फ़र्क खिलाड़ियों और बाज़ारूओं का

पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की निंदा करना तो दूर, इस हमले में पाकिस्तान की भूमिका का ज़िक्र भी करने से परहेज़ किया है।

इसके बजाय ये क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान का बहिष्कार नहीं करने के लिए उसी तरह की अदाओं के साथ बहाने बना रहे हैं, जिस तरह शातिर वेश्या अपने ग्राहक को रिझाने के लिए अदाएं दिखाती है, बहाने बनाती है।

मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूं इसे समझने के लिए इसे बहुत ध्यान से पूरा पढ़िए…

सन 2001 में वरीयता क्रम में दुनिया के नम्बर एक और दो खिलाड़ियों को पराजित कर एक नौजवान भारतीय खिलाड़ी ने बैडमिंटन की विश्व विख्यात बैडमिंटन प्रतियोगिता ऑल इंग्लैंड चैम्पियनशिप को जीता था। इसी वर्ष उसे अर्जुन एवार्ड तथा राजीव गांधी खेल रत्न एवार्ड से सम्मानित भी किया गया था।

इससे पूर्व 1996 से 2000, लगातार 5 वर्षों तक यह नौजवान बैडमिंटन का राष्ट्रीय चैम्पियन भी रह चुका था। परिणामस्वरूप 2001 में कोकाकोला ने इस खिलाड़ी को बहुत मोटी रकम देकर अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने का प्रस्ताव दिया था।

उस नौजवान ने कोका कोला प्रस्ताव बहुत साफ शब्दों में यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि “कोल्ड ड्रिंक्स से शरीर को होने वाली हानि से मैं भलीभांति परिचित हूं तथा कई वर्ष पूर्व स्वयं मैंने ही इन्हें पीना छोड़ दिया है अतः एक यूथ आइकॉन होने के नाते अपने देश के नौजवानों को कोल्ड ड्रिंक्स पीने के लिए मैं प्रेरित नहीं कर सकता। मेरी अंतरात्मा मुझे इसकी इजाज़त नहीं देती।”

उस नौजवान बैडमिंटन खिलाड़ी का नाम पुलेला गोपीचंद था। जिसने स्वयं रिटायर होने के बाद अपनी निजी बैडमिंटन एकेडमी खोली और उस एकेडमी से साइना नेहवाल, पीवी सिंधू, श्रीकांत किदाम्बी, पारुपल्ली कश्यप, प्रनॉय कुमार, सिक्की रेड्डी सरीखे आधा दर्जन से अधिक विश्वविख्यात विश्वस्तरीय बैडमिंटन खिलाड़ियों समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर के लगभग दो दर्ज़न बैडमिंटन खिलाड़ी देश को सौंपे हैं।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि पुलेला गोपीचंद ने पिछले दस वर्षों के दौरान अकेले अपने दम पर बैडमिंटन की दुनिया में चीन के एकाधिकार और वर्चस्व को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। बैडमिंटन की दुनिया में भारत को आज एक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने का पूरा श्रेय पुलेला गोपीचंद को ही जाता है।

पुलेला गोपीचंद की इस कीर्ति गाथा का उल्लेख आज इसलिए, क्योंकि पुलवामा हमले के तत्काल बाद ही खुलकर पाकिस्तान की निंदा करने के बाद खेल के मैदान में पाकिस्तान का पूर्ण बहिष्कार करने की मुहिम इन्हीं पुलेला गोपीचंद ने प्रारम्भ की है।

पुलेला गोपीचंद ऐसा क्यों कर रहे हैं और तेंदुलकर तथा गावस्कर ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं? यही समझाने के लिए गोपीचंद द्वारा कोकाकोला का ऑफर ठुकराए जाने के प्रसंग का उल्लेख किया है। क्योंकि हमने देखा है कि अपने पूरे खेल जीवन के दौरान तेंदुलकर और गावस्कर की जोड़ी पूरी बेशर्मी के साथ पैसा लेकर पूरे देश के नौजवानों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हुए कभी कोकाकोला कभी पेप्सी का प्रचार करती रही है। आज भी कर रही है।

ध्यान रहे कि पेप्सी और कोकाकोला पाकिस्तान में भी धंधा करती हैं। इन जैसी कुछ और कम्पनियों के उत्पादों का प्रचार भी मोटी रकम लेकर तेंदुलकर और गावस्कर की जोड़ी करती है। इसलिए अगर इन्होंने पाकिस्तान की आलोचना की तो पाकिस्तान में इनका विरोध होगा और मोटी रकम देकर इनसे प्रचार कराने वाली कम्पनियां इन्हें अपने प्रचार टीम से बाहर कर देंगी। जिसके कारण इन दोनों को करोड़ों का नुकसान होगा।

यही फर्क है इन दोनों और पुलेला गोपीचंद में।

ध्यान रहे कि ये दोनों देश को आज तक एक भी श्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी नहीं दे सके हैं। इसके बजाय किसी प्रतिभशाली खिलाड़ी की छाती पर मूंग दलकर इन दोनों की सिफारिशों के सहारे ऊपर पहुंची इनकी औलादें बुरी तरह असफल हुई हैं।

जबकि गोपीचंद ने देश को क्या दिया इसका उल्लेख ऊपर कर चुका हूं।

यही फर्क होता है खिलाड़ियों और बाज़ारूओं में।

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