कट्टर उदारवादियों के निशाने पर कंगना, अब कहां हैं स्त्रीवादी

कंगना रनावत फिर से निशाने पर है, वैसे भी उसका साथ देने के लिए हमारी स्‍त्रीवादी बहनें सामने नहीं आ रही है।

एक अजीब सी चुप्‍पी है, यह चुप्‍पी क्‍यों है और किसलिए, यह समझना किसी के लिए भी कठिन नहीं है।

मैने कई बार कहा है कि अब जो नई पीढ़ी आ रही है, वह प्रखर है, अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती है। अगर उसे लगता है कि उससे कुछ कदम गलत उठे तो उसमे अपनी गलतियों को सुधारने का और स्‍वीकारने का साहस है। किसी नैतिकता या शुचिता का बोध नहीं है।

पहले कंगना शुचितावादियों के निशाने पर थी, परम पवित्र आदित्‍य पांचोली को अपवित्र करने तथा सदी के सुपरस्‍टार शेखर सुमन के सुपुत्र का फायदा उठाने के लिए, जो अब एक बहुत ही महान कलाकार हैं।

खैर पवित्रता और महानता के इन दो प्रतीकों का फायदा लेने के कारण शुचितावादी उसे न जाने क्‍या क्‍या कहा करते थे, संघर्ष के उस दौर में भी कंगना की यह ठसक मुझे पसंद थी।

आप उसे कुछ भी कहें, मैं नैतिक शुचिता को बहुत ही व्‍यक्‍तिगत मानती हूं, और यह आज से नहीं बल्‍कि शायद तब से जब से इटावा में थी। वह नैतिकता व शुचिता के ठेकेदारों के निशाने पर हुआ करती थी तो हमारी स्‍त्रीवादी बहनें उसकी तरफ हाथ बढ़ाया करती थीं, पर समय बदला, कंगना ने एक ऐसे उद्योग में अपनी पहचान बनाई जो कल तक या तो खानों के द्वारा स्‍थापित होने वाली नायिकाओं का उद्योग हुआ करता था या फिर स्‍टारपुत्रियों का।

कंगना ने अपनी गलतियों से सीखा, वंशवाद पर प्रहार किया और आज वह एक ऐसी स्‍त्री के प्रतीक के रूप में आपके सामने है जो अपने तमाम अतीत के साथ आपके सामने है, बेझिझक, बेखौफ। वह आपसे अपना चरित्र प्रमाणपत्र लेने नहीं जा रही, और जाए भी क्‍यों, आप लोग कौन होते है किसी को चरित्र का प्रमाणपत्र देने वाले।

अब सवाल उठता है कि एक ऐसी स्‍त्री के साथ आज स्‍त्रीवादी क्‍यों नहीं हैं, क्‍यों उसके अभिनय के एक पहलू को लेकर उस पर व्‍यक्‍तिगत प्रहार हो रहे हैं, तो ऐसे में हम चुप क्‍यों हैं, एक सोनाली के बोलने से कंगना को कुछ हौसला नहीं मिलेगा पर हां सोनाली को यह तसल्‍ली रहेगी कि मैने अपनी बात कही।

हुआ तो तनुश्री को भी कुछ नहीं था, पर उसके साथ तमाम लोग आए और अपनी बातों को कहा। कंगना इतनी महत्वपूर्ण हो गई कि आज सुना है कि दिल्ली के माननीय उपमुख्‍यमंत्री ने भी उसे ट्रॉल किया।

प्रश्‍न यह है कि क्‍या आज हम सबमें इतनी असहिष्‍णुता आ गई है कि हम एक पूरे के पूरे विचार को खारिज करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, याद रखिए विचार को केवल विचार ही पराजित कर सकता है, आपके यह वाहियात हथकंडे नहीं।

आपको राष्‍ट्रवादी विचारों से नफरत है तो आप अपने विचार रखिए, क्‍योंकि यदि कंगना का घोड़ा नकली था इस आधार पर आप राष्‍ट्रवाद को कटघरे मे खड़ा कर रहे हैं तो प्रश्‍न उठेगा कि क्‍या आपके प्रिय शाहरूख ‘माई नेम इज़ खान’ में असली में मंदबुद्धि थे क्‍या, या आमिर असली में मंगल पांडे में मरे थे। सवाल तो स्‍वरा भास्‍कर के एक दृश्‍य पर भी उठ सकता है।

पर मैं उन सब पर न जाकर यह कहना चाहती हूं कि क्‍या हम स्‍त्रीवादी किसी आदेश की प्रतीक्षा करती हैं कि आदेश आए तो हम कहें, या हमें लगता है कि हमारी कहानी व कविता पर कोई कुछ लिखेगा नहीं।

खैर, जो भी लोग कंगना की ट्रॉलिंग के बहाने राष्‍ट्रवाद पर निशाना साध रहे हैं वह सब अपनी वैचारिक दरिद्रता को ही प्रदर्शित कर रहे हैं, मैं कल भी उसकी ठसक के साथ थी, जब वह पवित्र व महान अभिनेताओं के कारण शुचितावादियों के निशाने पर थी और आज भी उसके साथ हूं जब वह एक फिल्‍म अपने हिसाब से करने के कारण कट्टर उदारवादियों के निशाने पर है।

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