इतिहास के पन्नों से : JKLF के मकबूल बट्ट की फाँसी का बदला निर्दोष जज की हत्या!

मकबूल बट्ट का जन्म तब हुआ था, जब भारत पाक का बँटवारा नहीं हुआ था। बंटवारे के समय उसकी आयु सिर्फ 10 साल की थी। बड़ा होकर उसने पेशावर यूनिवर्सिटी से इतिहास और पोलिटकल साईंस में मास्टर डिग्री की।

वह कश्मीर के बंटवारे के सख्त खिलाफ था। वह चाहता था कि अखण्ड कश्मीर न तो भारत के कब्जे में रहे और न पाकिस्तान के। वह कश्मीर को एक अलग आज़ाद देश के रुप में देखना चाहता था।

वह कुछ दिनों के लिए बर्मिंघम चला गया। वहीं पर उसने एक अलगाववादी संगठन “JKLF” बनाया। वह फिर 1966 में भारत के कब्जे वाले कश्मीर में आ गया, जहां उसकी पुलिस से भयंकर मुठभेड़ हुई। इस मुठभेड़ में मकबूल बट्ट का साथी औरंगजेब मारा गया। वहीं भारतीय क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी अमर चंद भी मारे गये।

मकबूल बट्ट को अरेस्ट कर लिया गया। अदालत में मकबूल बट्ट ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसे फाँसी की सजा सुनाई गयी। उसे श्रीनगर के जेल में रखा गया।

बात 1968 की है जब मकबूल बट्ट ने अपने दो साथियों की मदद से सुरंग खोदी और जेल से फरार हो गया। वह सीधे पाकिस्तान जा पहुँचा। 1971 में भारतीय हवाई जहाज एफ – 27 (गंगा ) का अपहरण कर लिया गया, जिसे जबरन लाहौर ले जाया गया। वहां क्रू मेम्बर और यात्रियों को उतार कर जहाज में आग लगा दी गयी।

इस कांड का मास्टर माइंड मकबूल बट्ट निकला। भारत की पहल पर पाकिस्तान ने मकबूल बट्ट को गिरफ्तार कर लिया, पर उसे भारत को सौंपने से इंकार कर दिया। जांच चली। पाकिस्तान ने इस कांड को 2 फरवरी 1971 को भारतीय खुफिया विभाग का एक सुनियोजित ड्रामा करार दिया ।

इस बात पर नाराज हो भारत ने पाकिस्तान को अपने ऊपर से उड़ने पर रोक लगा दी। जो हवाई गलियारा पाकिस्तान को मिला था वह बंद हो गया। अब पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान में सम्पर्क सूत्र बहुत लम्बे दायरे से होकर गुज़रने लगा। यह रोक दिसम्बर ’71 की लड़ाई में भारत के बहुत काम आया था।

मकबूल बट्ट को पाकिस्तान ने 1974 में रिहा कर दिया। गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की तरफ भागता है। मकबूल बट्ट के दिन भी पूरे हो गये थे। वह रिहा होकर भारत चला आया। यहां पहले से हाई अलर्ट जारी था। मकबूल बट्ट पकड़ा गया।

उसे फाँसी की सजा पहले ही मिली थी। उसे तिहाड़ जेल में रखा गया। मकबूल बट्ट ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। दया याचिका राष्ट्रपति के पास अभी विचाराधीन पड़ी थी। JKLF के लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए बर्मिंघम में भारतीय डिप्लोमेंट रविन्द्र महात्रे का अपहरण कर लिया। इस अपहरण से जब भारत सरकार नहीं झुकी तो उन लोगों ने रविन्द्र महात्रे की 6 फरवरी 1984 को हत्या कर दी। अब पानी सर के ऊपर से गुजर गया था।

राष्ट्रपति ने मकबूल बट्ट की दया याचिका खारिज कर दी। 11 फरवरी 1984 को मकबूल बट्ट को फाँसी दे दी गई। उसे तिहाड़ जेल के अंदर ही दफना दिया गया। JKLF ने एक और वीभत्स खेल खेला। मकबूल बट्ट के फांसी होने के पाँच साल बाद जज नील कंठ की हत्या कर दी। ये वही जज थे जिन्होंने मकबूल बट्ट को फाँसी की सजा सुनाई थी।

कोर्ट सबूत मांगता है। उसी सबूत के आधार पर जज फैसला सुनाता है। वैसे भी मकबूल बट्ट ने अदालत में अपना जुर्म मान लिया था। फिर एक निरीह जज को मारने का क्या तुक था? आजकल इसी JKLF का मुखिया यासीन मलिक है ।

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