इतिहास के पन्नों से : 1965 भारत पाक युद्ध

अप्रैल का महीना, सन 1965, ग्रीष्म ऋतु का आरम्भ होने को था। दुश्मन देश पाकिस्तान भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर का प्लान बनाया। इसके तहत कश्मीर में घुसपैठ करने और भारतीय शासन के विरुद्ध विद्रोह करने का षड्यंत्र था। 5 अगस्त, 1965 को पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ युद्ध आरम्भ कर दिया।

अनुमानतः 26 हजार से 33 हजार पाकिस्तानी सैनिक कश्मीरी वस्त्रों में एलओसी पार कर कश्मीर और उसके अंदरूनी इलाकों में घुस आए। 15 अगस्त को स्थानीय कश्मीरियों ने भारतीय सेना को सीमा उल्लंघन की जानकारी दी ।

भारत ने त्वरित सैन्य कार्रवाई करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ हमला बोल दिया। शुरुआत में भारतीय सेना को सफलता मिली। उसने तीन पहाड़ियों पर कब्जा छुड़ा लिया। अगस्त के अंत तक पाकिस्तान ने टीट्वाल, उरी और पुंछ के महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा जमा लिया। वहीं, भारतीय सेना ने भी पाकिस्तान शासित कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया।

हाजीपीर दर्रे को जीतना भारत के लिए बड़ा महत्वपूर्ण था, मेजर रंजीत सिंह दयाल ने कम्पनी लीड की थी और फ़र्स्ट बटालियन पैराशूट रेजिमेंट के जवानों ने भयंकर लड़ाई लड़कर 29 सितम्बर को हाजी पीर पोस्ट पर तिरंगा फहराया और सबसे अहम बात यह कि इस लड़ाई में रंजीत की माँ ने चिठ्ठी लिखी थी उन्हें और चिठ्ठी में लिखा था! – “बेटा इंच इंच कट जाना पर लड़ाई में पैर पीछे मत हटाना। ऐसी होती है एक सैनिक की माँ। ”

फ़र्स्ट पैरा ने हाजी पीर के रास्ते में पड़ने वाले पाकिस्तानी चौकियों का विध्वंस किया और 3 दिन भूखे प्यासे बिस्कुट के दम पर रहकर हाजी पीर पर कब्जा किया और अंत तक पाकियों के लाख प्रयासों के कब्जा नहीं होने दिया। और सरेंडर कर चुके पाकिस्तानियों की टाँगे रस्सी से बांध दीं फिर उनके हाथ भी ,और सबको एक लंबी रस्सी से बाँधा और उनसे कुली का काम लिया।

हाजी पीर दर्रे पर कब्जे से पाकिस्तानी फौज पूरी तरह से बौखला गई। उसे डर था कि मुजफ्फराबाद पर भी भारत कब्जा जमा सकता है। 1 सितंबर, 1965 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम लॉन्च किया।
ग्रैंड स्लैम अभियान के तहत पाकिस्तान ने अखनूर और जम्मू पर व्यापक हमले शुरू कर दिए। ऐसा करके वह भारतीय सेना पर दबाव बनाने लगा। कश्मीर में रसद और अन्य सामग्री पहुंचाने के रास्ते पूरी तरह से बंद हो गए।

हाजी पीर दर्रे पर भारतीय कब्जे से पाकिस्तान राष्ट्रपति को लगा कि उनका ऑपरेशन जिब्राल्टर खतरे में है। उन्होंने और अधिक संख्या में सैनिक, तकनीक रूप से सक्षम टैंक भेजे। इस अचानक हुए हमले के लिए भारतीय फौज तैयार नहीं थी।

पाकिस्तान को इस वार का फायदा मिलने लगा। भारतीय सेना ने इस नुकसान की भरपाई के लिए हवाई हमले शुरू कर दिए। अगले दिन पाकिस्तान ने भी कड़ा प्रहार किया। उसने बदले में कश्मीर और पंजाब में भारतीय सेना और उसके अड्डों पर हवाई हमले किए।

कश्मीर में तेजी से पाकिस्तानी फौज को बढ़त मिल रही थी। वहीं, भारतीय फौज को इस बात का डर था कि अगर अखनूर हाथ से निकल गया तो कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन जाएगा

