँचाई?

आप ही क्यों नहीं छोड़ देते चैनल? यह निरंकुशता और अहंकार कितना घातक व अलोकतांत्रिक है कि मैं जो-जो करूँ वह सब सही, और बाक़ी जो करें वह सब ग़लत?

ज़रा सोचिए कि कितनी नफ़रत है आप में, सोचिए कि किस सीमा तक तानाशाह हैं आप कि आपको सहन नहीं हो रहा कि कोई चैनल सरकार की नीतियों और निर्णयों का समर्थन भी करे, सोचिए कि कितनी मरोड़ें आ रही हैं आपके पेट में कि क्यों बाक़ी चैनल आपकी तरह के अंधे व अतार्किक विरोध की ज़िद और जुनून में शामिल नहीं…?

आप अपने को लोकतंत्र का रक्षक कहते हैं, एक ऐसा रक्षक जो चुनकर आए प्रधानमंत्री और उन्हें चुनने वाले मतदाताओं को गालियाँ देना अपना परम पुनीत कर्त्तव्य मानता है। आप मानकर चल रहे हैं कि प्रधानमंत्री में विश्वास रखने वाले सभी भारतीय अंधभक्त हैं, आम मतदाता या दर्शक की समझ को कम करके आँकना आपका बौद्धिक अहंकार नहीं तो और क्या है? दूसरे शब्दों में यह आपकी कुंठा भी हो सकती है कि लोग आपको बौद्धिक क्यों नहीं मानते?

सच तो यह है रवीश जी, कि आज आप जैसे तमाम लोग वेश बदलकर अपना एजेंडा चला रहे हैं। इसलिए मैं निष्पक्ष नागरिकों से अपील करूँगा कि सावधान रहें, पत्रकारिता के नाम पर एजेंडा चलाने वाले पत्रकारों-बुद्धिजीवियों से सावधान रहें।

और हाँ, रवीश जी! स्वस्थ लोकतंत्र में आलोचना आपका अधिकार है, पर अपनी वास्तविक पहचान को छुपाकर नहीं। आप खुलकर सरकार की नीतियों और निर्णयों का विरोध कीजिए, पर स्वयं को निष्पक्ष पत्रकार का तमगा देना बंद कीजिए।

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