अंतिम वाक्य तक अवश्य पढ़ें…

पाक पर फिर कभी… अभी कश्मीर में उग्र सैन्य कार्यवाही की ज़रूरत है। कश्मीर में सारे आतंकी नेता जो हुर्रियत की छतरी के नीचे है… अनेक विमान अपहरण, हत्या… फौजियों की हत्या में संलिप्त हैं… उनको eliminate किया जाना शुरू कर दिया जाना चाहिए।

भारत की जनता को यह समझाना बेहद ज़रूरी है कि यदि घाटी की कश्मीरी अलगाववादी जनता इस्लाम, निज़ामे-मुस्तफ़ा, जिहाद और पाकिस्तान से मिलने की इच्छुक न होती तो पाकिस्तान की मजाल नहीं थी कि वह हर प्रकार का आतंकवाद भारत की निरीह जनता पर थोप देता। हमारे 35000 सुरक्षा बलों और हज़ारों लोगों की हत्या में सदैव से घाटी के रहने वाले जेहादी ही संलिप्त रहे हैं।

भूलिए नहीं… संसद पर हमला तो अफ़ज़ल गुरु और दिल्ली के एक कश्मीरी प्रोफेसर की मिलीभगत से ही अंजाम दिया गया था। धनतेरस पर दिल्ली में सबसे भयानक RDX वाले हमलों को घाटी के कश्मीरी आतंकियों ने ही अंजाम दिया था जिसमें कुल मिलाकर 85 लोगों की मौत हुई थी। देश में होने वाली हर जेहादी हत्या के तार कश्मीर से क्यों जुड़े होते हैं?

यासीन मलिक टीवी पर साफ साफ हामी भरता है कि उसने श्रीनगर में एयरफोर्स के 4 अधिकारियों को हैंड ग्रेनेड फेंक कर मारा था। बिट्टा कराटे की भी टीवी पर स्वीकारोक्ति है कि 40 कश्मीरी हिंदुओं को मारने के बाद उसने कश्मीरी हिंदुओं की लाशें गिनना छोड़ दिया था। राज़ फाश हो चुका है कि रुबिया सईद के बदले में 12 आतंकियों को छुड़वाने का नाटक… इसी कश्मीरी घराने की साज़िश थी।

इलियास कश्मीरी ने अमेरिकी बमबारी में मरने से पहले स्वीकार किया था कि छत्तीसिंघपुरा में भारतीय सैनिकों के 50 परिजनों की हत्या उसने हिजबुल के कहने पर की थी।

सैकड़ों नहीं हज़ारों घटनायें हैं जिससे यह पता चलता है कि मुम्बई, अयोध्या, लखनऊ, दिल्ली, जम्मू सहित देश के हर कोने में होने वाली आतंकी जेहादी वारदातों में कश्मीरी दिमाग और मैनपावर इस्तेमाल होता है… तब भी कश्मीर से ध्यान हटाने के लिए पूरे देश मे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाए जा रहे हैं। कश्मीर घाटी के बाशिंदे और पाकिस्तान की ISI की सोच में कोई अंतर नहीं है… दोनों ही भारत के विनाश का एक सा सपना देखते हैं।

पिछले 10 साल हो गए रटते हुए कि प्रतिवर्ष 100 से लेकर 500 करोड़ रूपए इन आतंकियों और देशद्रोहियों पर सुरक्षा के नाम पर क्यों खर्च किये जा रहे हैं? बमुश्किल दो दिन पूर्व पुलवामा हमले से नाराज़ और हताश जनता को संतुष्ट करने के लिए यह सिक्योरिटी आंशिक रूप से हटाई गई है।

यदि कश्मीर सुधर गया… आतंक पर काबू आ गया तो पाकिस्तान तो बगैर पैरों का जिन्न रह जाएगा! याद कीजिए मुफ़्ती की इच्छा और स्थानीय अलगाववादी जनता को खुश करने के लिए केंद्र सरकार ने हलवाड़ा की 70 साल पुरानी सैनिक बैरकों को बुलडोजरों से गिराया था… उसी प्रकार गिलानी, यासीन मलिक, शब्बीर शाह और मीर वायज़ जैसे भारत के दुश्मनों के घरों को गिराइए।

पाकिस्तान से जंग आप इसलिए नहीं जीत पाएंगे कि जब परमाणु बम का खतरा पैदा होगा तो भारत की जनता आपके कपड़े फाड़ देगी! यही जनता जो ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगा रही है… आपके घर के बाहर युद्ध रुकवाने के लिए हड़ताल पर बैठ जाएगी। कंधार विमान अपहरण कांड में जनता का यह रुख आप देख चुके हैं। बेहतर और सर्वश्रेष्ठ विकल्प यही है कि घाटी को सुधार दीजिए… ज़्यादा नहीं 100-200 टॉप हुर्रियत और कुछेक टॉप राजनीतिज्ञों को यथास्थान पहुचाइए… किला फतह।

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