तिरंगा यात्रा का छद्म

हमारे कुछ मित्र हैं। भीतर से तो सब समझते जानते हैं पर बाहर से उन्हें यह दिखाना होता है कि भाईजान भी उतने ही देशभक्त हैं जितने कि आप या दूसरे हिन्दू होते हैं।

चार साल पहले भी ऐसी ही तिरंगा यात्रा निकाली गई थी और मुसलमानों ने आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ बुलंद की। अखबार में खबर छपी। एकदम चकाचक फोटो के साथ।

हमारे दोस्त बोले, आप खबर पढ़ते नहीं! देखिए तो मुसलमान कितना विरोध कर रहे आतंकवाद का!!

मेरी हंसी छूट गई। मैंने पूछा याकूब मेमन, अफ़ज़ल गुरु और बुरहान वानी जैसों के साथ कौन सी यात्राएं निकाली जाती हैं? कभी जानना चाहा! देश विभाजन के लिए कौन ज़िम्मेदार है? पूछकर देख लीजिए, जवाब मिलेगा संघी!

एक एक मुसलमान, संघ और मोदी से अवर्णनीय घृणा करता है। समझ लीजिए खून का प्यासा है। सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणियां पढ़ लीजिए।

दूसरी बात यह कि कोई मुसलमान इतिहास के प्रति ईमानदार नहीं है। निन्यानवे फीसद मानते हैं कि इस्लाम के आने से भारत जैसे मूर्खदेश की उन्नति हुई। ग़ज़नी से लेकर औरंगजेब तक सभी महान बादशाह थे। हिन्दू इनके राज में बड़े खुश थे।

इन्होंने ना तो मंदिर तोड़े ना ही धर्मपरिवर्तन करवाए। यह तो संघियों का दुष्प्रचार है। बाबरी मस्जिद के नीचे कोई मंदिर नहीं था और मस्जिद का ध्वंस हिन्दुओं का सबसे भयंकर अपराध है जिसका जन्म जन्मांतर तक बदला लेना जरूरी है।

एक भी मुसलमान इससे इतर नहीं सोचता। कश्मीर में सेना का वह धुरविरोधी है। उसे लगता है कि सेना कश्मीर में उनके साथ अत्याचार करती है इसलिए सैनिकों का मरना जायज़ है। मैंने रेलयात्रा में एक बिहारी मुसलमान को खुलकर बुरहान वानी का समर्थन करते हुए देखा है। ना सिर्फ समर्थन कर रहा था बल्कि वह आतंकियों की भाषा बोल रहा था।

ऐसी तिरंगा यात्राएं एक आज़माया हुआ पांसा हैं। ताकि यह संदेश दिया जा सके कि हम भी आपकी ही तरह सोचते हैं। परंतु, मन से वह कभी हिन्दू हितैषी नहीं है। जो हैं उनकी संख्या बहुत ही कम है। बात आतंकियों के विरोध की नहीं बल्कि आत्मावलोकन की है। भीतर से आप क्या हैं यह महत्वपूर्ण है। भीतर से आप पक्के मज़हबी हैं। आप सुविधानुसार अपनी यात्रा निकालते हैं और विरोध जताते हैं। आतंकवाद के प्रश्न पर आप एक प्रतिशत ईमानदार नहीं हैं।

आप अपने धार्मिक विचारों पर कभी प्रश्न नहीं करते। कभी कोई सवाल ही नहीं। यह तिरंगा यात्रा सब देखना अब बर्दाश्त नहीं है। बल्कि इस नीच पाखंड से उल्टी आती है। और इसका समर्थन करने वाले हिन्दुओं से मेरा कोई संबंध नहीं।

मुझे मुसलमानों से कोई घृणा नहीं है। मैं तो चाहता हूं कि वे ऐसी नज़ीर पेश करें कि दुनिया भारत की मिसाल दे। पर, ऐसा होना संभव नहीं है। यह तहज़ीब का ताबीज़ सिर्फ प्रेमचंद जैसे लेखकों के गले की शोभा बढ़ाता है। साहित्य के सुनहरे छद्म में वह ठीक है। सत्य के धरातल पर सिर्फ़ हिन्दुओं का खून बहता है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY