पुलवामा : यदि देना चाहते हों हुतात्माओं को वास्तविक श्रद्धांजलि

पुलवामा में सीआरपीएफ के 44 जवान एक आत्मघाती आतंकी हमले में शहीद हो गए है। पूरा देश क्षोभ और आक्रोश में डूब गया है। चारो तरफ ‘बदला, बदला, बदला’ का नाद सुनाई पड़ रहा है।

लेकिन बदला किससे?

पाकिस्तान से? जैश ए मुहम्मद से? कश्मीर की घाटी से?

या फिर उन लोगों से, जो भारत के हैं लेकिन इस मौत के ताण्डव पर खिल्ली उड़ा रहे हैं और उल्लास मना रहे हैं?

मैं आक्रोशित हूँ और दुखी भी हूँ लेकिन इस आतंकी हमले को लेकर मुझे पाकिस्तान से कोई शिकायत नहीं है। मुझे जैश ए मुहम्मद पर कोई आक्रोश नहीं है। यहां तक कि मुझे कश्मीर की घाटी के लोगों पर भी गुस्सा नहीं आ रहा है।

इसका कारण यह है कि जितना मैं, इस पूरे घटनाक्रम को समझ रहा हूँ उसको लेकर मेरा यह दृढ़ विश्वास होता जा रहा है कि यह सब कुछ भारत के अंदर से ही प्रायोजित किया गया है।

हम सब मूर्ख होंगे यदि हम इस घटना को 2019 के लोकसभा चुनाव से अलग हो कर देखेंगे। यह एक आत्मघाती हमला था जो दुर्भाग्य से पिछले 6 माह में कम से कम 3 बड़ी आतंकी घटनाओं की योजनाओं की तरह विफल नहीं किया जा सका जो दिवाली, 26 जनवरी और कुंभ में होना थीं।

पुलवामा में हुई 44 जवानों की हत्या के पीछे भारत के ही हिन्दू और सिद्धू जैसे सरदार राजनीतिक नेताओं का हाथ है, जो पाकिस्तान से उनकी मदद करने के लिए घिघिया चुके हैं और पाकिस्तान के इस्टैब्लिशमेंट को यह विश्वास दिलाया है कि मदद के एवज़ में वे सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान के स्वार्थों का पहले की तरह ख्याल रखेंगे।

आज राहुल गांधी, मणिशंकर अय्यर, ममता बनर्जी, कपिल सिब्बल, शशि थरूर, राजीव शुक्ला, सिद्धू, केजरीवाल, रविश कुमार, राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, प्रसून बाजपेयी, शेखर गुप्ता, प्रशांत भूषण इत्यादि हिन्दुओं के हाथ इन जवानों के रक्त से सने हैं।

यह भारत के तथाकथित हिन्दू ही हैं जिन्होंने अपने राजनैतिक व आर्थिक स्वार्थ के लिए आत्मविश्वास विहीन और आर्थिक रूप से दिवालिये पाकिस्तान को इतनी हिम्मत दी कि वो ऐसे वक्त आतंकवादियों को शरण देने वाले राष्ट्र के रूप में फिर से आरोपित होने का खतरा उठा सके, जब सऊदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान (MBS) पाकिस्तान में 16 फरवरी को एक दिन के लिए आने वाले हों और उसके बाद भारत पहुंचने वाले हैं।

हमें आज जितना भी पाकिस्तान को कोसना है, कोस लें लेकिन अंत में हमें यह समझना ही नहीं बल्कि इसके लिए अपनी मानसिकता को भी कठोर करना होगा कि हमारा शत्रु, भारत के बाहर नहीं है, बल्कि हमारे घर में है।

इन शत्रुओं में हमारे घर में बैठे वो मुस्लिम आईडी विशेष नहीं है जो पुलवामा में हुई हत्याओं का जश्न मना रहे हैं क्योंकि वह चिह्नित हैं। हमारा असली शत्रु खुद वह हिन्दू है जो इस जघन्य कांड पर राजनैतिक रोटी सेंक रहा है, उल्लसित हो रहा है या कटाक्ष कर रहा है।

मेरे जीवन का अनुभव यही बता रहा है कि यह आत्मघाती हमला जैश ए मुहम्मद के नाम पर हुआ ज़रूर है लेकिन यह उसका काम नहीं है। जिस तेजी से इस घटना की जिम्मेदारी ली गयी है व उस आत्मघाती आतंकी की फोटो सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई है, उससे यही लगता है कि वास्तविकता कुछ और है। मैं नहीं समझता कि इसमें पाकिस्तान की सरकार का कोई हाथ है बल्कि इसमें पाकिस्तान में सरकार बनाने वाली पाकिस्तानी सेना के एक वर्ग का हाथ है।

जिस तरह से कांग्रेस व अन्य विपक्षी नेताओं के साथ, उनके समर्थन में खड़ी मीडिया के लोगों की तरफ से विक्षिप्तता वाली प्रतिक्रिया आ रही है और पाकिस्तान को लेकर मौन की सेज सज़ा रखी है, उससे स्पष्ट है कि पुलवामा में हुई 44 जवानों की हत्या के षडयंत्र में वे प्रत्यक्ष रूप से भागी हैं। जब तक आक्रोशित हिन्दू, कांग्रेस जैसी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन करने वाले हिन्दुओं पर प्रतिघात करने की नहीं सोचेगा, तबतक मुस्लिमों व पाकिस्तान को लेकर आक्रोशित होना व्यर्थ है।

हमको यदि भारत को बचाना है तो पहला संहार उन हिन्दुओं का करना होगा जो उन दलों का समर्थन करते हैं जो खुले रूप से आतंकियों के बचाव में खड़े है। मोदी सरकार को जब प्रतिघात करना होगा वह करेगी क्योंकि वह भावनाओं के अधीन लिया गया निर्णय नहीं हो सकता है।

लेकिन यदि आप खुद कुछ न करके, सरकार के सहारे अपनी नियति तय करने पर विश्वास रखते है तो फिर आपका आक्रोश और नारेबाज़ी सिर्फ खुद की अकर्मण्यता को छुपाने का एक मार्ग ही कहलायेगा। जब तक आप राष्ट्रद्रोही हिन्दुओं का रक्त नहीं बहाएंगे तब तक, आपका पाकिस्तान व मुस्लिमों को लेकर आक्रोश व्यर्थ है।

यह निश्चयात्मक है कि जब तक हिन्दू, द्रोहकाल से पल्लवित हिन्दुओं पर प्रहार करने से मुंह चुरायेगा तब तक भारत कुछ भी नहीं कर पायेगा।

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