आतंकवाद का कैंसर और जड़ से ख़ात्मा

कैंसर के इलाज के कुछ मोटे मोटे सिद्धांत हैं।

पहला, कैंसर का शक हो तो उसे तब तक कैंसर माना जाए जब तक उसके कैंसर नहीं होने की पुष्टि ना हो जाये। यहाँ बेनिफिट ऑफ डाउट बीमारी को नहीं, मरीज़ को दिया जाता है।

दूसरा, कैंसर के आपरेशन का सिद्धांत है – वाइड लोकल एक्सिजन… यानी कैंसर के आस-पास के बड़े से एरिया को काट के हटा दिया जाता है। उसमें कंजूसी नहीं की जा सकती।

तीसरा सिद्धांत है – लोकल और रीजनल लिम्फ नोड क्लीयरेंस… आस पास के जितने लिम्फ नोड होते हैं, उन सबको कैंसर की मौजूदगी के लिए जाँचा जाता है और शक होने भर से निकाल दिया जाता है।

अगला सिद्धांत है, केमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी… शरीर के छुपे हुए कैंसर सेल्स को मारने के लिए… जिससे कैंसर जड़ से खत्म हो जाये।

और जो लोग कैंसर के इलाज से जुड़े हैं, वे जानते हैं कि आज बहुत से कैंसर का इलाज संभव है। आज वह बात नहीं रह गयी जब एक समय कैंसर का मतलब डेथ सेंटेंस हुआ करता था।

आतंकवाद के इलाज के लिए भी बिल्कुल यही प्रिंसिपल रखने होंगे।

अगर किसी के आतंकी होने की शंका है, तो इसमें संदेह का लाभ उसे नहीं दिया जा सकता। कार्रवाई के लिए शंका पर्याप्त आधार होना चाहिए।

आतंकी का वाइड लोकल एक्सिजन होना चाहिए… उसके बाप, भाई, यार दोस्त, उसके सारे जानने वाले, उसके मोबाइल फ़ोन के सारे कॉन्टैक्ट… सभी एक साथ शक के दायरे में आ जाने चाहिए। अगर आपने बस में कभी उसके साथ वाली सीट पर सफर किया है तो यह सिद्ध करने की ज़िम्मेदारी आपकी है कि आप भी आतंकी नहीं हो।

लिम्फ नोड्स… मीडिया, सिनेमा, साहित्य और यूनिवर्सिटी… ये समाज के लिम्फ नोड हैं। समाज की सभी बीमारियों से लड़ने की ज़िम्मेदारी इन्ही इंस्टीट्यूशन्स की है… दुर्भाग्य से कैंसर सेल इन्हीं में फलते फूलते हैं। तो इन संस्थाओं में हर व्यक्ति की निगरानी, और शंका होने पर उनका निराकरण आवश्यक है।

और अंत में केमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी… शिक्षा और प्रचार माध्यमों के माध्यम से समाज में फैले अलगाववाद, और राष्ट्रविरोधी विचारों को समाप्त करना। जिन बच्चों और युवाओं के दिमाग में राष्ट्रद्रोह का वामपंथी कीड़ा भरा गया है, उसका आइडियोलॉजिकल इलाज…

आतंकवाद से निबटने के लिए ऑन्कोलॉजिस्ट की मानसिकता होनी चाहिए। कैंसर का शक एक इमरजेंसी है। और अगर किसी को कैंसर हो तो उसके शरीर में निकलने वाली हर गाँठ, शरीर में होने वाला हर परिवर्तन शक के दायरे में आ जाता है।

तो यह हर नागरिक का दायित्व है कि वह अपने आपको शक के दायरे से बाहर रखे। वरना वाइड लोकल एक्सिजन में पाँच-दस बेगुनाह भी आ ही जाएँगे। यह कीमत तो चुकानी पड़ेगी। इसकी शिकायत मत कीजियेगा कि केमोथेरेपी से उल्टियाँ हो रही हैं और बाल झड़ रहे हैं।

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