रंगभूमि के जिस कोने में भारत खड़ा है, वहाँ से युद्ध ही शांति की ओर जाने वाला एकमात्र मार्ग है!

ध्यान से देखिये अटारी बॉर्डर पर कैप्टन अभिनंदन वर्धमान के स्वागत में जुटी इस भीड़ को, यह वह भीड़ है जिसमें शामिल हर व्यक्ति का सीना 56 इंच का है। विश्वास कीजिये, 56 इंच के सीनों की इसी भीड़ के बल पर देश के प्रधानमंत्री विश्व के सामने गरजते हैं। इसी भीड़ से शक्ति मिलती है उनको, और इसी भीड़ से शक्ति मिलती है उस योद्धा पायलट को, जो एक जंग लगे पुराने ‘मिग21’ से अत्याधुनिक F16 को उड़ा देता है।

चार दिन पहले तक गुमनाम रहे कमांडर आज देश के सबसे चर्चित व्यक्ति हैं। वे देश के करोड़ो युवाओं के आदर्श हो चुके हैं, देश के करोड़ो बुजुर्गों को उनमें अपना बेटा दिख रहा है। जाने कितनी लड़कियों के क्रश हो चुके हैं वे… जो युवा पीढ़ी कल तक मूछों को ओल्ड-फैशन कह रही थी, आज अभिनन्दन के मूछों की दीवानी हो गयी है। यह होता है नायकत्व…

तनिक सोचिये तो, एकाएक एक दिन में कोई व्यक्ति सवा अरब की जनसँख्या वाले देश का सबसे बड़ा नायक कैसे हो सकता है? पर मित्र! नायक ऐसे ही बनते हैं। जब कोई अभिमन्यु टूटे रथ के एक चक्के को ही शस्त्र बना कर द्रोण, कृप, दुर्योधन, कर्ण, दुशासन और अश्वस्थामा जैसे महायोद्धाओं के बीच कूद पड़ता है, तो अपने इस अदम्य साहस के कारण एक दिन में ही वह अपने पिता अर्जुन और मामा कृष्ण से बड़ा नायक बन जाता है।

जब कोई त्रैलोच्यवर्मन मात्र चार हजार योद्धाओं की सेना ले कर कुतुबुद्दीन ऐबक को पराजित करता है और उसके साम्राज्य के बीचोबीच कलिंजर दुर्ग में अपना भगवा ध्वज गाड़ता है, तो वह एक झटके में देश का नायक बन जाता है।

सन 1971 में जब कोई मेजर “कुलदीप सिंह चांदपुरी” मात्र एक सौ बीस राइफलधारी सैनिकों के साथ ही टैंक-तोप से सजी पूरी पाकिस्तानी फौज को रात भर रोक लेता है, तो रात भर में ही वह देश का सबसे बड़ा नायक बन कर उभरता है।

और जब कोई अभिनंदन शत्रु देश में बंदी होने के बाद भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहता है कि “मैं आपको कुछ नहीं बताऊंगा”, तो वह एक पंक्ति का संवाद ही उसे महानायक बना देता है। एलेक्जेंडर के समक्ष लौह-अर्गला में बंधे महाराज पुरु की उस ऐतिहासिक उक्ति को याद कीजिये, “मेरे साथ वही व्यवहार किया जाय जो एक विजयी राजा एक पराजित राजा के साथ करता है” कहने के पीछे जो आत्मविश्वास था, इक्कीसवीं सदी में उसी आत्मविश्वास का नाम अभिनंदन है। अभिनंदन वर्धमान मात्र एक सैनिक का नाम नहीं, भारतीय सेना के शौर्य की गौरवशाली परम्परा का नाम है।

अभिनंदन को पाकिस्तान ने तुरंत क्यों छोड़ दिया, यह एक राजनैतिक-कूटनीतिक मामला है। इसे देश की सरकार समझेगी, पर हमें यह समझना होगा कि यह युद्ध अभिनंदन के लिए नहीं था। यह युद्ध उन 45 बलिदानियों के लिए प्रारम्भ हुआ था जिन्हें पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद नें कायरतापूर्ण तरीके से मार दिया था। यह युद्ध पिछले तीस वर्षों में मारे गए उन हजारों सैनिकों के लिए प्रारम्भ हुआ था, जो पाकिस्तानी आतंकवाद के शिकार हुए हैं। यह युद्ध पाकिस्तान के विरुद्ध नहीं, हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों के विरुद्ध शुरू हुआ था। यह युद्ध उस आतंकवादी मानसिकता के विरुद्ध प्रारम्भ हुआ था जो हर हिन्दू को केवल इसलिए मार देना चाहती हैं क्योंकि वे हिन्दू हैं, काफिर हैं। जबतक आतंकवाद है, जबतक मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकवादी लोग हैं, जबतक जेहाद की आतंकवादी मानसिकता है, तबतक यह युद्ध समाप्त नहीं हो सकता… हम चुप हो जाँय तब भी वे चुप नहीं बैठेंगे।

कुछ धूर्त कह रहे हैं कि इमरान खान ने शांति का संदेश भेजा है, अब युद्ध नहीं होना चाहिए। क्या वे धूर्त इस राष्ट्र को यह विश्वास दिलाएंगे कि अब कोई “सुअर कश्मीरी” भारतीय सैनिकों के काफिले पर आत्मघाती आक्रमण नहीं करेगा? क्या वे लोग देश को यह विश्वास दिला सकते हैं कि अब कोई “आमिर अजमल कसाब” किसी होटल के कमरे में सो रहे निर्दोष लोगों पर गोलियां नहीं बरसायेगा? जबतक राष्ट्र को यह भरोसा नहीं दिलाया जाता तबतक शांति की बात गद्दारी है।

माथे पर सिंदूर लगा लेने से कोई वेश्या पतिव्रता नहीं हो जाती, पाकिस्तान द्वारा अभिनंदन जी को मुक्त करना शांति-प्रस्ताव नहीं है। जबतक पाकिस्तान की धरती पर आतंकवादी कैम्प हैं, जबतक हाफिज और मसूद जैसे लोग वहाँ स्वतन्त्र घूम रहे हैं, तबतक उसका हर शांति-प्रस्ताव एक छल है। आज राष्ट्रकवि दिनकर की ये पंक्तियाँ ही सही मायने में राष्ट्र को दिशा दिखा सकती हैं-
ढीली करो धनुष की डोरी तरकस का कस खोलो,
किसने कहा युद्ध की वेला गयी शांति से बोलो?

रंगभूमि के जिस कोने में भारत खड़ा है, वहाँ से युद्ध ही शांति की ओर जाने वाला एकमात्र मार्ग है पार्थ! अन्य कोई मार्ग नहीं।

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