कला का कोई मुल्क, कोई मज़हब नहीं होता, पर कलाकारों का तो होता है

‘कला का, संगीत का, मौसिकी का कोई मुल्क, कोई मज़हब नहीं होता’

चलो, एक बारगी मान भी ले कि नहीं होता, पर ये ध्यान रखिएगा कि ‘टैक्स’ ज़रूर होता है।

जब भी किसी भारतीय फिल्म के लिए भारतीय प्रोड्यूसर आतिफ असलम, राहत फतेह अली खान, शफ़ाक़त अमानत अली से गाना गवाता है या किसी फ़वाद खान, अली जफ़र से एक्टिंग करवाता है – तो दी गयी फीस पर इन कलाकारों को पाकिस्तान सरकार को टैक्स चुकाना पड़ता है।

ये टैक्स पाकिस्तानी सरकार से पाकिस्तान के राज्यों को जाता है, और एक खबर के अनुसार पाकिस्तानी पंजाब ने अपने बजट में एक हिस्सा (करोड़ों रुपए पढ़ें) आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के हाफ़िज़ सईद ‘साहब’ के जनता से चंदे लेने वाले चैरिटी संगठन जमात-उद-दावा (JuD) के लिए अलग रखा है। ऐसे ही कई मदरसों और सेमिनरी में जिहादियों को तैयार करने के लिए भी अलग बजट है।

[Pakistan’s Punjab Government allocates funds for JuD centre]

यहां ये भी याद रखिये कि टैक्स के पैसे ही से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI चलती है, जो भारत में अपने स्लीपर सेल भी चलाती है और वक़्त बेवक़्त भारत के शहरों में धमाके भी करवाती हैं (जो अब नहीं होते – आप जानते हैं कि क्यों नहीं होते)। बाकी, इसी टैक्स के पैसे से पाकिस्तानी सेना भी चलती है।

जब आप ‘संगीत कोई सरहद नहीं जानता’ का स्यापा चलाते हैं तो बस अपनी, अपने भारतीय भाई-बहनों और देश के वीर जवानों की मौत की प्लानिंग कर रहे होते हैं।

बाकी, इस देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की पूरी छूट है, और बेवकूफ बने रह कर आँखें मूंदने की भी।

कबूतर के आँखे बंद कर देने से बिल्ली नहीं भाग जाती।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY