कश्मीर का इलाज क्या है – 1

पाकिस्तान के प्रति भारतीय दृष्टि तथ्यात्मक रूप से सदा दोषपूर्ण रही है।

पाकिस्तान ने आज़ादी की हलचल शुरू होते ही कश्मीर पर क़बाइलियों की आड़ में सैन्य आक्रमण किया और तत्कालीन भारतीय नेतृत्व की कमज़ोरी के कारण उसके एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, जिसे वह आज ‘आज़ाद कश्मीर’ कहता है।

बाद में भी भारतीय नेताओं ने बड़ी-बड़ी मूर्खताएं कीं, जिनके कारण आक्रमणकारी पाकिस्तान, इस्लाम का रहनुमा बन कर ‘अपने हममज़हब कश्मीरी भाइयों’ के हितों के रक्षक का नक़ाब लगा लेने में सफल हो गया और भारतीय नेताओं की बेवकूफ़ी से एक सीधा-सादा अतिक्रमण का द्विपक्षीय मसला यूएन तक जा पहुंचा।

एक वक्तव्य याद करें। पूरब की बेटी बेनज़ीर भुट्टो के अब्बा हुजूर जुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी पर लटकाया गया था। इससे पहले जब वे उस मुल्क के पीएम थे, तब उन्होंने कहा था – ‘हमें भले ही एक हज़ार साल तक लड़ना पड़े। भूखों मरना पड़े। घास-फूस की रोटी खाकर गुज़ारा करना पड़े। सब कुछ सहन करेंगे, लेकिन कश्मीर लेकर रहेंगे।’

यह कोई सामान्य कथन नहीं था। यह पाकिस्तान की राजनीति का आदि और अंत बयान करने वाला कथन है। शुरुआत से लेकर आज तक पाकिस्तान के रहनुमा इसी के इर्द-गिर्द घूमते, चुनाव जीतते और सत्ता-सुख भोगते रहे हैं।

इस तरह, अगर कोई कूढ़मग़ज़ बुद्धिजीवी यह स्थापित करता है कि पाकिस्तान की जनता तो बहुत मैत्रीपूर्ण है, यह सब किया-धरा वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई, मिलिट्री और शासकों का है, तो यह कोरी ख़ामख़याली से आगे बढ़ कर शातिराना साज़िश है। अगर इन शातिरों की स्थापना सही है, तो भला ऐसे नेता पीढ़ी-दर-पीढ़ी वहां जीतते और शासन करते कैसे आए हैं?

अर्थात पाकिस्तान का एकमात्र एजेंडा है, भारत से कश्मीर हथियाना और इसके लिए वह कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार है।

इसके बरअक्स भारतीय पक्ष ने हमेशा मूर्खताओं के अम्बार खड़े किए हैं। कई युद्धों में पाकिस्तान को हराया, लेकिन हमेशा उसे ऐसे ही छोड़ दिया। विजेता को उससे कुछ तो वसूल करना था? नहीं किया।

1971 के युद्ध में बांग्लादेश को आज़ाद कराया गया। लगभग 94 हज़ार पाकिस्तानी सैनिक बंदी बनाए गए, लेकिन छोटे भाई समझ कर छोड़ दिए गए। 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता रूपी एक दोना भी हासिल हुआ, जिसका कबाड़ पाकिस्तान न जाने कितनी बार चीन को बेचता रहा और हमारे हुक्मरान नींद लेते रहे।

यह पूछा जाना चाहिए कि एक दुश्मन देश को बार-बार हराने के बावजूद उस पर इतनी मेहरबानियों का कारण क्या है?

कांग्रेस की शुरुआती आदत है – समस्या पैदा करो। उसे हल करने का नाटक करते हुए बना रहने दो और उसकी दुहाई देते हुए वोट बटोरते रहो।

जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में कश्मीर समस्या बन कर उभरा और उनके उत्तराधिकारियों ने उसे इस कदर नासूर बना दिया कि आज समूचा भारत त्राहि-त्राहि कर रहा है। इतना ही होता तो और बात थी, इसकी आड़ में कई विदेशी शक्तियां मध्यस्थता का बाना पहन कर घुसपैठ की तैयारी में हैं।

इंदिरा गांधी ने पंजाब में आतंकवाद का बीज बोया। सत्ता पर काबिज़ होने की हसरत पाले अपने पुतले भिंडरावाले को खड़ा किया, जो उस राज्य और उसके बाहर भी हज़ारों लोगों के कत्ले-आम का कारण बना।

जब भस्मासुर दुख देने लगा, तो प्रियदर्शिनी ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ के लिए विवश हुई, जिसके कारण कुछ समय बाद अपनी जान गंवानी पड़ी, तो ‘देश के लिए शहीद’ घोषित हो गईं। अगर इंदिरा गांधी देश के लिए शहीद हुई हैं, तो उनके द्वारा पनपाए गए आतंकवाद की बलि चढ़े हज़ारों लोग क्या हैं?

राजीव गांधी ने लिट्टे उग्रवादियों को पनपाया-प्रश्रय दिया, अंततः उन्हीं का शिकार हुए, तो ‘देश के लिए शहीद’ हो गए।

सोनिया जी और राहुल जी की कांग्रेस को देख लें। आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता है, लेकिन भगवा आतंकवाद होता है और वह सबसे ज्यादा खतरनाक है। देश में सबसे खतरनाक कौन हैं, यह उनके प्यादे बार-बार घोषित करते रहते हैं। कांग्रेस ने ऐसा क़ानून बनाने की कोशिश की, जिसके अस्तित्व में आ जाने के बाद बहुसंख्यक समुदाय का जीना दुश्वार हो जाता।

अगर मोदी सरकार नहीं आई होती, तो क्या देश को पता लग पाता कि कांग्रेस कश्मीर के अलगाववादियों को शुरुआत से बड़ी-बड़ी रकमों का प्रतिमाह भुगतान विशेष भत्तों के रूप में करती आई है। वे बिना कोई काम किए आलीशान ज़िंदगी जी रहे हैं। जिन सैन्यबलों पर इनके पाले आतंकी हमला करते हैं, उन्हें मारते हैं, वे ही इनकी सुरक्षा में तैनात रहते हैं।

उनके बच्चे विदेशों में पढ़-लिख कर वहीं के नागरिक बन रहे हैं, ताकि अपना जीवन आनंदपूर्वक गुज़ार सकें। और इन्हीं दोगलों ने कश्मीरी अवाम का जीना मुहाल कर रखा है। ये न स्कूल खुलने देते हैं, न सिनेमाघर। आतंकवाद को इन्होंने व्यापार बना लिया है और उसके सहारे धन का अम्बार खड़ा कर रहे हैं।

भारतीय कश्मीरी नेताओं और उनके चमचे बुद्धिजीवियों के वक्तव्य ध्यान से सुनें। इनकी गतिविधियां गौर से देखें। भारतीय सेना बलात्कारी है। वह ज़ोर-ज़बरदस्ती करती है। पत्थरबाज़ भटके हुए नौजवान हैं। उन्हें नौकरी नहीं मिलती, तो मज़बूरी में यह सब करते हैं।

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा प्राप्त है, अतः वहां भारत के किसी अन्य राज्य का कोई व्यक्ति न तो संपत्ति खरीद सकता है, न रह सकता है, लेकिन एक दूसरे देश म्यांमार से आए रोहिंग्या वहां ठसक से बस सकते हैं और उन्हें देश से निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि वे मुसलमान हैं और उनकी पैरवी करने वाले दीमक के अवतार यहां बहुतेरे हैं।

क्रमशः…

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