कश्मीर का इलाज क्या है – 3

लगभग तीन दशक से भारत में बसीं जर्मन इंडोलॉजिस्ट मारिया विर्थ ने अपने एक आलेख में सीधा सवाल पूछा था –

‘1947 में भारत के धार्मिक आधार पर दो टुकड़े हुए। एक हिस्सा ‘पाकिस्तान’ मुसलमानों ने हासिल किया। यह कहते हुए कि जिस देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहां हम रह नहीं सकते। वहां हमारे अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकेगी। दूसरा ‘हिंदुस्तान’ हिंदुओं को मिला। यह आज तक एक है, लेकिन मुस्लिम हिस्सा दो टुकड़ों – पाकिस्तान-बांग्लादेश में टूट गया। अब रोहिंग्या म्यांमार से बेदखल किए जा रहे हैं, तो वे दो मुस्लिम हिस्सों के बजाय एक हिंदू बहुल भारत में बसना चाहते हैं। क्यों? क्या हिंदू राष्ट्र में अधिक सुरक्षा इसका मूल कारण है या शेष स्वप्न ‘ग़ज़वा-ए-हिंद’ की तरफ एक सोचा-समझा बड़ा क़दम है?’

मारिया विर्थ का यह कथन सीधे नस पर हाथ रखता है। ज़रा सोचें, रोहिंग्या अपने सबसे नज़दीक इस्लामिक देश पाकिस्तान और बांग्लादेश क्यों नहीं गए? भारत और वह भी हिंदूबहुल जम्मू रीजन उन्होंने क्यों चुना? भारत आना ही था, तो कश्मीर घाटी क्यों नहीं? हिंदूबहुल जम्मू ही क्यों? सारे देशविरोधी बुद्धिजीवी उन्हें यहीं रखने पर आमादा क्यों हो गए?

ध्यान रखें, जब तक आप स्वीकार नहीं करते कि आतंकवाद का एक मज़हब है और वह ‘पाक कुरआन’ के एक सिद्धांत ‘जिहाद’ से उत्प्रेरित है, तब तक कश्मीरी आतंकवाद का कोई इलाज़ संभव नहीं है।

[कश्मीर का इलाज क्या है – 1]

कश्मीर के इतिहास पर नज़र करें। कहा जाता है कि कश्मीरी पंडित मुसलमानों से अधिक समृद्ध थे। उन्होंने उन्हें उनका हक़ नहीं दिया, इसलिए वे विवश हुए कि विद्रोह करें। कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर संसाधनों पर कब्ज़ा जमा लें। ऐसे मूर्खतापूर्ण तर्क उस सेक्यूलर जमात से आते हैं, जिसके अगुआ अशोक कुमार पांडेय जैसे सावन के अंधे टिप्पणीकार हैं।

कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया कि समस्त हिंदू प्रतीकों को मिटा दिया जाए। सैकड़ों मंदिर तोड़ दिए गए। यहां तक कि श्रीनगर में डल झील के नजदीक स्थित हिंदुओं के सर्वोच्च धर्मगुरु शंकराचार्य को समर्पित पहाड़ी का नाम बदल कर ‘तख्त-ए-सुलेमान’ कर दिया गया। अनेक प्रतिष्ठित भारतीय, अमेरिकी और यूरोपीय विद्वानों ने भी अपनी पुस्तकों में इस पहाड़ी को शंकराचार्य पहाड़ी ही उल्लेखित किया है। लेकिन वह सब एक तरफ पड़ा रह गया और नाम बदल दिया गया। और यह मूर्खतापूर्ण काम किसी आतंकवादी संगठन ने नहीं, भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने किया था।

[कश्मीर का इलाज क्या है – 2]

एएसआई ने पर्यटक सूचना पट्टिका पर शंकराचार्य हिल के इतिहास की एक बेतुकी और भ्रामक प्रस्तुति की। इसमें बताया गया कि इस पहाडी पर कभी यहूदियों का कब्ज़ा था, इसलिए इसका नाम ‘तख्त ए सुलेमान’ या ‘सुलेमान का सिंहासन’ किया गया है।

वस्तुस्थिति यह है कि शंकराचार्य पहाड़ी पर स्थित संरचना का निर्माण भारत में इस्लाम के आने से भी सदियों पहले का है। शंकराचार्य ने सम्पूर्ण देश की यात्रा कर देश के चार कोनों पर पीठों की स्थापना की थी। उसी समय से अर्थात विगत तेरह सौ वर्षों से इस पहाडी को ‘शंकराचार्य पहाड़ी’ कहा जाता रहा है, किन्तु इसका कोई उल्लेख तक इस पट्टिका में नहीं किया गया। इसके बजाय इसे मुगल संरचना बता कर जीर्णोद्धार की बात कही गई।

यह स्थिति सिर्फ इसी हिंदू प्रतीक या संरचना की नहीं है, ऐसे अनेक उदाहरण कश्मीर घाटी में मौजूद हैं। इसी के साथ ख़रीदे गए ग़ुलाम पिछले अनेक वर्षों से यह स्थापित करने में जुटे हैं कि कश्मीर से पंडितों का पलायन जेनोसाइड नहीं था, वे तो खुद वहां से भागे थे और अब लौटना ही नहीं चाहते।

