बौद्धिक आतंकवाद : कुछ भारतीय पत्रकारों के भरोसे पाकिस्तान

देश के खिलाफ एक तरफ पाकिस्तान का आतंकवाद है और दूसरी तरफ देश में बौद्धिक आतंकवाद अपने जलवे दिखा रहा है।

ये आतंक कथित बुद्धिजीवी वर्ग फैला रहा है जिसका मकसद केवल देश को नुकसान पहुँचाना है। पिछले पांच वर्ष से अर्थात जबसे मोदी प्रधानमंत्री बने हैं ये बुद्धिजीवी अपने तरह के आतंक से (Intellectual Terrorism) से देश की जड़ें खोखली करने में लगे हैं।

ऐसे बुद्धिजीवी आतंकियों की लिस्ट बहुत बड़ी है। अभी हाल ही में इनके घटियापन ने पाकिस्तान को खाद पानी देने का काम किया है।

करन थापर, प्रवीन स्वामी और चन्दन नंदी की मनहूस पत्रकारिता ने पाकिस्तान की जेल में कैद कुलभूषण जाधव को किसी सबूत के बिना अपराधी साबित करने की कोशिश की।

पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय अदालत में इन पत्रकारों के लिखे हुए लेखों को जाधव के खिलाफ सबूत के रूप में पेश किया और कहा कि इन लोगों ने भारत के सम्मानित पत्रकार होने के नाते जो लिखा उसे सही माना जाये।

करन थापर के परिचय में तो पाकिस्तान ने कहा कि – थापर तो भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष के पुत्र हैं और इसलिए उनकी बात को सही माना जाये। जैसे सेना प्रमुख का पुत्र होना उनके लिए सत्य बोलने का लाइसेंस हो।

इन पत्रकारों के बौद्धिक आतंकवाद ने तो कुलभूषण जाधव को फांसी पर चढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वो बात और है कि भारत के वकील हरीश साल्वे ने भारत का पक्ष रखते हुए पाकिस्तान की इन पत्रकारों के लिए दी गई दलीलों की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी वरना जाधव तो इनके आतंक का शिकार हो ही गया होता।

अगर अदालत जाधव के खिलाफ कोई फैसला देती है (जिसकी उम्मीद कम है) तो उसके लिए ये लोग भी जिम्मेदार होंगे जिन्हे गद्दार ही कहा जाना चाहिए।

पाकिस्तान को ये एहसास होना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र की वजह से ही ये लोग इतनी बकवास कर सकते हैं। लेकिन पाकिस्तान ये नहीं भूलना चाहिए कि अगर भारत में इन जैसे, और इनके जैसे और पत्रकार पाकिस्तान की हिमायत लेते हैं तो अनेक पत्रकार सुधीर चौधरी और अर्नब गोस्वामी जैसे भी हैं जो पाकिस्तान को नंगा करने में पीछे नहीं रहते।

अगर पाकिस्तान थापर, स्वामी और नंदी जैसों पर विश्वास करता है तो सुधीर चौधरी और अर्नब गोस्वामी पर भी विश्वास करे। उनके दिखाये आईने में अपना चेहरा देखे।

पाकिस्तान की सरकार ही नहीं, उसके आतंकवादी भी हमारे बौद्धिक आतंकियों के दीवाने हैं। हाफिज़ सईद को देख लीजिए… बरखा दत्त और कांग्रेस पर लट्टू रहता है क्यूंकि बरखा ने ही कारगिल में पाकिस्तान की सेवा की थी और आतंकी बुरहान वानी को स्कूल मास्टर का मासूम बेटा कहा था।

शहरी नक्सल, देश में आतंक फ़ैलाने के लिए प्रधानमंत्री तक की हत्या कर सकते हैं जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की लाइन लग गई और कोर्ट उन्हें बचाने आ गया था।

कांग्रेस ने अपने 60 साल के राज में इस बौद्धिक आतंकवाद की जड़ें समाज के हर क्षेत्र में जमा दीं। पत्रकारिता जगत, शिक्षण संस्थानों, मीडिया, राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, पुलिस, अदालतों, अल्पसंख्यक समुदायों और यहाँ तक आध्यात्मिक जगत में भी इस आतंकवाद को पनपाने का काम किया है।

अब इनकी जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि इनका समूल नाश करना अत्यंत कठिन है। झूठ और फेक न्यूज़ हमारे बौद्धिक आतंकियों की रोज़ी रोटी है जिसे परोस कर पूरे देश को अस्थिर करना इनका लक्ष्य है।

ऐसा नहीं है कि ये पत्रकार केवल भारत में ही ऐसा आतंक फैला रहे हैं, ये ऐसा हर लोकतांत्रिक देश में करते हैं। भारत के अलावा आजकल इनका कारोबार अमेरिका में भी जम के चल रहा है जहाँ इनका निशाना वहां के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प हैं।

देश के प्रति जहर फैलाते ऐसे बौद्धिक आतंकवाद से लड़ने के लिए हर व्यक्ति को तैयार रहना चाहिए। इनका सम्पूर्ण बहिष्कार ही इनका इलाज है।

कहते हैं आतंकवाद की उम्र लम्बी नहीं होती, इसलिए जागृत समाज और हिंदुत्व, बौद्धिक आतंकवाद का भी अंत करेगा, ऐसी कामना करता हूँ।

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