कौन हैं पुलवामा आतंकी हमले के लाभार्थी

How’s The Josh? Uri फ़िल्म के यह 3 शब्द हर किसी की जुबान पर चढ़ गए, जो भी फ़िल्म देख कर आता उसकी ज़ुबान पर एक ही डायलाग होता How’s The Josh?

जल्दी ही इस डायलॉग ने पूरे देश में अपनी पैठ बना ली। क्या बच्चे, क्या बूढ़े, और क्या जवान हर किसी की ज़ुबान पर अब How’s The Josh? ही था।

सुबह जब मैं ग्राउंड पर जाता तो देखता खेलने आये लड़के एक दूसरे से एक ही बात पूछते How’s The Josh? फुटबॉल खेलने वाले गोल दागने के बाद How’s The Josh? जवाब वही High Sir!

क्रिकेट खेलने वाले विकेट ले लें तो How’s The Josh? High Sir, चौका या छक्का मार दें तो सामने वाली टीम How’s The Josh? High Sir, जब कोई अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाता तो कोच चिल्लाता Where’s The Josh?

ऐसा ही हाल सुबह शाम पार्कों का था। 70-80 साल के बुज़ुर्ग आपस में How’s The Josh? पूछते दिखते थे, टहलने आयी महिलाएं भी How’s The Josh? से बच न सकीं और उनकी ज़ुबान पर भी How’s The Josh? था।

बच्चों का उत्साह तो पूछिये ही मत, सड़क पर कोई भी स्कूल बस जा रही हो ज़ोर से चिल्ला दीजिये How’s The Josh? गगन भेदी गूंज के साथ जवाब आता था High Sir, छोटे छोटे LKG और UKG के बच्चे भी How’s The Josh? के दीवाने हो चुके थे।

यानी देश की भाषा बदल चुकी थी। नमस्कार, good morning या good evening की जगह अभिवादन के नये तरीके How’s The Josh? ने जगह बना ली थी। जिसे देखो How’s The Josh?

देश को How’s The Josh? ने अपने आगोश में ले लिया था। ये एक आंदोलन की तरह फैल चुका था। पार्किंग कर के अब पार्किंग वाले से व्यक्ति “पार्किंग पर्ची दो” नहीं बोलता था। अब How’s The Josh? बोलते ही High Sir के जवाब के साथ पर्ची हाथ में थमा दी जाती थी। यानी How’s The Josh? अब एक डायलॉग नहीं फैशन बन चुका था।

अपने मंगेतर से मिल कर आई एक लड़की से उसकी सहेलियों ने हज़ारों सवाल की जगह उसे छेड़ते हुए सिर्फ एक सवाल कर डाला How’s The Josh? लड़की ने शर्माते हुए जवाब दिया High Sir, ग्रुप में चिड़ियों की तरह चहचाहट होने लगी, खिलखिलाती हुई वे अपनी बातों में मग्न हो गयीं।

हॉस्पिटल में बच्ची के जन्म पर उसके पिता के दोस्त मिलने आये और आते ही पहला वाक्य How’s The Josh? पिता ने सीना चौड़ा कर के जवाब दिया High Sir। उसी हॉस्पिटल में एक दूसरे कमरे में एक्सीडेंट में घायल एक लड़का बेड पर पड़ा था, उसके टीचर उस से मिलने आये और हालचाल कुछ इस प्रकार पूछा How’s The Josh? लड़के का मानो दर्द ही गायब हो गया हो पूरी ताकत के साथ जवाब देता है High Sir। देश की भाषा अब बदल चुकी थी, सवाल जवाब का तरीका बदल चुका था, How’s The Josh? का डायलॉग दवा बन कर दर्द भुला दे रहा था।

इस सब के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें इस से अपने वजूद की चिंता होने लगी। एक डायलॉग जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया था, उस डायलॉग से कुछ बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और नेताओं को अपनी दुकान बन्द होने का खतरा सताने लगा। उन्होंने तुरंत इसे Hyper Nationalism बता दिया और आतंकवाद की श्रेणी में डाल दिया। Nationalism को तालिबान और ISIS से भी बड़ा खतरा बताया जाने लगा, देशभक्ति को जानलेवा वायरस बताया जाने लगा, लेकिन देश की जनता ने ऐसे प्रयासों को सिरे से नकार दिया।

