जिसे आतंकियों से खतरा ही नहीं, उसे सुरक्षा क्यों?

हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा हटाने के बाद एक तरफ उन्होंने बड़े तैश में कहा, कि हमने सुरक्षा मांगी ही नहीं थी और इसके हटने से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन दूसरी तरफ उन हुर्रियत नेताओं के लिए कांग्रेस तड़प उठी है, उसके नेता सैफुद्दीन सोज़ ने उनकी सुरक्षा हटाने का विरोध किया है।

सोज़ ने हुर्रियत नेताओं को ‘चरित्र प्रमाणपत्र’ दिया है कि वो तो कभी हिंसा का समर्थन करते ही नहीं। सरकार की ये सोच कश्मीर के बारे में संकीर्ण सोच है और इस कदम का उलटा असर होगा और उसका सरकार को कोई लाभ नहीं होगा (Counter Productive).

हिंसा का समर्थन नहीं करते तभी 42 जवानों की हत्या पर ‘खामोश’ हैं और हमेशा ‘खामोश’ ही रहते हैं।

लगता है सैफुद्दीन सोज़ धमकी देना चाहते हैं कि हुर्रियत नेताओं की सुरक्षा हटाने का नतीजा अच्छा नहीं होगा।

अरे भाई, वो तो खुद कह रहे हैं कि जो सुरक्षा उन्होंने मांगी ही नहीं उसके हटने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा, तो फिर सैफुद्दीन सोज, आप क्यों मामा बन रहे हो!

अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका वाड्रा, अब्दुल्ला बाप बेटे, महबूबा मुफ़्ती, ममता बनर्जी, केजरीवाल और अन्य जो भी नेता सरकार से मिली सुरक्षा का लाभ ले रहे हैं, वो आज ही बता दें कि उन्हें सुरक्षा चाहिए या नहीं।

फिर अगर सरकार इन सबकी सुरक्षा हटा दे तो ये ना कहें हुर्रियत नेताओं की तरह कि हमने तो सुरक्षा कभी मांगी ही नहीं।

वैसे भी गांधी परिवार तो विदेशी गुप्त यात्राओं में सुरक्षा ले कर जाता ही नहीं है… तो फिर देश में सुरक्षा ले कर क्यों जनता का पैसा बर्बाद करते हैं। आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों से मिलते समय तो उनकी सुरक्षा आईएसआई ही करती होगी।

वैसे भी देखा जाये तो जिन नेताओं के नाम मैंने ऊपर लिखे हैं उन्हें कभी किसी आतंकी संगठन से कोई धमकी नहीं मिलती… तो फिर इन्हें किससे खतरा हो सकता है जो इन्हें सुरक्षा दी जाये।

आतंकी संगठनों की हिट लिस्ट में तो नरेंद्र मोदी, आरएसएस और भाजपा के नेता होते हैं। उन्हें ये धमकियां आतंकी संगठनों से ही नहीं मिलती बल्कि देश के मौलानाओं, मौलवियों और इमामों से भी मिलती हैं फतवों के ज़रिये।

किसी बड़े वकील को एक जनहित याचिका में ऐसे नेताओं की सुरक्षा वापस लेने की मांग करनी चाहिए जिन्हें किसी आतंकी संगठन से कोई खतरा नहीं है बल्कि ये नेता तो कुछ आतंकी संगठनों की वकालत करते हैं।

ये नेता खुद ‘सुरक्षा कवच’ में रहना चाहते हैं मगर मोदी और संघ/ भाजपा नेताओं को मिलने वाली धमकियों पर अपने होंठों पर अलीगढ़ का ताला लगा लेते हैं।

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