यह वक़्त शोक का नहीं, शौर्य का है

सभ्यताओं के संघर्षों में उलझे राष्ट्र को यह शोभा नहीं देता कि वह अपने योद्धाओं के बलिदान पर आँसू बहाए।

यह समय शोक का नहीं है।

रणकाल में शोक मनाने की अनुमति नहीं मिल सकती। अपने आक्रोश को इतनी सस्ती अभिव्यक्ति मत दीजिये कि कायरता झलकने लग जाये।

जिहाद को हराना है तो उसकी दुरभिसंधि से निपटने की प्रेरणा ख़ुद में पैदा करनी होगी, सत्यनिष्ठ बने रहना होगा।

इस्लामवाद की जड़ें इस्लामपरस्त धर्मनिरपेक्ष राजनीति में धंसी हुई हैं यह सत्य कहने से पीछे नहीं हटना है।

जिहाद को दो ग़ज़ ज़मीन के भीतर दफ़न किया जा सकता है, इसके लिए पहले इस्लामपरस्त राजनैतिक इत्तेहाद से निपटना होगा।

इस्लामवाद अपनी पहचान नहीं छिपाता (जैश-ए-मोहम्मद अर्थात मोहम्मद की फ़ौज) ने आज फिर से इसकी नज़ीर पेश की है।

उन्हें पता है कि हम में से कई उसका नाम सीधे नहीं लेंगे क्योंकि अब भी हम में से कई उनकी सेवइयों की कटोरियों पर बिके बैठे हैं।

आज जो पुलवामा में हुआ, उसका हज़ार गुणा डायरेक्ट एक्शन डे में एक दिन में हो चुका है पर फिर भी भारत के बहुसंख्यकों के बड़े हिस्से की आँखें नहीं खुलती हैं।

पेट पर बम बाँधकर फूटने की इच्छा लिए हमारे आसपास भी बहुत से लोग हैं, बस नज़र उठाकर देखने भर की जरूरत है।

इस्लामपरस्त राजनैतिक इत्तेहाद उन्हें मौका देने को तैयार बैठा है, उसको चुनावी जीत मिली नहीं, कि ज़िहाद हमारे आपके घरों की सांकल खटखटाने लगेगा।

सत्यनिष्ठा दिखाएं लोगों को, इस ज़िहाद के सत्य से यथाशक्ति परिचित करायें। इस ज़िहाद को शक्ति देने वाले राजनैतिक इत्तेहाद को पराजित करने के लिए कमर कसे रहें।

सुरक्षा बलों एवं सरकार के मनोबल के साथ दृढ़ रहें, आपको बदला अवश्य मिलेगा।

यह वक़्त शोक का नहीं शौर्य का है।

बलिदान हुए सभी जवानों को शत शत नमन।

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