विरोधी बहुत परेशान थे कि आखिर इस राष्ट्रीयता की हवा से कैसे बचा जाए? कैसे इसका तोड़ निकाला जाए? क्योकि अब तो सरकार के मंत्री जहां जा रहे हैं एक ही बात पूछ रहे हैं How’s The Josh? और जनता पूरी ताकत के साथ जवाब दे रही है High Sir!

ये जोश किसी पार्टी के लिए नही बल्कि देश के लिए, देश की सेना के लिए और देश के जवानों के लिए था, पर नेता इस उलटा समझ बैठे और उन्हें लगने लगा इस से मोदी और उनकी पार्टी को फायदा होगा। 56 इंच सीने के जवाब तो पहले ही नही दे पा रहे थे ऊपर से How’s The Josh? कहर बन कर टूट पड़ा।

फ़िल्म की टाइमिंग, फ़िल्म के सीन और फ़िल्म को ले कर कई सवाल उठाए गए, पर जनता वे सब खारिज कर दिए। सबसे कमाल की बात पायरेटेड फ़िल्म देखने वालों ने भी टोरेंट से इस फ़िल्म को डाउनलोड नहीं किया और पिक्चर हॉल में फ़िल्म देख कर आये, यानी भरपूर समर्थन दिया।

अब ऐसे में विरोधियों की चूलें हिलना स्वाभाविक था, उन्हें समझ में आ चुका था कि चुनाव जीतना है तो 56 इंच के सीने को कमतर बताना होगा और Josh पर लगाम लगानी होगी।

इसके बाद पुलवामा का हमला हुआ, विरोधियों को मानो संजीवनी बूटी मिल गयी हो। उन्होंने तुरंत अपने मीडिया व IT Cell को एक्टिव किया और सोशल मीडिया पर “कहाँ गया 56 इंच का सीना?”, “Where is the Josh Modi ji?” ट्रेंड करने लगा।

हमले की जिम्मेदारी आतंकवादियों और पाकिस्तान पर नहीं बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक और Uri फ़िल्म पर रख दी गयी, How’s The Josh? जैसे डायलॉग और मोदी के 56 इंच सीने को दोषी बताया जाने लगा।

एक तीर से कई निशाने साधे जा रहे थे। मोदी की अब तक कि उपलब्धियों को ढंक कर ध्यान भटकाया जा रहा था। अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि सर्जिकल स्ट्राइक को दोषी बता कर उसे गलत कदम बताया जा रहा था। देश में बने राष्ट्रीयता के माहौल को खत्म किया जा रहा था, देश के Josh की हवा निकाली जा रही थी।

सबसे बड़ा सवाल यहाँ ये है कि जिस 56 इंच के सीने, How’s The Josh? डायलॉग और सर्जिकल स्ट्राइक का विरोधियों को कोई तोड़ नही मिल रहा था, जिसकी वजह से उन्हें लगता था वे चुनाव बुरी तरह हार जाएंगे, ऐसे में चुनाव से ठीक पहले हुआ ये हमला बहुत संदेह उत्पन्न करता है।

क्या यह हमला उन नेताओं, उन पार्टियों में नई जान फूंकने के लिए किया गया था तो कल तक बुरी तरह बैकफुट पर थीं? क्या पाकिस्तान चाहता है कि मोदी को हटाया जाए और विरोधियों को सत्ता मिल जाये इसलिए पाकिस्तान ने ये हमला करवाया? क्या जिन विरोधियों को जवाब नहीं मिल रहा था उनकी संलिप्तता है इस हमले में?

बैकफुट और हार की कगार पर बैठे विरोधी और चुनाव से ठीक पहले हुआ हमला बहुत कुछ कह रहा है। वैसे हमले के बाद से विरोधियों में नई ऊर्जा तो देखते ही बनती है।

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