नेशनल वॉर मेमोरियल : वापसी संस्कृति की

दो साल पहले जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी नहीं हुए थे तब भी योगी जी की नाम बदलने की नीति युवाओं के बीच लोकप्रिय थी, और आक्रमणकारियों द्वारा थोपी गयी इमारतों का विध्वंस तो प्रचलित था ही।

उन दिनों मैंने अपने मित्रों से ‘ताज महल के स्थान पर तेजो महालय था’, इस अनुसंधान को पढ़ने के लिए कहा।

उस समय मुझसे मेरे कॉलेज के दोस्तों ने कहा था कि अगर यह मालूम हुआ कि ज़ामा मस्ज़िद भी किसी दैवीय स्थान के नाम पर बना है, तो क्या उसे भी तोड़ दोगे?

मैंने कहा बिल्कुल करेंगे। तोड़ने के अपने तरीके हैं। जिस ईमारत का जो इतिहास है, वह उसी सम्मान के साथ जियेगा और जाना जाएगा।

दुनिया के बड़े देशों में सिर्फ भारत में ही अब तक युद्ध स्मारक का निर्माण नहीं हुआ था। 60 साल से लटके वॉर मेमोरियल का आज उद्घाटन करेंगे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी।

हमारे दिल्ली में एक वॉर मेमोरियल है, जिसे इंडिया गेट कहते हैं। इस वॉर मेमोरियल पर अंग्रेज़ों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में शहीद हुए अपने सैनिकों के नाम लिखवाए हैं। मगर मुद्दे की बात यह है कि यह वॉर मेमोरियल हमारे यानि हमारे देश के जवानों को समर्पित नहीं है। इसमें जलने वाली अमर जवान ज्योति की स्थापना 1971 के युद्ध के बाद हुई थी, कांग्रेस सरकार केवल इतना ही कर सकती थी, क्योंकि नेशनल वॉर मेमोरियल पहले से प्रस्तावित तो था ही, मगर उसे पूरा करने की शक्ति और नीयत कांग्रेस के पास थी नहीं।

नेशनल वॉर मेमोरियल का प्रस्ताव भारतीय सैन्य बलों ने 1960 में दिया था। इसके बाद इस लक्ष्य में केवल दो घटनाएं घटित हुई। 46 वर्षों के बाद यूपीए सरकार ने इसके लिए 2006 में मंत्रियों का एक परिषद, प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में तय किया, जिसने यह तय किया कि वॉर मेमोरियल इंडिया गेट के परिसर में बनाया जाना चाहिए।

इस घटना के 6 वर्षों के बाद, 2012 में सरकार चीन द्वारा दिये गए धोखे के 50वीं वर्षगाँठ मनाने को आतुर हुई और तय किया कि उस समय चीन से हुए युद्ध में जो सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे, उनकी स्मृति में एक सभा का आयोजन हो; जो कि हुआ भी। मगर उसी वर्ष, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जी ने कहा कि इंडिया गेट के परिसर में नहीं बनाना चाहिए।

और मामला फिर लटक गया। गठबंधन की सरकारों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस ने इस प्रस्ताव के बाद भी 27 सालों तक शासन किया, तब भी नेहरू जी के कार्यकाल में पास हुए इस प्रस्ताव की काँग्रेस को सुध तक न आई।

फिर 2014 आया, और 30 साल बाद भारत ने पूर्ण बहुमत की सरकार चुनी। मोदी जी के नेतृत्व में सरकार ने आते के साथ ही, यानि वर्ष 2015 में ही इस प्रस्ताव पे काम शुरू कर दिया। 7 अक्टूबर 2015 को मोदी सरकार की कैबिनेट ने इस मेमोरियल के लिए 500 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव पारित किया, और उसी दिन 176 करोड़ रुपये आवंटित किए।

