तथाकथित लौह-महिला ही स्ट्राइक कर रही थीं, सेना और वायुसेना तो खा रही थीं समोसे

आज सिंधु में ज्वार उठा है, नगपति फिर ललकार उठा है
कुरुक्षेत्र के कण-कण से पांचजन्य फिर हुंकार उठा है।

भारतरत्न अटलबिहारी वाजपेयी

यह देश अद्भुत है। यहां के विपक्षी दल न जाने किस बीमारी से व्याप्त हैं। जब पुलवामा पर कायराना हमला हुआ, तो वहां भी राजनीति के ओछे प्रदर्शन से बाज नहीं आए।

कोई पीएम की छाती नापने लगा तो कोई आतंक की नर्सरी रहे देश की ही भाषा बोलने लगा। सब एक सुर में हुआं-हुआं करने लगे कि यह तो नेतृत्व की असफलता है, पीएम क्या कर रहे हैं, आखिर बदला कब लिया जाएगा।

उसके बाद जब आतंकियों की धरपकड़ हुई, 100 घंटे के अंदर जैश के रणनीतिकार को सेना ने जहन्नुम रसीद किया, कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की धरपकड़ हुई तो फिर से ओछी राजनीति शुरू।

दिनों का हिसाब मांगने लगे लोग, घंटों का गणित लगाने लगे – कुछ हो क्यों नहीं रहा है? नेतृत्व को कठघरे में रखा जाने लगा, जबकि हमारे मज़बूत प्रधानमंत्री तो हर पल तैयारी में लगे थे, पूरा नेतृत्व और सशस्त्र बल तैयारी में लगे थे।

कल सुबह पूरा देश जश्न और जोश के मूड में था, तब भी ये महामिलावटी लोग बाज नहीं आए। निस्संदेह, यह हमारे वीर पायलटों की जांबाज़ी और शौर्य का नतीजा था, लेकिन जब तक एक सशक्त नेतृत्व न हो, तो वे वीर भी कितने बेबस होते हैं, यह सभी जानते हैं।

आज भी मजबूरी में सभी विपक्षी दलों के नेताओं ने इंडियन एय़रफोर्स को तो सलाम किया, लेकिन पीएम मोदी को गलती से भी बधाई नहीं दी।

मतलब, इतने दोहरेपन की तो हद ही नहीं है। पुलवामा पर कायराना हमला हुआ, तो पीएम दोषी, लेकिन आज जब हमने बदला लिया तो घनघोर चुप्पी।

आज तक 1971 की जीत का श्रेय खानदान की नेत्री को दिया जाता है, मतलब उस समय क्या हमारी सेना और वायुसेना समोसे खा रही थीं और तथाकथित लौह-महिला ही स्ट्राइक कर रही थीं।

शर्म को भी आज शर्म आ गयी होगी।

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