अखनूर बचाने के लिए भारतीय फौज ने पूरी ताकत झोंक दी। भारत के हवाई हमलों को विफल करने के लिए पाकिस्तान ने श्रीनगर के हवाई ठिकानों पर हमले किए। इन हमलों ने भारत की चिंता को बढ़ा दिया।
पाकिस्तान की स्थिति बेहतर होने के बावजूद भी भारत के आगे एक न चली। इसका सबसे बड़ा कारण पाकिस्तानी सेना का कमांडर का बदलना रहा । जब अखनूर पर पाकिस्तान कि बढ़त थी तभी अचानक उन्होंने कमाण्डर बदलने कि भयंकर रणनीतिक चूक की, मेजर जनरल अख़्तर हुसैन मलिक के स्थान पर मेजर जनरल याह्या खान भेजे गये और उन्होंने जोश में ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू किया जो फेल हो गया और पाकिस्तान बैकफुट पर आने लगा यहीं से। और

अचानक हुए इस बदलाव से पाक सेना हक्की-बक्की रह गई। माना जाता है कि अगले 24 घंटों तक पाक सेना को कोई निर्देश नहीं दिया गया। इसका फायदा भारत को मिला। इस दौरान भारत ने अपनी अतिरिक्त सैनिक टुकड़ी और साजो-सामान अखनूर पहुंचा दिया।

इस तरह से अखनूर सुरक्षित हो सका। भारतीय सेना के कमांडर भी आश्चर्यचकित थे कि पाकिस्तान इतनी आसानी ने जीती हुई बाजी क्यों हार रहा है। इसी बीच, सैनिक रणनीति के तहत भारत ने बड़ा ही कठोर फैसला लिया, जिसे भारत-पाकिस्तान युद्ध के इतिहास में अहम माना जाता है।

भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख ने तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को भारत-पाक पंजाब सीमा पर एक नया फ्रंट खोलने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, सेनाध्यक्ष ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री साहसी प्रधान मंत्री थे उनको यह बात जम गई। उन्होंने सेनाध्यक्ष के फैसले को रद्द करते हुए इस हमले का आदेश दे दिया।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करते हुए पश्चिमी मोर्चे पर हमला करने की शुरुआत कर दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेतृत्व में भारतीय फौज ने इच्छोगिल नहर को पार पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश किया। इच्छोगिल नहर भारत-पाक की वास्तविक सीमा थी।

तेजी से आक्रमण करती हुई भारतीय थल सेना लाहौर की ओर से बढ़ रही थी। इस कड़ी में उसने लाहौर हवाई अड्डे के नजदीक डेरा डाल लिया। भारतीय सेना की इस दिलेरी से पाकिस्तान सहित अमेरिका भी दंग रह गया। उसने भारत से एक अपील की।

अमेरिका ने भारतीय सेना से कुछ समय के लिए युद्ध विराम करने का आग्रह किया, जिससे पाकिस्तान अपने नागरिकों को लाहौर से निकाल सके। भारत ने अमेरिका की बात मान ली। लेकिन इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था।

पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव कम करने के लिए भारत के खेमकरण पर हमला कर दिया। उसका मकसद भारतीय फौज का लाहौर से ध्यान भटकाना था। बदले में भारत ने भी बेदियां और उसके आसपास के गांवों पर हमला कर कब्जे में ले लिया।

कश्मीर में नुकसान झेल चुकी भारतीय सेना को लाहौर में घुसने का फायदा यह मिला कि उसे अपनी सेना लाहौर की ओर भेजनी पड़ी। इससे अखनूर और उसके इलाकों में दबाव कम हो गया।

8 सितंबर को पाक ने भारत के मुनाबाओ पर हमला कर दिया। मुनाबाओ में पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए मराठा रेजीमेंट को भेजा गया, लेकिन रसद और कम सैनिक होने के कारण मराठा रेजीमेंट के कई जवान शहीद हो गए। आज इस चौकी को मराठा हिल के नाम से जाना जाता है।

