सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अब कुछ नए प्रश्न

मोदी साहेब… हाथ उठाकर आपको दिल से सैल्यूट! जब दिल दुखता है तो अंगारे उगलता हूँ और जब आपके किसी निर्णय से देश का भाल ऊंचा हो जाता है तो आपको सैल्यूट करना भी मेरा फ़र्ज़ है…

दिल खुश हो तो ठिठोली सूझती है… सो आज का दिन ठिठोली, हंसी-मज़ाक में गुज़रा… चुटकुले छोड़े और हंसगुल्ले उड़ाए!

मग़र अब वक्त है कि गंभीर चिंतन हो… उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढे जाएं, जो मेरे मस्तिष्क में उछल-कूद मचा रहे हैं…

44 शरीर टुकड़े-टुकड़े होकर आधा किलोमीटर क्षेत्र में फैल गए थे… 14 फरवरी को! पूरे उत्तर भारत में, हिंदी प्रदेशों में लोग तड़प उठे थे… हज़ारों लोग बिलख उठे… धरने-प्रदर्शन हुए… लोग सड़कों पर निकले… यह एक ज़िंदा और देशभक्त ‘कौम’ की पहचान है…

आज पाकिस्तान से भरपूर बदला लिया गया… लोग खुशी से नाच उठे… मग़र जो दु:ख में रोये नहीं थे… भावना शून्य थे… कुछ मन ही मन खुश भी थे… वही लोग आज खुश भी नहीं हुए… पाक को मुँहतोड़ जवाब पर उदासीन बने रहे… हमारी तरह जश्न में डूबे नहीं! उनकी पहचान खोलता हूँ, आपके सामने… लेकिन आप चौकेंगे ज़रूर…

30 करोड़ वह लोग… जो पाकिस्तान के टेस्ट मैच जीतने पर खुश होते थे… उनसे मुझे वैसे भी कोई उम्मीद नहीं रही… लेकिन… बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र जैसे जागरूक और राजनैतिक रूप से उत्तिष्ठत प्रदेशों में न पहले दुःख दिखा… न बदला पूरा होने पर कोई उत्साह!

जिन प्रदेशों में 96 साल के नेता के मरने पर 25 लोग आत्महत्या कर लेते हों… वहां देश के गौरव… अपमान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं! इन प्रदेशों की अधिकांश हिन्दू आबादी भी राष्ट्रीय शोक और राष्ट्रीय गौरव से निस्पृह और उदासीन क्यों? केरल, कर्नाटक, बंगाल के वह हिन्दू भी भावना शून्य रहे, जो PFI जैसे जेहादियों की तलवार के नीचे हैं… क्यों?

यही नहीं… उत्तर भारत के उन तथाकथित हिन्दू नामधारियों में भी राष्ट्रीय गौरव और राष्ट्रीय शोक को लेकर एक हिकारत की भावना पायी जाने लगी है… जो जातियां… भारतीय संविधान की रक्षा और संविधान के लिए खून की होली खेलने के दावे करती हैं… इनका प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियां और इनके संगठनों में 44 सैनिकों के बलिदान पर कोई खास रंज दिखाई नहीं पड़ा था! न आज के राष्ट्रीय गौरव वाले दिन उनमें कोई आह्लाद दिखाई दिया!

आप सहमत हो या नहीं…. मेरा मानना है कि जिनको स्पेशल दर्जा मिलता है, अलग से सुविधायें मिलती हैं, जिनके लिए अलग कानून बनते हैं… वे लोग खुद को स्पेशल समझने लगते हैं… उन्हें लगता है कि उन्हें राष्ट्र की ज़रूरत नहीं… अपितु राष्ट्र को इन जातियों… मज़हबों की ज़रूरत है!

हालांकि बलिदान देने वालों में इन जातियों के भी जवानों ने बलिदान किये हैं… मगर सामूहिकता और जातीय आधार पर देश के प्रति मुझे इन लोगों में सामान्यतया कोई खास लगाव दिखाई नहीं दिया! अनेक लोग सनातन-हिंदुत्व से नफरत करते-करते… देश की आत्मा से नफरत करने लगते हैं…

यह राष्ट्र के बिखरने के लक्षण होते हैं…

जय श्रीराम… वंदेमातरम…

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