अभिनंदन का आगमन, चोट है टुकड़े-टुकड़े गैंग की अभिलाषाओं पर

मोदी भक्त, आपिया, वामपंथी इत्यादि तो हम लोग सन् 2014 के बाद से कहलाने लगे हैं, उससे पहले तो आप, मैं हम सब आम नागरिक थे; आम भारतीय थे।

हम कहा करते थे कि क्रिकेट और राजनीति ऐसे सूत्र हैं जो इस देश को एकता में बांधे रखते हैं। मगर सारा देश 2014 से पहले किन किन विषयों पर एकसाथ ख़ुश हुआ है, अथवा जश्न मनाता था?

स्मरण कीजिये! आपको ऐसे कितने विषय ध्यान आते हैं?

वर्ष 2007 में क्रिकेट का टी 20 विश्वकप हम जीते थे, 2008 के ओलिम्पिक में सुशील कुमार , विजेंद्र सिंह और अभिनव बिंद्रा के पदकों ने आपके चेहरे पर मुस्कान लाई थी। 2009 में हमारी फ़िल्म स्लमडॉग करोड़पति ने ऑस्कर अवार्ड जीते थे। 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में 101 पदक जीते थे हमने, 2011 में हमारी क्रिकेट टीम ने विश्वकप जीता। 2012 में पुनः ओलिम्पिक में मेडलों की संख्या बढ़ गयी।

इसके बाद पागलपन सिर्फ मोदी लहर में नज़र आया था। आप ध्यान कीजिये 2014 से पहले अनेकों आतंकवादी हमले हुए, जिनमें देश एक साथ शोक मनाता था, मगर क्या देश ने एक साथ जश्न मनाया?

क्या आपकी पुरानी सरकार ने आपको जश्न मनाने का अवसर दिया?

राजनयिक स्तरों पर हमारा देश क्यों नहीं जश्न मना सका? क्यों बार बार आतंकवादी हमारे देश में घुस आते थे, और यहां हमले कर जाते थे? क्यों नहीं हम यह मान लेते कि उस समय हम कमज़ोर थे?

2014 के बाद से तीन सर्जिकल स्ट्राइक हुई हैं। 5 साल की कालावधि में तीन बार बदला लिया है हमने। कहने वाले यह कह सकते हैं कि कौन सा हमले रुक गए हैं? मगर वह पहले के समय मे घुसपैठ कर जाते थे, और हमारे नागरिक मार दिए जाते थे। अब हमारे नागरिक नहीं मरते। अब वो अंदर नहीं आ सकते; जैसे पहले हैदराबाद, दिल्ली, बैंगलोर और अहमदाबाद इत्यादि में ब्लास्ट करके जाते थे।

अब हम जवाब देने से चूकते नहीं हैं। जब हम पहले के वर्षों में देश की जीत का जश्न साथ मनाते थे, तो आप क्यों नहीं? क्या देश केवल क्रिकेट और बॉलीवुड तक सिमटा है?

क्या शत्रु राष्ट्र को घुटने टेकने पर मजबूर कर देना जीत नहीं है? क्या इस जीत को मनाना ग़लत है?

क्यों आप हमारी इस ख़ुशी में शामिल नहीं होते? केवल इसलिए कि यह ख़ुशी हमें भाजपा दे रही है? क्या आपके लिए जनता की ख़ुशी काफ़ी नहीं है?

हमारे विंग कमांडर ने शत्रु के लड़ाकू विमान को मार गिराया। एफ़ 16 विमान को उस विमान से मार गिराया, जिनकी तुलना संभव नहीं है। हम क्यों न उसके पराक्रम का जश्न मनाएं? क्यों हम दुश्मन को चित करने के समय में मैदान से भागें?

हमारा जांबाज़ उनके देश में था, शेरों की तरह रहा अब वह दो दिनों के भीतर लौट रहा है। वीरों का कोई क्षेत्र नहीं होता वे केवल राष्ट्र के गौरव होते हैं; यह आज देश की जनता बता रही है।

चेन्नई का जांबाज़ केवल चेन्नई का नहीं, सारे देश का है। उसकी वापसी के लिए पंजाब खुश है। दिल्ली में तैयारियां हो रही हैं। समाचार चैनल और हज़ारों की भीड़ वाघा बॉर्डर पर खड़ी है, अंधेरे में; बारिश शुरू हो चुकी है, फिर भी वो खड़ी है। राष्ट्र के सपूत के इंतज़ार में सुबह से सारा देश नज़रें जमाए बैठा है। क्या अभिनंदन ने देश को एक सूत्र में नहीं बाँधा?

क्या राजनीति देश को केवल तोड़ने के लिए होनी चहिये? आप जो 60 वर्षों में नहीं कर सके वो किसी अन्य ने 60 महीनों में कर दिया तो आपको जलन क्यों हो रही है? क्यों नहीं आप इंतज़ार कर सकते देश के हीरो का?

क्यों नहीं उसके स्वागत की तैयारियां कर सकते हैं?

अभिनंदन का आगमन, चोट है टुकड़े टुकड़े गैंग की अभिलाषाओं पर।
अभिनंदन का आगमन, सूत्र है देश की एकता और अखंडता का।

मुस्कुराइए! आपका हीरो शत्रु को बेबस करके लौट रहा है। यह जश्न का समय है। वामपंथी चंगुलों से बचिए, देश को सकारात्मक होने की आवश्यकता है, देश को गौरवान्वित होने की आवश्यकता है।

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