यहां इस बात पर हमें ध्यान देना चाहिए, कि देश के पहले प्रधानमंत्री के कार्यकाल में पारित हुआ प्रस्ताव देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री यानि 14वें प्रधानमंत्री के कार्यकाल में लागू होना शुरू हुआ। इसके लिए राशि आवंटित होने में ही 52 वर्ष लग गए।

मोदी सरकार ने फुर्ती दिखाते हुए इस काम को 4 वर्षों के अंदर पूरा कर दिया। हालाँकि इसकी समय सीमा तो सरकार ने 2018 अगस्त बताई थी, मगर कोई बात नहीं। जहां देश ने धीमी सरकारों के कारण 52 वर्षों का इंतज़ार किया, वहीं देश 6 महीने की देरी भी बर्दाश्त कर लेगा।

इंजीनियरिंग के इस नायाब नमूने यानि अगर इस वॉर मेमोरियल के स्थापत्यकला को नहीं समझा तो इसके महत्व को नहीं समझा।

40 एकड़ में बनाया गया ये मेमोरियल उन जवानों के प्रति सम्मान का सूचक होगा जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपनी जान दी है। सोमवार को होने वाला यह आयोजन सेना की परंपरा के मुताबिक होगा, जिसमें मेमोरियल को जवानों को समर्पित किया जाएगा। मेमोरियल को देश की रक्षा की खातिर शहीद होने वाले 25 हजार 942 से वीर जवानों की याद में बनाया गया है।

छह भुजाओं (हेक्सागोन) वाले आकार में बने मेमोरियल के केंद्र में 15 मीटर ऊंचा स्मारक स्तंभ बनाया गया है। इस पर भित्ति चित्र, ग्राफिक पैनल, शहीदों के नाम और 21 परमवीर चक्र विजेताओं की मूर्ति बनाई गई है। स्मारक चार चक्रों पर केंद्रित है- अमर चक्र, वीरता चक्र, त्याग चक्र, रक्षक चक्र। इसमें थल सेना, वायुसेना और नौसेना के शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी गई है। शहीदों के नाम दीवार की ईंटों में उकेरे गए हैं।

स्मारक का निचला भाग अमर जवान ज्योति जैसा है।

अब इस विशालकाय वॉर मेमोरियल का महत्व समझिए। अंग्रेज़ों की गाथा गाने के लिए हम जिस इंडिया गेट की प्रदक्षिणा करते हैं, उसके के सम्मुख बना यह वॉर मेमोरियल अंग्रेज़ों के इतिहास को चुनौती दे रहा है। देश के अपने सैनिक जो अनेकानेक युद्ध में अपने प्राणों का दान देते आये हैं, उनको असली सम्मान अब मिल सकेगा। जनता उन्हें जानने और समझने यहां आएगी। ‘इंजीनियरिंग का नायाब नमूना’ जैसे अलंकारों से अलंकृत होने का गौरव तो इंडिया गेट को प्राप्त था, मगर इसके अतिरिक्त और कोई महत्व उस स्थान का नहीं था।

वॉर मेमोरियल इंजीनियरिंग का नायाब नमूना तो है ही, साथ ही साथ इसका सामरिक महत्व भी है। इंडिया गेट के सामने होने के कारण, अपने विशालकाय परिसर में संग्रहालय समाए होने के कारण जब जनता इसकी ओर खिंची चली आएगी तो अपने आप ऐसी विदेशी इमारतों का महत्व हटने लगेगा।

यही काम स्टेचू ऑफ यूनिटी ताजमहल के लिए करेगा। ये ध्रुवीकरण है पर्यटकों का! ये ध्रुवीकरण है पर्यटन का! ये संस्कृति वापसी है।

संदर्भ:

https://en.m.wikipedia.org/wiki/National_War_Memorial_(India)

https://en.m.wikipedia.org/wiki/India_Gate

https://www.bhaskar.com/amp/national/news/pm-modi-to-inaugurate-national-war-memorial-near-india-gate-6027009.html

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