भावुकता कहीं बदल न दे भारत के पाकिस्तान व आतंकवाद से युद्ध का नैरेटिव

भारत पाकिस्तान के बीच भले ही युद्ध घोषित न हुआ हो लेकिन यह युद्ध ही है।

इसलिये किस को पाकिस्तान ने पकड़ा और उसका क्या होगा, इसको लेकर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखिये। इसी के साथ उनकी सुरक्षा व सकुशल वापसी की चिंता को लेकर, सोशल मीडिया पर अपने अभिव्यक्ति पर भी विराम लगाएं।

हम एक ऐसे युद्ध में हैं जहां भारत का शत्रु सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं है बल्कि उसकी एक बड़ी संख्या में भारत में ही स्थित है जो मीडिया व सोशल मीडिया पर बड़ा प्रभावशाली है।

इस वक्त जिस युद्ध में भारत लगा हुआ है वह एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर आ चुका है जहां आपके द्वारा, किसी उस भावना का उद्गार व्यक्त करना, शत्रुओं को मानवीय पक्ष वाला नैरेटिव स्थापित करने में सहायक हो, आत्मघाती होगा।

आज सुबह, जब से यह समाचार मिला है कि एक भारतीय पायलट पाकिस्तान के कब्जे में है तब से सोशल मीडिया पर उसको लेकर, और उसके सकुशल भारत वापस आने को लेकर चिंता ने एक स्थान बना लिया है।

भारतवासियों की इसी चिंता ने मुझे चिंतित कर दिया है क्योंकि मैं कुछ अनजाने चेहरों द्वारा पायलट को लेकर उसकी घर वापसी को, हो रही अन्य अतिमहत्वपूर्ण घटनाओं को नेपथ्य में करके, प्रमुखता दी जा रही है।

कल मुझ को इसको लेकर कोई आश्चर्य नहीं होगा जब राजदीप, बरखा, रविश जैसे लोग भारत के पाकिस्तान व आतंकवाद और अलगावाद से हो रहे युद्ध से ऊपर जाकर पायलट के सकुशल वापस भारत लाने को लेकर एजेंडा स्थापित कर दें।

यह सब भारत में पहले हो चुका है। त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (काठमांडू, नेपाल) से दिल्ली जाने वाली इंडियन एयरलाइंस फ्लाईट 814 का अपहरण करके कंधार ले जाया गया था। इस अपहरण का एक मात्र उद्देश्य, भारत की जेलों में बन्द आतंकवादियों को छुड़वाना था।

अपहरणकर्ताओं ने यह धमकी दी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गयी तो विमान के यात्रियों को एक एक कर के मार डालेंगे। वे अपनी मांगों के प्रति गम्भीर है इसके लिए उन्होंने हनीमून पर गए एक नव विवाहित रूपन कत्याल की हत्या भी कर दी जिससे पूरा भारत उद्वेलित और आक्रोशित हो गया था।

भारत में होना तो चाहिए था कि रूपन कत्याल की हत्या का बदला, भारत में बन्द आतंकवादियों को फांसी में चढ़ाये जाने की मांग उठती, लेकिन 24 घण्टे में टीवी कैमरे और माइक विमान के शेष 176 यात्रियों के घरों में घुस गए और उसके बाद पूरे भारत ने देखा कि लोग बिलख बिलख कर, भारत की सरकार से अपने परिवारजनों को सकुशल वापसी की गुहार कर रहे है।

टीवी चौबीसों घंटे लगातार यही दिखाता रहा और 48 घण्टे में, भारत में बन्द दुर्दांत आतंकवादियों को न छोड़ने के नैरेटिव से, अपहरण हुये यात्रियों की वापसी में बदल गया।

मीडिया की आवाज़ और मांग, भारत की आवाज़ और मांग बन गयी और अटलबिहारी वाजपेयी ने घुटने टेकते हुये, तीन इस्लामी आतंकवादियों – मुश्ताक अहमद जरगर, अहमद उमर सईद शेख़ (जिसे बाद में डेनियल पर्ल की हत्या के लिए गिरफ्तार कर लिया गया) और मौलाना मसूद अज़हर (जिसने बाद में जैश-ए-मुहम्मद की स्थापना की) को रिहा करना पड़ा था।

भारत द्वारा 31 दिसम्बर 1999 को किया गया समर्पण बड़ा भारी पड़ा है। हम सबने देखा है कि भारत को, भारत की जनता की भावुकता व संवेदनशीलता के चलते, भविष्य में बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ी है।

मैं समझता हूँ कि हमें कठोर बन कर युद्ध व शत्रु की विवेचना करना चाहिए और भावुकता में नैरेटिव बदले जाने के किसी पाप का सहभागी नहीं बनना चाहिए। मेरे लिए युद्ध में किसी भी मानवीय संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं है। मेरे लिए, युद्ध में भारत विजयी हो और उसके प्रति आसक्ति के अलावा कोई भी भावना अर्थहीन है। मेरे लिए युद्ध, जीवन व मृत्यु से परे की स्थिति है।

अतः मेरा एक बार फिर यही आग्रह रहेगा कि अपने विवेक को सिर्फ भारत केंद्रित रखिये, हम युद्ध में भागी बने अपनों के लिए शोक, विजयी होकर बाद में मना लेंगे।

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