समस्या की जड़ें यहाँ भारत में ही हैं; पाकिस्तान, कश्मीर में नहीं

कल के हमले का करारा जवाब तो भारत की सेना और सरकार ज़रूर देगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन उससे समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

समस्या सिर्फ पाकिस्तान और कश्मीर तक सीमित नहीं है; समस्या पूरे देश में फैली हुई है और वास्तव में समस्या की जड़ कोई धर्म या संप्रदाय नहीं है, समस्या की जड़ राजनेता, बुद्धिजीवी, मीडिया और समाज हैं।

इस मुद्दे पर बहुत बहस हो सकती है कि आतंकवाद का कोई धर्म होता है या नहीं, लेकिन मेरे ख्याल से इस मुद्दे पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है कि भारत में आतंकवाद पर राजनीति होती है, सेना का अपमान होता है, आतंकवादियों के मानवाधिकारों की वकालत होती है, भारत के टुकड़े करने के नारे लगते हैं, सैनिकों की शहादत पर जश्न मनाया जाता है और आतंकियों के जनाज़ों में भीड़ जुटती है।

समस्या की जड़ें यहाँ भारत में ही हैं; पाकिस्तान, कश्मीर में नहीं।

दिल्ली में बाटला हाउस के आतंकियों की मौत पर किसने आंसू बहाए थे? कौन उनके घर माफ़ी मांगने गया था? आपको याद है या भूल गए?

इशरत के नाम से मुंबई में एंबुलेंस सेवा किसने शुरू करवाई थी? उसके घर लाखों में मुआवजे का चेक देने कौन गया था? उसको बिहार की बेटी किसने कहा था? चुनाव में लादेन के हमशक्ल को लेकर कौन वोट मांग रहा था?

अफ़ज़ल को बचाने के लिए कौन-कौन लोग अभियान चला रहे थे? याकूब की शवयात्रा में कितने लोग आए थे? कसाब को आरएसएस का हिन्दू एजेंट किसने कहा था? जेल में मदनी की सेवा कौन कर रहा था? मुंबई के आज़ाद मैदान पर शहीद स्मारक में तोड़फोड़ और दंगे करने वालों पर कोई कार्यवाही आज तक हुई?

‘घर-घर से अफ़ज़ल निकलेगा’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे कहाँ लगे थे? दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के जवानों की मौत पर दिल्ली में किसने जश्न मनाया था?

अवैध घुसपैठियों को नकली दस्तावेज़ कौन बनाकर देता है? उनको बचाने के लिए अदालतों में और संसद में कौन लड़ता है?

अपने नरेटिव और अपने एजेंडा के अनुसार चुन-चुनकर सिलेक्टिव खबरें कौन दिखाता या दबाता है? ऐसे मीडिया चैनलों को कौन-कौन देखता है? क्या सोशल मीडिया पर रोज़ एनडीटीवी को गालियां देने वालों ने खुद ये चैनल देखना बंद कर दिया है? आप खुद उनकी टीआरपी बढ़ाते हैं, लेकिन चाहते हैं कि उन्हें मोदी सबक सिखाए।

ऊपर मैंने जितनी घटनाएं लिखी हैं, वे सब दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर जैसे शहरों से जुड़ी हुई हैं, कश्मीर या पाकिस्तान से नहीं।

समस्या की जड़ें राजनीति में हैं, मीडिया में हैं, बुद्धिजीवियों के एजेंडे में हैं और समाज की स्वार्थी मानसिकता में हैं।

राजनेताओं को क्यों ये लगता है कि आतंकियों का बचाव करने या घुसपैठियों की मदद करने में फायदा है। बहुत-से मामलों में तो वाकई यह राजनेताओं की मजबूरी है क्योंकि उसके बिना वोट ही नहीं मिलते और वोट के बिना कुछ नहीं हो सकता।

लोग इस तरह क्यों वोट देते हैं या क्यों नहीं देते हैं, ये सोचना और सुधारना समाज की ज़िम्मेदारी है। समस्या तभी मिटेगी। किसी भी सरकार को, किसी भी राजनीतिक पार्टी को, किसी भी मीडिया चैनल को या किसी भी संप्रदाय को दोष देते रहने से कोई समस्या नहीं सुलझने वाली।

पाकिस्तान का उपचार आवश्यक है और वो तो किया ही जाएगा, लेकिन भारत की इन बीमारियों का उपचार कब होगा? जब तक आप अपना घर नहीं सुधारते, तब तक समस्या खत्म नहीं होगी, भले ही पाकिस्तान और भारत दोनों खत्म हो जाएंगे।

मैं जानता हूँ कि अधिकतर लोग आज बहुत भावुक या क्रोधित हैं, इसलिए मेरी बात तुरन्त नहीं समझेंगे। लेकिन उम्मीद कर रहा हूँ कि कुछ समय बाद मन शांत होने पर कुछ लोग तो इस बात की गहराई को समझ पाएंगे और विचार करेंगे। वैसे इसकी संभावना भी कम ही है क्योंकि अपने यहाँ लोग 2-4 दिन बाद सब भूल भी जाते हैं। सादर!

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