ऎसी स्थापनाएं करने वाले काम कहां करते हैं यानी उनकी रोज़ी-रोटी कहां से चल रही है, इस पर ध्यान दें, तत्काल समझ आ जाएगा कि ये दोगले नाममात्र के लिए हिंदू हैं। ये सच कभी बोल ही नहीं सकते। दरअसल कश्मीर में इस्लामी धनबल से जिहाद चल रहा है, जिसे खुले हृदय से स्वीकारना होगा। इसके अलावा कोई चारा नहीं।

यह स्थिति क्यों है कि देश में हिंदू नामधारी ‘हिंदू विरोधियों’ की संख्या बहुत बड़ी है। ये हर संभव वह करने को तत्पर रहते हैं, जिससे हिंदू समाज और संस्कृति के मुख पर कालिख पुते और उसकी तुलना में अन्य धर्म अधिक प्रगतिशील दिखाई दें।

बुरका और घूंघट जैसे बहुत सारे उदाहरण हैं, लेकिन अभी हमें उनमें नहीं उलझना चाहिए। सिर्फ एक उदाहरण देखें – भारत अपने नागरिक कुलभूषण जाधव की रिहाई के लिए पाकिस्तान से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमे में फंसा है। जीतोड़ कोशिश की जा रही है कि उनका हश्र सरबजीत जैसा नहीं हो। उन्हें सही-सलामत वापस भारत लाया जाए, लेकिन भारत के तीन तथाकथित जर्नलिस्ट देश आदि को ताक पर रख कर ऎसी स्टोरी अपने माध्यमों में शाया करते हैं, जिनसे जाधव भारत का जासूस साबित हो। ये हैं करण थापर, प्रवीण स्वामी और चंदन नंदी।

कोई ताज़्ज़ुब नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान के वकील कुरैशी ने अपना पक्ष मज़बूत करने के लिए इन्हीं तीनों के आलेखों का इस्तेमाल किया। इनमें से एक तो अपने संस्थान द्वारा स्टोरी डिलीट कर देने पर रावण बन जाता है, और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का राग अलापते हुए गाली-गलौज करता है। यह एक दलाल द्वारा ओढ़ी गई बेशर्मी की हद है।

यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि इन तीनों ने अपने पाकिस्तानी आका के इशारे और उससे कुछ लाभ मिलने पर ही ऐसे आलेख लिखे। ज़रा सोचें, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? यह पत्रकारिता है? जनाब, यह निहायत गिरी हुई हरकत है। यह देशद्रोही कृत्य है। मेरा मानना है कि इसके लिए इन सभी की कड़ी जांच होनी चाहिए। इनकी नागरिकता छीन ली जानी चाहिए और जूते मार कर देश के बाहर धकेल दिया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान रखें कि आप जब-जब किसी भी आतंकी घटना के लिए सिर्फ पाकिस्तान को दोषी ठहराते हैं, तब-तब कश्मीरी मुस्लिम और देशभर में फैले उनके स्लीपर सेल मासूम और निर्दोष साबित होते हैं, जबकि ऐसा है नहीं।

कहा जाता है कि नौकरी नहीं मिलती, तो नौजवान भटक जाते हैं। फिर आईएएस और आईपीएस बनने के बाद जो हथियार सहित भटक जाते हैं, वे क्या हैं? देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी सहायता से पढ़ रहे विद्यार्थी ऎसी किसी घटना पर जश्न मनाते कैसे दिखते हैं? सीआरपीएफ के इतने सारे जवानों को शहीद कर देने वाला कौन था? क्या हमले में इस्तेमाल वाहन पाकिस्तान से आया था? क्या उसमें प्रयुक्त इतना सारा आरडीएक्स पाकिस्तान से आना संभव है? क्या उसके लगातार पीछा करने के बावजूद किसी को नज़र न आना संभव है? ज़ाहिर है, एक बड़े पैमाने पर स्थानीय सहयोग के बिना यह कुकर्म नितांत असंभव है।

तो इलाज क्या है?

इलाज कश्मीरी पंडितों के जेनोसाइड में छिपा है।

जिस तरह वहां से कश्मीरी पंडित भगाए गए थे, ठीक उसी तरह मुस्लिम जनसंख्या का विस्थापन और हिंदू आबादी को बहुसंख्यक करना। सबसे पहले वहां से अलगाववादी नेताओं को उठा कर अलग-अलग प्रांतों में भेजा जाना चाहिए। उसके बाद मुस्लिम नागरिकों को वहां से उठा कर देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाकर विशेष बस्तियों में बसाना चाहिए और साथ ही साथ कश्मीर घाटी में सुरक्षित कॉलोनियां स्थापित कर वहां हिन्दुओं को बसाया जाना चाहिए।

अब्दुल्ला और मुफ्ती खानदान जैसे दोगले नेता परिवार अगर चूं-चपड़ करें, तो यही हश्र इनका भी होना चाहिए। आपको यह दिवास्वप्न लग सकता है, लेकिन ज़रा सोचें, जब आप किसी बांध के लिए एक पूरा गांव या कस्बा विस्थापित कर सकते हैं, तो देश का एक हिस्सा बचाने के लिए यह कार्य असंभव कैसे है?

मेरा मानना है कि इसके बिना इलाज़ संभव नहीं है।

समाप्त

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