बाकी उपलब्धियों के अलावा सबसे बड़ी उपलब्धि है लकीर खींचना

वो किस स्तर का राजनीतिज्ञ है ये समझना हो तो ज़रा बीते दो-चार दिनों पर ही नज़र डाल लीजिये।

जब वो कुम्भ में डुबकी लगा रहे होंगे तब क्या उन्हें पता नहीं होगा कि वायुसेना क्या करने वाली है?

जब वो सफाईकर्मियों के पांव धोने में जुटे थे तब पता नहीं होगा क्या?

जब सेना के हुतात्मा वीरों के स्मारक के उद्घाटन में लगे थे, पता तो उस समय भी ज़रूर होगा न?

इन सारी हरकतों से लोगों का ध्यान भटका कर, शेखुलरों को छाती कूट कुहर्रम मचाने छोड़कर वो आराम से अपना काम कर निकले!

भारतीय व्यवस्था में शांति काल में, इस किस्म की कार्रवाई का आदेश सीधा प्रधानमंत्री ने दिया होगा।

ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने इस किस्म की हरकत कोई पहली बार की है। ये आदमी जैसे ही राजनीति से विरोधियों का ध्यान भटकाता है, उस समय कोई बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक तो दागता ही है।

इस पांच साल के कार्यकाल में उनकी बाकी उपलब्धियों के अलावा जो एक सबसे बड़ी उपलब्धि रही है वो है लकीर खींचना। उसके कुछ करने और कभी कभी कुछ नहीं करने से विभाजन स्पष्ट हो गया है।

पहले आयातित विचारधारा वाले अपने ‘वर्गशत्रु’ को पहचानते थे मगर हम हमलावरों को देख ही नहीं पाते थे। कोई प्रोफेसर के वेष में था, कोई जज, कोई पत्रकार बना हुआ था। नाटक मण्डली से लेकर फिल्मों तक में गिरोह वेष बदलकर शामिल था।

जनता ने उन्हें पहचान लिया है। सिर्फ पहचान ही नहीं लिया बल्कि जनता अब खदेड़कर इन अभिजात्यों से पूछने लगी है, ‘हाउ इज़ द खौफ?’

ये असहिष्णुता अब उन्हें रास नहीं आती। वो अब जबरन उस गांधी के विचार जनता पर थोपना चाहते हैं जिसकी मूर्तियाँ वो लगातार तोड़ते रहे। जिसके विचारों से उन्हें कल तक जातिवाद और हिंदुत्व की बू आती थी, अब उसकी अहिंसा वो लोगों को याद दिलाते हैं।

वो कहते हैं कि आत्मरक्षा का अपना कानूनी अधिकार इस्तेमाल मत करो! अगर मैं तुम्हें एक जूता मारूं तो तुम मुझसे दूसरा जूता उतारने का निवेदन करो! अफ़सोस कि जनता उन्हें एक के बदले पलट कर सौ-सौ जूते मारती है।

कल तक अभिजात्य को ढूंढ कर अख़बारों में पढ़ा जाता था, क्या लिखेगा वो इस पर? लोग टीवी पहले से चलाकर बैठते थे कि क्या बोलेंगे वो इस मुद्दे पर। जनता आज उन्हें छोड़कर आगे बढ़ गयी है। उनका तुगलकी फरमान कोई सुनता ही नहीं, लोग पहले से अंदाज़ लगा चुके होते हैं।

जनता जानती है कि कल जो पूछ रहे थे कि छप्पन इंची कहाँ हैं? वो आज कहेंगे युद्धोन्माद ठीक नहीं, शांति को एक मौका मिलना चाहिए।

सवाल ये है कि 1947 से हम कर क्या रहे हैं? क्या शांति को दिए गए इतने मौके काफी नहीं? कब तक हम सफ़ेद कपोत उड़ाते रहें और वो उन्हें भुनकर अपनी स्कॉच का बाइटिंग (चखना) बनाता रहे?

सिर्फ प्रतिक्रिया करने के लिए उनके हमले का इन्तज़ार करना हमने छोड़ दिया तो इसमें कुछ गलत नहीं लगता। हमलावरों को ही नहीं, उन्हें बहनोई माने बैठी जमात को भी समझना होगा कि उनका सूरज ढल चुका है। भारत बदल चुका है और यहाँ की जनता में एक बड़ा वर्ग युवाओं का है।

साधारण सिद्धांतों से चलें तो कला-साहित्य जैसे सृजनात्मक काम शांति के दौर में ही होते हैं। पहले युवाओं को शांति स्थापित कर लेने दीजिये, उसके बाद शांतिपूर्ण माहौल में अपना रचनाकर्म कीजियेगा।

बाकी आज सुबह जब सोकर उठे तो पटना में हल्की बारिश हो रही थी, कुछ बिजलियाँ भी कड़की। बादलों के गरजने से हमें याद आया कि हमारे पड़ोसी मुल्क के आतंकी और उनके भारत में रहने वाले साले-सालियों को ऐसी आवाज़ों के डर से नींद ही नहीं आई हो कहीं ऐसा तो नहीं? पूछना बनता है जानेमन! बताओ, बताओ! हाउ इज़ द खौफ़?

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY