मोदी ने इस गेम में दे दी उसे मात

एक गेम थ्योरी के द्वारा यह विश्लेषण करते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी कैसे हरे देश (देश का नाम नहीं लूँगा) – जो भारत में आतंकवादी भेजता रहता है और अपने देश में आतंकवादियों को शरण देता है – के व्यवहार को काबू में ला रहे हैं।

एक अमेरिकी अर्थशास्त्री थॉमस शेलिंग (Thomas Schelling), जिन्हे 2005 में अर्थशास्त्र के लिए नोबेल प्राइज़ मिला था, ने गेम ऑफ़ चिकेन के द्वारा दो पक्षों के मध्य किसी जटिल विषय पर समझौते की प्रक्रिया को समझाने का प्रयास किया था।

शेलिंग का मानना था कि किसी जटिल विषय को सुलझाने के लिए कुछ जोखिम उठाना पड़ता है।

गेम ऑफ़ चिकेन में दो व्यक्ति एक सड़क के दो छोर पर अपनी-अपनी कार में बैठते हैं और एक दूसरे की तरफ तेज स्पीड में कार ड्राइव करते हैं। अगर उनमें से एक ड्राइवर कार को किनारे नहीं करता तो कारों के बीच सीधे टक्कर होगी और दोनों कारों और ड्राइवरों को भारी नुकसान हो सकता है।

हरा देश यह मानता आया था कि भारत – जिसकी कार हर मायने में हरे देश की कार से बेहतर और मज़बूत है – अपनी कार को एक्सीडेंट और नुक़सान बचाने के लिए टक्कर से पहले ही रास्ते से हटा लेगा।

ऎसे समझिये कि हरा देश भारत में आतंकवादी भेज रहा है, उन आतंकवादियों को कवर देने के लिए सीमा पर गोले छोड़ रहा है और हमारे सैनिक ठिकाने पर हमला करवा रहा है।

अब भारत क्या करेगा? धमकी देगा कि हम यह कर देंगे, वह कर देंगे, कुछ कड़ी निंदा कर देंगे और अमेरिका के पास भागे-भागे चले जायेंगे कि देखिये ये हरा देश कितना ख़राब ड्राइवर है?

अगर हम उस देश की कार का मुकाबला करते तो टक्कर होने में किस तरह का नुकसान होगा?

सबसे पहले तो ‘इटैलियन’ (सर)कार को वोट खोने का नुकसान था क्योकि ‘डरे-सहमे’ लोग आतंकवादियों के विरुद्ध सेना के एक्शन से नाराज़ होकर उनको वोट ना देते।

दूसरी खरोंच मानवाधिकार संगठनों, एजेंडा वाले पत्रकारों और ‘बाएं हाथ’ वाले फ्रंट के नाखूनों से लगती जो आतंकवादी कार की पोलिश के समर्थन में सड़क पर आ जाते।

वे दंगा मचा देते, विदेशी अखबारों में एडिटोरियल छपवा देते कि कैसे भारत ने उन आतंकवादियो को नरसंहार करने से रोका? वे सब के सब यहाँ ‘किस ऑफ़ लव’ के लिए आये थे और देखिये न इटैलियन ‘जी’ की आँखों में उन आतंकवादियों की मृत्यु से आंसू आ गये, उन्हें रात भर दुःख के मारे नींद नहीं आयी।

जम्मू एवं कश्मीर के निर्दोष पत्थरबाजों के खिलाफ तो एक्शन ले ही नहीं सकते क्योकि पत्थर मारना तो उनकी किताब में लिखा है, उनका मानवाधिकार है।

हरे देश को यह पता था ऎसे नुक़सान बचाने के लिए भारत अपनी कार सड़क से हटा लेगा और हरा देश ऎसे ही आतंकी कार को भगाता रहेगा।

लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री मोदी भारतीय कार के ड्राइवर बन गये। कार में बैठने के बाद उन्होंने तुरंत गाड़ी की स्टीयरिंग व्हील निकाल के हरे ड्राइवर के सामने फेंक दी।

अब आतंकी ड्राइवर सकपका गया क्योंकि भारत की दिशा में कार दौड़ाने का केवल एक ही परिणाम था – टक्कर। चूंकि भारत की कार हर मामले में बेहतर है तो उस टक्कर में हरे देश की कार का तो कचूमर ही निकल जाता जबकि भारत की कार में कुछ डेंट और खरोंच लगते।

दो सर्जिकल स्ट्राइक, मेजर गोगोई, पेलेट गन, सैकड़ो आतंकवादियों को मार देना, कश्मीर के आतंकियों के खिलाफ NIA की कार्रवाई, यह इस बात का संकेत है कि हरे देश से डील करने वाली कार में स्टीयरिंग व्हील नहीं है।

हरे देश को यह दिखाई दे रहा है। हरा देश भी स्टीयरिंग व्हील निकाल के फेंक सकता है, लेकिन उस स्थिति में उसे पता है कि उसने कार दौड़ाने का प्रयास किया तो टक्कर पक्की है, जिसमें उसका विनाश हो सकता है, जबकि भारत की कार में कुछ डैमेज हो जायेगा।

आज हरे देश ने भारत के द्वारा LoC पर कार्रवाई का खंडन किया है। उसके अनुसार, भारतीय लड़ाकू विमानों को तुरंत खदेड़ दिया गया। लेकिन साथ ही, इसने धमकी भी दी है कि वह जवाबी कार्रवाई भी करेगा!

एक तरफ खंडन, दूसरी तरफ धमकी!

इसी को कहते है कि जबरा मारे और रोये भी न दे।

हरे देश द्वारा भारत के शरीर पर आतंकी हमलों द्वारा हज़ार कट मारकर खून बहाने की नीति चीथड़ों में उड़ गयी। अब उसे पता है कि हर ऐसे ‘कट’ का जवाब भारत, और तगड़े वार से देगा। क्या वह कंगाली की हालत में ऐसे वार सह सकता है?

हरा देश किसी भी हालत में प्रधानमंत्री मोदी को वापस सत्ता में नहीं देखना चाहता। लेकिन उसकी दुविधा यह है कि अगर वह भारत पर आतंकी कार्रवाई करे, तो प्रधानमंत्री मोदी जवाबी वार से और अधिक मज़बूत होते हैं। और अगर वह कार्रवाई न करे, तो भी प्रधानमंत्री मोदी की इमेज एक सुदृढ़ नेता की बनती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने शतरंज के गेम में उसे मात दे दी है।

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