राष्ट्र तो दूर, कश्मीर के विकास और समृद्धि के लिए क्या है हुर्रियत का योगदान

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा जागरण कभी नहीं आया। समूचा हिन्दू समाज क्रोध में है।

मेरे एक परम आदरणीय मामा जो पिछले कई दशकों से अमेरिका में रहते हैं, उन्होंने अपना संदेश मुझे भेजा है।

वे न्यू जर्सी में रहते हुए भी निरंतर भारत में ही रहते हैं। जीवन की विवशता ही ऐसी है कि त्याग कर नहीं आ सकते। अभी चार महीने पहले वे भारत में थे और दो महीने तक गांव देहात के धूल धक्कड़ में घूमते फिरते रहे।

कल जो उन्होंने मुझे व्हाट्सएप पर भेजा है, उसे यहां साझा कर रहा हूँ :

आज राष्ट्रचिंतन की हमारी साप्ताहिक गोष्ठी थी। अपने देश की सेना पर JeM (जैश-ए-मोहम्मद) का ख़ूनी आक्रान्त भीषण रोष का विषय था। अनेक प्रकार की चर्चा, विमर्श और वाद प्रतिवाद भी हुए, कुछ तत्व भी निकले।

क्या करना चाहिए और क्या होगा तो एक विषयवस्तु है। क्षण तो भावुक था। गोष्ठी के अंत में जब एक कविता के लिए मुझे कहा गया तो मैंने माखनलाल चतुर्वेदी जी की ‘पुष्प की अभिलाषा’ पढ़ी जो मुझे याद थी। उसके बाद एक महिला मित्र जो एक इंजीनियर भी हैं, फूट-फूट कर रो पड़ी।

परन्तु मैं हमेशा की तरह मैं यही सोचता हूँ कि शेख़ अब्दुल्ला जिसकी महत्वाकांक्षा कश्मीर का एक निर्विवादित सुल्तान बनकर कश्मीर को एक सम्पूर्ण इस्लामी मुल्क बनाने के सिवा और कुछ भी नहीं थी, उससे ‘समस्या का शीघ्र समाधान’ के लिये नेहरु ने हड़बड़ाहट में हाथ मिला कर जो भयंकर भूल की थी, उसे सुधारने के लिये एक मात्र विकल्प है – एक बार राजनीति से विलग होकर ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ़्रेन्स का जड़मूल समेत विध्वंस।

कौन नहीं जानता है कि हुर्रियत के सभी बड़े लीडर्स अरबों के मालिक हैं। दुबई और लंदन में उनका कुनबा और बंगला पसरा हुआ है। उनको भारत सरकार की उच्चतम सुरक्षा प्राप्त है। और तो और, मानवाधिकार के सभी महान सूरमा भी उनके पक्षपोषक हैं, कश्मीर से जेएनयू तक।

किस लिए? किस बलिदान के लिये? राष्ट्र तो दूर, कोई गिनाए कश्मीर की ख़ैरियत और समृद्धि के लिये किसी भी क्षेत्र में उनका कोई एक योगदान। कोई बताए देशद्रोही आतंकियों की नयी नयी पीढ़ियों को पैदा करने के सिवा उनकी और कोई सृजनात्मकता!

कूछ नहीं, शून्य! हुर्रियत बस इस्लामी नफ़रत के रोगाणुओं की एक कोख है जो देश की संप्रभुता को खुली चुनौती देने के लिये, खुली सड़क पर हिंदुओं की हत्या करने के लिए और शरीयत की तालीम दे दे कर कश्मीर को एक इस्लामी मुल्क बनाने के लिए रोज़ नये नये कमीनों को पाकिस्तानी आतंकियों की जासूसी करने हेतु पैदा करती है।

और हम लोकतंत्र की सड़ी हुई परम्परा निभाने में लगे हैं। हिंदू संस्कृति की सहिष्णुता की दुहाई दे कर परपीड़क गुंडों के हाथों देश के महान सपूत फ़ौजियों को पिटते देख अपना मुँह सी लेते हैं। कांग्रेसी तन्त्र की परम्परा का सड़ियल बोझ कब तक ढोता रहेगा देश का नौनिहाल?

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