आज की नायिका : Thinlas Chorol

Thinlas Chorol का जन्म लद्दाख की वादियों में हुआ था। माँ का साया बचपन में ही उठ गया था। विमाता के चलते पिता थिनले को अपने पास ही रखते थे।

Thinlas Chorol को भी पिता का साथ बहुत भाता था। बाप बेटी भेड़ बकरियों को चराने बहुत ऊंचाई तक जाते थे। वहीं पर थिनले का सामना कई ट्रेकिंग दलों से होता था। वे अक्सर उससे रास्ता पूछते।

यहीं से Thinlas Chorol के मन में ट्रेकिंग गाइड बनने का विचार आया। पुत्री ने पिता से अपनी इच्छा जतायी। पिता ने उसे प्यार से समझाया कि इसके लिए हिंदी अंग्रेज़ी का ज्ञान होना बेहद ज़रूरी है। पहले वह स्कूल में दाखिला ले, फिर ट्रेकिंग का कोर्स करने की सोचें। Thinlas Chorol ने स्कूली पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। मेहनत की। भेड़ बकरियों का साथ छोड़ा। आगे बढ़ने के लिए पीछे कुछ छोड़ना पड़ता है। थिनले ने इतनी योग्यता विकसित कर ली कि वह ट्रेकिंग कोर्स में दाखिला ले सके।

मगर Thinlas Chorol का ट्रेकिंग कोर्स में एडमिशन नहीं हुआ। कारण था कि यह कोर्स केवल पुरुषों के लिए था। यहां भी लिंग भेद था।

Thinlas Chorol ने लद्दाख छोड़ दिया। वे बाहर से वांछित कोर्स करके आईं। अब उन्होंने लद्दाख में अपनी खुद की ट्रेकिंग कम्पनी “Ladakhi Women’s travel Company” खोली। फिलहाल उनके पास 35 का स्टाफ है। यह लद्दाख में अनोखी शुरुआत थी।

जो भी महिला ट्रेकर लद्दाख आती, वह Thinlas Chorol की कम्पनी से सम्पर्क साधती। यह कम्पनी उन पुरुषों को भी गाइड मुहैय्या कराती है, जिनके साथ कोई महिला हो। अब सभी तरह से सुख शांति है।

पहले पुरुष गाइड महिला ट्रेकरों के साथ कभी कभार अभद्रता कर बैठते थे। इस कारण कईयों को अपनी ट्रेकिंग बीच रास्ते में छोड़ कर वापस आना पड़ता था।

37 साल की Thinlas Chorol को भारत सरकार ने पिछले साल “नारी शक्ति सम्मान” से सम्मानित किया है। आज से आठ साल पहले Thinlas Chorol ने एक अलग तरह की ट्रेवलिंग ट्रेकिंग कम्पनी खोलकर लिंग भेद के मुंह पर तमाचा मारा है। ऐसा वह अपने अदम्य उत्साह और अडिग साहस के बल पर ही कर पाईं हैं।

कश्तिया॔ नहीं तो क्या हौसले तो पास हैं ,
कह दो नाखुदाओं से तुम कोई खुदा नहीं।

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