भीख का कटोरा हाथ में पकड़े, लोन मांगते लोग हमलावर नहीं होते

अटल जी के राज में दो भीषण घटनाएं हुई थीं। एक कांधार हाईजैक, दूसरा संसद पर हमला।

दोनों घटनाओं पर अटल सरकार का रवैया / प्रतिक्रिया इतनी लचर – ढुलमुल थी जिसका हिसाब नहीं…

कुल मिला के अटल जी और उनका सुरक्षा सलाहकार वो बृजेश मिश्र, दोनों अंततः नाकाम ही साबित हुए।

संसद पर हमला हुआ तो अटल जी ने ऑपरेशन पराक्रम किया… सारी फौज उठा के बॉर्डर पर लगा दी… दो महीने फौज बॉर्डर पर खड़ी रही…

फिर उसके बाद क्या होना था, वही खाया पीया कुछ नहीं… गिलास तोड़ा – बारह आना। उस जमाने मे फ़ौज की Mobilization मात्र पर 2000 करोड़ रूपए खर्च हुए थे… फिर दो महीने बाद वापस बैरक्स में चली गयी…

NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) को कुछ पता नहीं था कि करना क्या है। मुशर्रफ की न्यूक्लियर बम की गीदड़ भभकियों में भड़कते रहे हम…

आज इस आक्रामकता का पूरा श्रेय जाता है मोदी और डोभाल की आक्रामक रक्षा नीति को, और कूटनीति को…

पिछले 5 साल की नरेंद्र मोदी की तैयारियों का परिणाम है कि आज भारत को पता है कि कहाँ वार करना है, कैसे घेरना है, कैसे अलग थलग करना है… और कहाँ ले जा के पटक पटक के मारना है…

आज मोदी ने पाकिस्तान को ऐसा घेर लिया है कि उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे, करे कि ना करे…

हमारी फौज पर हमला करने का कोई औचित्य है न औक़ात… उसी तरह सिविलियन ठिकानों पर भी हमला करने का कोई औचित्य नहीं… हमने तो आतंकी ठिकानों पर हमला किया, आओ बेटा… तुम कहाँ करोगे?

हमने तो preemptive strike की है आतंक पर, तुम कहाँ करोगे? अगर फौजी हमला करोगे तो All Out full Scale war शुरू करने का दोष आएगा… भीख का कटोरा हाथ मे पकड़े, लोन मांगते लोग हमलावर होते अच्छे नहीं लगते बेटा… युद्ध शुरू कर किस मुंह से लोन/ भीख मांगोगे?

पाकिस्तान के पास चुप मार के पड़े रहने के अलावा कोई चारा नहीं है।

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