बलूचिस्तान मांगे आज़ादी

सिंधु घाटी की सभ्यता की खुशबू खुद में समेटे, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के सीमाओं से सटा एक खूबसूरत सा देश है बलूचिस्तान। इसका क्षेत्रफल 1,34,050 वर्गमील है और यहां मुख्य तौर पर बलूची, सराईकी और पश्तो भाषा बोली जाती है, और इस देश की राजधानी क्वेटा है।

दुर्भाग्य से इस खूबसूरत देश पर पाकिस्तान ने कब्ज़ा जमाया हुआ है और अपने बर्बरता पूर्ण शासन के तरीकों से उसने इस देश के संसाधनों का अमानवीय हद तक दोहन करता आया है, और कर भी रहा है।

ब्रिटिश भारत के दौर में, कुछ रियासते ऐसी भी थीं जिनपर ब्रिटेन का सीधा शासन नहीं था। ये रियासतें अपने निर्णय लेने के लिए पूर्ण तौर पर स्वतंत्र थीं। भारत की स्वतंत्रता के बाद इन रियासतों के पास अधिकार था कि वे भारत या फिर पाकिस्तान किसी के साथ भी विलय के लिए स्वतंत्र हैं।

उनमें से एक बलूचिस्तान (कलात, खारान, लॉस बुरा और मकरान) की रियासतें भी थी। बलूचिस्तान ने स्वतंत्र रहने की इच्छा व्यक्त की।

4 अगस्त 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन और जिन्ना, जो कि बलूचों के वकील थे, ने मिल कर एक कमिशन बिठाई और अंततः 11 अगस्त को बलूचिस्तान की आज़ादी की घोषणा कर दी गई।

वादे के मुताबिक उसे एक अलग राष्ट्र बनाया जाना था। 11 अगस्त 1947 में मुस्लिम लीग और कलात के बीच एक साझा घोषणापत्र पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें मुस्लिम लीग ने माना था कि कलात भारतीय राज्य नहीं है और मुस्लिम लीग उसके स्वतंत्रता का सम्मान करती है।

मगर ठीक ही कहा जाता है कि पाकिस्तानी अपने पिता के भी सगे नहीं होते हैं। 27 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना ने अचानक से हमला कर दिया और हज़ारों बेगुनाहों का कत्ल करने, खून खराबा फैलाने के बाद कलात को अपने कब्ज़े में ले लिया।

आइए जानते हैं बलूचिस्तान का मध्यकालीन इतिहास

वर्ष 711 में मुहम्मद-बिन-कासिम और फिर 11वीं सदी में महमूद गजनवी ने बलूचिस्तान पर आक्रमण किया। इस आक्रमण के बाद बलूचिस्तान के लोगों को इस्लाम कबूल करना पड़ा। 15वीं सदी में बलोच सरदार मीर चकर ने बिखरे हुए बलोची समुदायों को एकत्रित किया और दक्षिणी अफगानिस्तान, पंजाब और सिंध के कुछ हिस्सों पर आधिपत्य जमा लिया था। इसके बाद अगले 300 सालों तक यहां मुगलों, खिलजियों का शासन रहा।

इस प्रदेश का शासन पर्शिया के सुपुर्द करने के पहले सन 1638 तक अकबर के और इस तरह मुगल शासकों के अधीन था।

‘आइन-ए-अकबरी’ के मुताबिक, 1590 में यहां के ऊपरी इलाकों पर कंधार के सरदार का कब्ज़ा था, जबकि कच्ची इलाका मुल्तान के भक्कड़ सरदार के अधीन था। केवल मकारान इलाके पर मलिकों व अन्य समुदायों का स्वतंत्र रूप से नियंत्रण था।

1666 में यहां राष्ट्रवादी आंदोलन का बीज पड़ा। मीर नसीर खान ने वर्ष 1758 में अफगान की अधीनता स्वीकार की। फिर ईरान के नादिर शाह की मदद से कलात के खानों ने ब्रहुई आदिवासियों को एकत्र किया और उनकी मदद से सत्ता पाई।

प्रथम अफगान युद्ध (1839- 42) के बाद अंग्रेजों ने यहां अधिकार जमाया। 1869 में भारत में जहां गांधी जी जन्म ले रहे थे तो वहीं अंग्रेज़ बलूच सरदारों और कलात के खानों के बीच दोस्ती करवा रहे थे।

