क्या हम हैं भी बलिदानियों को श्रद्धांजलि देने योग्य!

आज विपक्ष, मीडिया, टैक्स चोर, जातिवादी, भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी, लोफर, कंजूस, कंजड़ भी CRPF जवानों की शहादत पर श्रद्धांजलि दे रहे हैं, ये दिखावा बस कुछ रोज़ और चलेगा।

उसके बाद कहीं यदि ग़लती से भी कश्मीर के पत्थरबाज़ ‘बेरोज़गार युवाओं’ पर सेना ने AK-47 का इस्तेमाल कर दिया तो यही दोगले विपक्ष और मीडिया वाले हाय तौबा मचाते हुए छाती पीटेंगे।

‘रैबीज़’ कुमार को तो अभी से डर सता रहा है। बाक़ी अफ़ज़ल प्रेमी गैंग के केजरीवाल, राहुल ग़ाँधी और भी जितने चोर चायियाँ हैं, ये सभी उनके बचाव में तुरंत मोर्चा सम्भालेंगे।

टैक्स चोर, जिसे इससे कोई सरोकार नहीं कि देश का डिफ़ेंस सिस्टम कैसे चलेगा, जिसे केवल अपने से ही मतलब है, आज सरकारी कोष में थोड़ा सा पैसा दान देकर, उसे फ़ेसबुक पर डालकर बड़ा भारी दानवीर बन रहा है। लेकिन टैक्स चोरी अनवरत जारी रखेगा, नए नए हथकंडे अपनाएगा।

अपने जाति का झंडा हाथों में उठाए घूमने वाले जातिवादी जो आज मगरमच्छी आँसू बहा रहे हैं, कल यही जाति के नाम पर उन राजनीतिक पार्टियों को वोट देंगे जिन्होंने अभी तक हमेशा सेनाओं और अर्धसैनिक बलों को कमज़ोर करने का काम किया है।

भ्रष्टाचार व व्यभिचार में लिप्त सरकारी मुलाज़िम भी आज बड़ा देशभक्त बन रहा है, लेकिन वह अपनी हवस का नंगा नाच जारी रखेगा बिना ये सोचे कि कोई बस इतनी ही तनख्वाह पाकर अपने घर परिवार से दूर रहकर, सीमा पर अपनी जान की बाज़ी लगा रहा है।

घर का कामधाम छोड़कर घर से भागा हुआ कामचोर लोफर युवा भी आज बड़ा जोश में है, लेकिन यही युवा बेरोज़गारी भत्ते के लिए कल रेल की पटरी उखाड़ता पाया जाएगा।

आज कंजड़ कंजूस भी देशभक्ति दिखा रहे हैं लेकिन यदि आज युद्ध छिड़ जाए और महँगाई दस्तक देने लगे तो ये सारे कंजूस कंजड़ पूछेंगे कि “युद्ध हमसे पूछ के छेड़ा था?” और सरकार के मुख़लाफ़त करने लग जाएँगे।

बचे कन्हैया कुमार, ख़ालिद जैसे AMU, JNU में पढ़ने वाले चोर चोट्टे और भारत का खाकर पाकिस्तान ज़िंदाबाद गाने वाली ग़द्दार आबादी तो ये तो मूसर से कूचे जाने योग्य हैं, अतः इनकी बात ही व्यर्थ है।

ये देश की 60-65% आबादी है जिनकी सुरक्षा के लिए जवान अपने परिवार को अनाथ कर रहे हैं।

जवानों के परिजनों के करुण विलाप देखकर यही प्रश्न उठ रहा है कि ये जवान क्या इसी कूड़े कचरे आबादी की सुरक्षा में तैनात हैं? अरे बचाना है तो किसी ढंग की चीज़ को बचाओ। जो नराधम अपने सिवाय किसी का नहीं सोचते उनकी इतनी नि:स्वार्थ सेवा होनी कहाँ तक न्यायोचित है?

अब मुझे लग रहा है कि पूर्ववर्ती सरकारों का शासन ज़्यादा न्यायोचित था, जब बम सही जगह फटता था, कम से कम नि:स्वार्थ सेवा करने वाले जवानों का बलिदान तो नहीं होता था।

इसीलिए श्रद्धांजलि देने से पहले अपने गिरेबान में झाँकना ज़रूरी है, यदि हम भी इनमें से एक हैं तो हमारी औकात ही नहीं श्रद्धांजलि देने की!

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