10 सितंबर को मुनाबाओ पर पाक का कब्जा हो गया। खेमकरण पर कब्जे के बाद पाकिस्तान अमृतसर पर कब्जा करने के सपने संजोंने लगा। लेकिन भारतीय सेना द्वारा ताबड़तोड़ हमले से वह खेमकरण से आगे नहीं बढ़ पाई।

यहां की लड़ाई में 97 से अधिक टैंक भारतीय सेना ने मार गिराए थे, जबकि भारत के सिर्फ 30 टैंक ही नष्ट हुए थे। इसके बाद यह जगह अमेरिका में बने पैटन टैंक के नाम पर पैटन नगर के नाम से जानी जाने लगी।

इसके बाद अचानक दोनों सेनाओं की ओर से युद्ध की गति धीमी हो गई। दोनों ही एक-दूसरे के जीते हुए इलाकों पर नजर रखे हुए थे। इस जंग में भारतीय सेना के तकरीबन तीन हजार और पाक सेना के 3800 जवान मारे गए।

भारत ने युद्ध में 710 वर्ग किमी और पाकिस्तान ने 210 वर्ग किमी इलाके पर कब्जा जमा लिया। भारतीय सेना के कब्जे में सियालकोट, लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ इलाके शामिल थे।
वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान ने भारत के छंब और सिंध जैसे रेतीले इलाकों पर कब्जा कर लिया। क्षेत्रफल के हिसाब इस युद्ध में भारत को पाकिस्तान पर बढ़त मिल रही थी।

हर युद्ध का अंत होता है। इसका भी हुआ। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर दोनों देश 22 सितंबर को युद्ध विराम के लिए राजी हो गए। भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 11 जनवरी, 1966 को ऐतिहासिक ताशकंद समझौता हुआ।

और जब ताशकंद में शास्त्री जी पाकिस्तान को हाजीपीर लौटने से मना कर दिए तो रशियन बोले कि अगर ऐसे करेंगे तो पाकिस्तान कच्छ के रण से नहीं हटेगा फिर आप लाहौर से नहीं हटेंगे फिर वो कश्मीर से नहीं हटेगा फिर युद्ध कैसे बन्द होगा ??? अंततः शास्त्री जी हाज़पीर लौटा दिए। जब यह बात उनकी पत्नी ने सुनी तो उसी शाम फोनपर तो वह गुस्सा हो गईं और शास्त्री जी से बात करने को मना कर दिया। और उसी रात शास्त्री जी की मृत्यु हो गयी रहस्यमय तरीके से।

जब शास्त्री जी के पास सीज़फायर का प्रस्ताव आया तो वो जनरल से पूछ लिए की भारत की क्या स्थिति है युद्ध जीतने में ? तो जनरल ने कहा कि हमारे पास टैंक कम हैं, गोला-बारूद का स्टॉक खत्म हो रहा है तेजी से और भी बहुत दिक्कत बताए, जवान शहीद हो रहे हैं, युद्ध मुश्किल में पड़ रहा है। जबकि बाद में आंकलन हुआ तो खबर लगी कि उस वक्त तक पाकिस्तान का 80% गोला-बारूद खप चुका था और भारत का मात्र 14%।

1965 की लड़ाई में भारतीय सेना को जो मुश्किल देखनी पड़ीं उनमें जनरल चौधरी का बड़ा हाथ था। वह एयरफ़ोर्स से कोऑपरेट नहीं कर रहे थे। उन्हें था कि ये लड़ाई हम अपने बूते जीत लेंगे और असफल भी होने के बाद किसी की सुन नहीं रहे थे। उस समय के वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल के अनुसार चौधरी अकड़ू और सुप्रीम सिंड्रोम के व्यवहार वाले आदमी थे।

