वही करना होगा, जो सीताहरण के समय किया था प्रभु राम ने

आखेट पर गए श्रीराम ने ज्यों ही सिंह की दहाड़ सुनी त्यों ही विजयधनुष की प्रत्यंचा पर शब्दभेदी शर संधानित हो गये। बाण सिंह का हृदय बींधने ही वाले थे कि श्रीराम के कानों में एक करुण पुकार गूँज उठी।

हे भरतवंशीय आर्य! बचाओ…

पुकार सुन भगवान श्रीराम के शरों की दिशा बदल गयी। इधर प्रत्यंचा खिंची उधर भेड़ियों के सर धड़ से अलग हो गये।

दौड़कर रघुनाथ असहाय स्त्री के पास पहुँचे तो अवाक रह गये। देखा एक तेजस्विनी घायल अवस्था में कराह रही थी। घावों से भरा हुआ मस्तक, रक्तरंजित बायां हाथ और पैरों में कंटक धँसे हुये। अपार पीड़ा से कराहती वह स्त्री और नहीं बल्कि अपनी भारत माँ थी।

माँ भारती को इस दशा में देख राम के क्रोध का ठिकाना न रहा… रोष में बोले, “बोल माँ किसने तेरी ये दशा की। इस एक बाण से उसके समस्त कुल का मैं नाश कर दूँगा।”

भारतमाता ने उत्तर दिया, “पुत्र! मेरे मस्तक पर स्थित 44 घाव मेरे अमृतपुत्रों के स्मृतिचिह्न हैं जो एक कायर हमले में बलिदान हुये। मेरी रक्तवर्णी बायीं भुजा पूर्वोत्तर और बंगाल का भाग है जो निरन्तर अलगाववाद और तुष्टिकरण की तीव्रतम अग्नि में जल रहा है। मेरे पैरों में लगे काँटे केरल के वो आतंकी हैं जो मेरे सहृदय पुत्रों को मार रहे हैं।”

“तो बता माँ क्या उपाय करूँ? तत्क्षण ब्रह्मास्त्र चला कश्मीर की धरती को पाताल पहुँचा दूँ? आग्नेयास्त्र के प्रयोग से बंगाल के विधर्मियों को राख कर दूँ? या पाशुपतास्त्र के संधान से केरल के आतताइयों की पीढ़ियां तबाह कर दूँ? या कोई कूटनीतिक उपाय करूँ?”

“नहीं वत्स! वही करो जो सीताहरण के समय किया था। अकेले नहीं बल्कि समग्र भारतवर्ष की जनता को जागृत करो। हनुमान की शक्तियों को पहचानो। सुग्रीव से मित्रता करो। बाली का वध करो। नल नील की तकनीकी को तराशो और सबसे महत्वपूर्ण जामवंत की सामरिक, राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक युक्तियों का समवेत उपयोग करो। जनता में से नए हनुमान जामवंत सुग्रीव आदि को खोजो। उनका समुचित उपयोग करो।”

“पहले समस्या की जड़ को पहचानो। समस्या वो नहीं जो कहते है ‘इवन इफ यू पेव आर पाथ विद गोल्ड इट इज़ नॉट इनफ फ़ॉर अस, वी वोंट बी सेटिस्फाइड!’ या जो ‘आज़ादी का मतलब क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह’ का नारा देते हैं।”

“समस्या की जड़ वह बेहूदा विचार है जो इन लोगों से ये सब करवाता है। वह विचार जो अलगाववाद की जड़ है। वह विचार जो हिन्दुस्थान के वासियों को हिन्दुस्थान की संस्कृति से अलग करता है। उस विषैले विचार पर हमला करो। उसका समूल नाश कर दो।”

“इस विचार को यदि तुमने मार दिया तो पुनः कश्मीर से कन्याकुमारी तक, अटक से कटक तक शांति की पुनर्स्थापना हो सकती है। आतंकवाद हमेशा के लिये मिट सकता है। तुम्हारी ये पुण्यमयी भारत माँ पुनः स्वस्थ और हरितमयी हो सकती है।”

“इसीलिये हे राम… उत्तिष्ठ”

उत्तिष्ठ शब्द सुनते ही मेरी नींद खुल गयी। पर भारत माँ और भगवान श्रीराम दोनों के शब्द अभी भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं…

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