मूर्खों की स्वर्गनगरी में रहने वाले ही देख सकते हैं भारत विभाजन का दिवा-स्वप्न

समय-समय पर कुछ ऐसी पोस्ट या ट्वीट सामने आ जाती हैं जिसमें कुछ तथाकथित भारतीय और अधिकतर सीमा के पार बैठे लोग लिखते रहते हैं कि बस कश्मीर अब उनके हिस्से आया, तब उनके हिस्से आया।

मुझे याद है कि न्यू यॉर्क में वर्ष 2010 में मैं बाल कटाने गया था। वहां पर दो दाढ़ी वाले नऊव्वे खाली बैठे थे और आपस में बात कर रहे थे कि बस कश्मीर अब किसी भी समय आज़ाद होने वाला है।

उस बातचीत को सुनने के बाद मैं उस दुकान पर कभी वापस नहीं गया। उस समय सोनिया की कमज़ोर सरकार थी। लेकिन तब भी कश्मीर जहां था वहीं है।

इस लेख के जरिए मैं अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के तहत यह समझाने का प्रयास करूंगा कि किसी देश की सीमा में बदलाव या एक नया देश कैसे बनता है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में राज्यों (राष्ट्र) के मध्य आपसी संबंधों के तीन आधार है : राज्यों की संप्रभुता का सिद्धांत (यानी कि राज्य अपने निर्णय स्वयं लेगा); राज्यों की समानता का सिद्धांत; एक राज्य का दूसरे के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप न करने का सिद्धांत।

संयुक्त राष्ट्र का चार्टर या संविधान इन तीनों सिद्धांतों की पुष्टि प्रथम अध्याय में करता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो भी नए राष्ट्र अस्तित्व में आए हैं वे या तो औपनिवेशिक शासन से मुक्त हुए थे या फिर राष्ट्रों में आपसी सहमति के आधार पर विभाजन हुआ।

उदाहरण के लिए चेकोस्लोवाकिया को देख लीजिए। इसने शांतिपूर्वक निर्णय लिया कि चेक और स्लोवाकिया दोनों अलग अलग राष्ट्र बन जाएंगे।

या फिर गृह युद्ध या आर्थिक विपदा के कारण राष्ट्र टूट के बिखर गया और नए राज्यों ने जन्म लिया। इस कैटेगरी में सोवियत यूनियन (आर्थिक विपदा) और युगोस्लाविया (गृह युद्ध) के बिखराव से उत्पन्न हुए देशों को ले सकते हैं।

लेकिन किसी राष्ट्र से अलग होकर नया देश बनाने के उदाहरण बहुत ही कम है। ऐसा तभी संभव होता है जब मूल राज्य अपने विभाजन की अनुमति दे देता है। इस श्रेणी में सूडान से अलग होकर साउथ सूडान, इंडोनेशिया से अलग होकर तिमोर लेस्ते, और सर्बिया से अलग मोंटेनिग्रो राष्ट्रों को ले सकते हैं।

लेकिन बिना मूल राज्य की सहमति के एक नया राज्य नहीं बन सकता और ना ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसकी अनुमति देगा।

एशिया, अफ़्रीका और यूरोप के बहुत से देशों में कुछ क्षेत्र मूल राज्य के साथ नहीं रहना चाहते। लेकिन लाख प्रयासों के बाद भी किसी भी राज्य का विभाजन बिना उसकी अनुमति के नहीं हुआ है।

एक उदाहरण कोसोवो का भी ले सकते हैं। कोसोवो अभी भी कानूनी रूप से सर्बिया का हिस्सा माना जाता है। यद्यपि कोसोवो को करीब 115 देशों ने मान्यता दे दी है, तब भी कोसोवो को एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं मिला है क्योंकि सर्बिया इसकी अनुमति नहीं दे रहा है।

इज़रायल और फिलिस्तीन का उदाहरण सबसे प्रमुख है। संयुक्त राष्ट्र में ऐसे बहुत से प्रस्ताव पारित हुए जिसमें इज़रायल और फिलिस्तीन को अलग अलग राज्य के रूप में दर्जा देने की बात की गई है। लेकिन बिना इज़रायल की सहमति के यह संभव नहीं है।

अगर किसी को लगता है कि 130 करोड़ भारतीयों की इच्छा शक्ति के विपरीत जाकर भारत के किसी प्रांत को अलग राष्ट्र का दर्जा दिया जा सकता है तो वह मूर्खों की स्वर्गनगरी में रह रहा है।

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