पाकिस्तान ने भी भयंकर भूल की थी जो उसने सोचा था कि कश्मीर में विद्रोह करवा देगा लेकिन यह तो हुआ नहीं परन्तु भारतीय सेना जब लड़ने पर आई तो गोला बारूद बमबारी सब बेकार हो गयी। भीषण लड़ाई के बावजूद कश्मीर में बड़ी कड़ी टक्कर मिली और पँजाब का मोर्चा भी खुल गया और टैंक पहुँच गए लाहौर, पहली बार तो बड़ी आसानी से लाहौर पहुँच गए लेकिन जब आम जनता को निकालने की अपील पर सेना ने मौका दिया तभी भारतीय इंटेलीजेंस फेल्योर से हुआ यह कि 3 जाट जो लाहौर के पास थी उसे रिइंफोर्समेंट भेजने के बजाय सारी सेना हटा ली गयी मजबूर होकर 3 जाट को पीछे हटना पड़ा और जब दुबारा लड़ाई हुई तो यह ऐसी भीषण लड़ाई थी जैसे WW2 इन जर्मनी के अंदर शहरों में लड़ाई। पाकिस्तानी एक एक घर गली में बैठे थे और भारतीय जवानों ने एक एक दरवाजा खोल कर गली गली में भीषण युद्ध किया। लाशें ऐसे बिछी थीं कि पीने को पानी नहीं। एक तालाब था वह भी पाकिस्तानियों की लाशों से भरा हुआ। अंत में उसका गन्दा खून मिला पानी पीकर जिंदा रहे सैनिक….

भारत के लिए 1965 की लड़ाई ऐसे ही थी कि आप दिसम्बर के महीने में खलिहान में नितांत अकेले घुटने भर पानी में खड़े होकर गेंहू सींचने के लिए ट्यूबवेल चला रहे हों और तभी बिच्छू डंक मार दे। इंटेलीजेंस फेल्योर था भारत का। इन्हें पाकिस्तान की घुसपैठ का अंदाज़ा ही नहीं हुआ लेकिन जब भारतीय सेना को घुसपैठियों की खबर मिली तो ये इस बात पर सतर्क हो गए कि ये पाकिस्तानी सेना है न कि कोई कबीलाई । उन्होने बड़ी चतुराई और कौशल का प्रयोग करके लड़ाई लड़ी पर उन्हें इसकी खबर नहीं थी कि पाकिस्तान ने loc के पास भारी मात्रा में तोपखाना जमा रखा है और एक कटु सत्य यह भी है कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल जेएन चौधरी भी बेखबर थे सेना की हालत से।

65 में भारतीय सेना और वायुसेना को बहुत नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि उपकरणों की गुणवत्ता में पाकिस्तान आगे था हर जगह,अमेरिकी मदद और वहां से प्राप्त दैत्याकार सेबर जेट विमान तकनीकी रूप से बहुत उन्नत थे। उसने बहुत तैयारी से प्लानिंग की थी। जबकि भारतीय एक तो तैयार नहीं थे तिसपर तकनिकीगत रूप से कमजोर थे उसके बाद भी हमलोग 1965 की जंग जीत गये यह बहुत बड़ी बात थी क्योंकि ww2 के बाद का सबसे भीषण युद्ध यही हुआ है अबतक, टैंक, आर्टिलरी यानी तोपखाना, आर्मर्ड ट्रकों, गाड़ियों के साथ ट्रेंच और टाउन कॉम्बैट भी, साथ ही कश्मीर से लेकर पूरे गुजरात तक के क्षेत्र पर लड़ाई।

इस लड़ाई ने यह सिद्ध कर दिया कि नहीं भारत अगर तैयार नहीं है तो भी उसे हल्के में लेना मूर्खता होगी, और इस लड़ाई की जीत ने शास्त्री जी का कद भारत नहीं दुनिया में भी बहुत ऊँचा उठा और इंडियन आर्म्ड फोर्सेस की नई पहचान बनी के ये बैटल वर्दी हैं। किसी भी हालत में, किसी से भी कैसे भी लड़कर जीत जाने वाले सैनिक।

नोट– युद्ध कभी भी ताकत से नही जीते जाते हैं, इसके लिए मातृभूमि पर मर मिटने की ललक,देशप्रेम की असीम भावना, बिना अस्त्र शस्त्र के ही दुश्मनो को काल के गाल में पहुचाने का साहस और पहाड़ो जैसा कलेजा चाहिए होता है । जो भारत जैसे देश के अलावा कहीं नही मिलता,
ज्यादा जीवन से अच्छा चार दिन यशस्वी होकर रहो।।

जय हिंद, जय हिंद की सेना

  • अनूप राय

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