1876 के बाद रोबर्ट सैंड मैन नामक ब्रिटिश एजेंट की मदद से बलूचिस्तान का एक बड़ा हिस्सा ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गया। 20वीं सदी में बलूचों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इसके लिए 1941 में राष्ट्रवादी संगठन अंजुमान-ए-इत्तेहाद-ए-बलूचिस्तान का गठन हुआ।

वर्ष 1944 में जनरल मनी ने बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का स्पष्ट विचार रखा। इधर, आजम जान को कलात का खान घोषित किया गया। लेकिन आजम जान खान सरदारों से जा मिला। उसकी जगह नियुक्त उसका उत्तराधिकारी मीर अहमद यार खान अंजुमन के प्रति तो वह अपना समर्थन व्यक्त करता था, लेकिन वह अंग्रेजों से रिश्ते तोड़ कर बगावत के पक्ष में नहीं था। यही कारण था कि बाद में अंजुमन को कलात स्टेट नेशनल पार्टी में बदल दिया गया।

बाद में आजम ने 1939 में अंजुमान को गैरकानूनी घोषित कर दिया और इस पार्टी के कार्यकर्ताओं को निर्वासन और कारावास झेलना पड़ा।

1939 में गोरों की चाल से मुस्लिम लीग का गठन हुआ जो बाद में हिंदुस्तान के मुस्लिम लीग से जुड़ गई। दूसरी ओर एक और नई पार्टी अंजुमन-ए-वतन का जन्म हुआ जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गई। अंजुमन के कांग्रेस के साथ इस जुड़ाव में खान अब्दुल गफ्फार खान की भूमिका अहम थी।

मीर यार खान ने मुस्लिम लीग (स्थानीय व राष्ट्रीय) को भारी मदद पहुंचाई और मुहम्मद अली जिन्ना को कलात का कानूनी सलाहकार नियुक्त किया गया। 4 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान को माउंट बेटन और जिन्ना वाली कमिशन ने स्वतंत्र घोषित किया।

जिन्ना की सलाह पर मीर 5 अगस्त 1947 को कलात को आज़ाद करने के लिए राज़ी हो गया, पर पाकिस्तान ने फिर से अपनी धोखेबाजी नस्ल दिखाई और लगे हाथ पाकिस्तानी संघ ने एक समझौते पर दस्तखत किए जिसके मुताबिक पाकिस्तान कलात को स्वतंत्र मानने के लिए राजी है पर अनुच्छेद 4 के हिसाब से पाकिस्तान और कलात के बीच एक करार यह होगा कि पाकिस्तान कलात और अंग्रेजों के बीच 1839 से 1947 से हुए सभी करारों के प्रति प्रतिबद्ध होगा और इस तरह पाकिस्तान अंग्रेजी राज का कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक उत्तराधिकारी होगा।

इसी अनुच्छेद का फायदा उठा कर 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने कलात को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। लगे हाथ बलूचिस्तान प्रांत के बाकी प्रांतों को भी अपने हिस्से में मिला लिया गया।

बलूचिस्तान को मौका मिला और बलूचिस्तान ने चुना आज़ाद रहना। पर पाकिस्तान ने धोखेबाजी की और आज भी बलूचिस्तान, पाकिस्तान का गुलाम है।

समय समय पर वहां के क्रांतिकारियों ने अपना दमदार विरोध दर्ज करवाया है। बलोच निज़ाम अली खान से जबरन विलय पत्र पर करवाए हस्ताक्षर को असंवैधानिक मानते हैं और पाकिस्तानी गुलामी से स्वतंत्रता की लड़ाई अभी भी जारी है।

बलूचिस्तान ने अपने बेटे खोए हैं, अपनी बेटियों और बहनों की इज्ज़त पाकी आर्मी द्वारा तार तार होते हुए देखा है। पर पाकिस्तान के हर वार के साथ बलूचिस्तान की आज़ादी की प्यास और गहरी होती जाती है।
कहते हैं तानाशाही का सूर्य एक दिन अस्त होता है। पाकिस्तान का भी होगा। बलूचिस्तान भी एक दिन अपने झंडे और अपने संविधान के साथ एक अलग देश के रूप में अपनी पहचान देखेगा।

बलूचिस्तान लड़ेगा… क्योंकि बलूचिस्तान का नसीब उसे खुद लिखने आता है, और पाकिस्तान कोई नहीं होता उनके नसीब का निर्णय करने वाला।

बलूचिस्तान आज़ादी मांगता है, और भगवान शिव की कृपा से उसे एक दिन स्वतंत्रता ज़ रूर मिलेगी।

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