नाम और बलिदान

अगर आप भारत सरकार की ‘Ministry of Civil Aviation’ यानि ‘नागरिक उड्डयन मंत्रालय’ की वेबसाइट पर Ministry Documents में जाकर किसी भी साल की Annual Report खोलेंगे (हो सके तो 2012-13 या 2013-14 की खोलिए), आपको इस मंत्रालय के अधीन आने वाली सारी संस्थाओं का पता चलेगा। जैसे कि Airport Authority of India, Air India, आदि।

इन्हीं संस्थाओं में से एक है ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी’। अमेठी जिले के फुरसतगंज इलाके में बनी इस एकेडमी का मुख्य ऑफिस रायबरेली में है – academy और office अलग अलग जिलों में होने का क्या औचित्य – फिलहाल इसे अलग रखते हैं।

जब आप ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान एकेडमी’ यानि igrua की वेबसाइट पर जाकर Media Reports से Picture gallery में जाकर ‘Facilities – Institutional and Residential Area’ वाले एल्बम को खोलेंगे, तो आप एक रहवासीय परिसर पर एक बोर्ड पाएंगे – ‘प्रियंका गांधी छात्रावास’। (http://www.igrua.gov.in/Gallery/Swachh%20Bharat%20Pakhwada/Pic(132).jpg)

जी हां, ‘प्रियंका गांधी छात्रावास’, और ये आज से नहीं है, कई सालों से हैं। पास ही में एक ‘राहुल गांधी छात्रावास’ भी है। (http://www.igrua.gov.in/Gallery/Swachh%20Bharat%20Pakhwada/Pic(131).jpg) यहां ये जरूर याद रखियेगा कि ये आज से नहीं, लगभग 2010 के भी पहले से है। दोनों की फ़ोटो भी यहां सलंग्न है। (फोटो देकर भी इतना सब कुछ लिखने की आवश्यकता ये बताने के लिए थी कि ये कोई फोटोशॉप नहीं बल्कि आधिकारिक तौर पर documented हैं।)

राहुल गांधी के नाम पर छात्रावास होने का क्या औचित्य है – इस बात पर ये मानते हुए कि चलो, वो उस जिले के सांसद हैं तो उनके नाम पर हॉस्टल है – इस बात से benefit of doubt दिया जा सकता है। पर प्रियंका गांधी का अमेठी जिले में या फुरसतगंज में या भारत के नागरिक उड्डयन में, यहां तक कि भारतीय राजनीति में 2010 तक (वैसे तो आजतक भी नहीं, पर फिर भी 2010 तक) क्या योगदान है, शायद घनघोर से घनघोर कांग्रेसी भी नहीं बता सकता।

इंदिरा गांधी के नाम पर उड़ान अकादमी है, जिसमें 32 लाख रुपये की फीस से और कुछ साल के ट्रेनिंग से आदमी commercial pilot license ले पाता है, उसमें इंदिरा गांधी की पोती के नाम पर हॉस्टल होना, सिर्फ इसलिए कि वो इंदिरा गांधी की पोती है – चाटुकारिता की, तलवे चाटने की इस नीयत के लिए ‘पराकाष्ठा’ जैसा भारी शब्द भी छोटा जान पड़ता है।

ये सब आज क्यों बताया गया। ये सब इसलिए कि इस देश में हजारों स्मारक, विश्वविद्यालय, कॉलेज, संस्थाएं, अकादमियां, सड़कें, अस्पताल, इमारतें, योजनाएं और पता नहीं क्या कुछ जिस एक ‘परिवार विशेष’ के नाम पर है, उसी परिवार के एक निकटस्थ – ज़ीरो-लॉस थ्योरी के जन्मदाता, तथाकथित राफेल ‘घोटाले’ में अनिल अंबानी को जिम्मेदार ठहराते हुए ट्वीट करने वाले और 24 घंटे के अंदर ही उसी अनिल अंबानी की एरिकसन केस में सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले महान वकील कपिल सिब्बल ने National War Memorial‘ या ‘राष्ट्रीय समर स्मारक पर प्रश्नचिन्ह उठाया है कि क्या इससे सैनिक शहीद होना रुक जाएंगे।

नहीं, सैनिक शहीद होना नहीं रुकेंगे तब तक, जब तक यहां से नेता पाकिस्तान जाकर आतंकवादियों के पैरोकारी करने वालों के गले मिलकर यहां की सरकारें हटवाने में मदद मांगेंगे।

पर क्या, ये देश अपनी मातृभूमि के लिए घर परिवार सर्वस्व का त्याग करने वाले हुतात्माओं का सम्मान तक नहीं कर सकता। क्या सालों-साल जयंतियों, पुण्यतिथियों पर परिवार विशेष के राजधानी की अरबों की जमीन पर एकड़ों में फैले स्मारकों पर फूल चढ़ाने से क्या सैनिक शहीद होना बंद हो गए, गरीबों को रोटी मिल गयी..? रही बात सैनिकों की सुरक्षा की, शायद इस सरकार ने ही बुलेटप्रूफ हेलमेट और जैकेट जैसी बुनियादी चीज़ों की सुध ली है।

देश के लिए जिनका योगदान आज तारीख तक नगण्य मात्र है, उनके और उनके परिवार के अलावा किसी भी और के नाम पर चाहे मूर्ति हो या स्मारक – इन पालतुओं की तिलमिलाहट पर अब क्रोध या तरस भी नहीं आता।

पर अब और नहीं। इस देश को बनाने में कई और भी थे, और हैं। वो परिवार से परे हैं, उनका योगदान इस ‘परिवार’ से कहीं बढ़कर था और है। और ये देश उनका सम्मान करना सीख चुका है। उनके ‘बलिदान’ को अब उन्हीं का ‘नाम’ देना सीख चुका है।

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