मुलायम का सोनिया पर चरखा दांव

आज सुबह मुलायम सिंह यादव द्वारा नरेंद्र मोदी को दी गयी शुभकामना वाले लेख में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि यह शुभकामना न हो कर पहलवान मुलायम सिंह यादव का चरखा दांव था, जिससे तीसरी बार सोनिया गांधी को चित किया है।

जिस तरह से मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी के बगल में बैठ कर उनके पुत्र राहुल गांधी को लेकर उनके ही स्वप्नों का तिरस्कार किया, वह देखने लायक था।

मैं समझता हूँ सोनिया गांधी का सार्वजनिक रूप से इतना कठोर मान मर्दन पहले कभी नहीं हुआ है। मुलायम सिंह के इसी पैंतरे पर मुझे 2015 में लिखा अपना लेख याद आ गया जिसमें सोनिया को टँगड़ी मारने वाली दो घटनाओं का ज़िक्र किया था। मैं उसी लेख को नये सिरे से सम्पादित कर के, उद्धृत कर रहा हूँ।

यह अगस्त 2015 की बात है जब सोनिया गांधी की अगुवाई में सारा विपक्ष, ललित मोदी को लेकर सुषमा स्वराज के इस्तीफे पर अटक गया था और सदन चलने नहीं दे रहा था। ऐसे में बीजेपी की तरफ से मुलायम सिंह यादव से सम्पर्क किया गया था और उनसे सोनिया गांधी को संसद चलने देने के लिए मनाने को कहा गया था। मुलायम सफल हुए थे और फिर सदन में जो उस दिन हुआ वह अब इतिहास के पन्नो में ही दर्ज़ है।


कल से एक ही चर्चा आम है कि सोनिया गांधी कुछ ढूंढ रही हैं।

लोगों को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सोनिया का कुछ ऐसा नहीं खोया है जिसको दूरबीन लेकर उनके दरबारी ढूंढें। दरअसल वो उस शख्स को ढूंढ रही हैं जिसने कल संसद में उनकी नाक कटवाई है।

अब आप कहेंगे ये क्या बात हुई? नाक तो कल काटी थी सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने, और उसको कटवाया था मोदी ने! फिर किसको ढूंढ रही हैं?

सोनिया गांधी ढूंढ रही है धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव को, जिनके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। सोनिया गांधी को एक बार फिर मुलायम सिंह यादव ने अपने चरखा दांव से चित कर दिया है।

आइये पूर्व में इस सैफई के पहलवान द्वारा सोनिया पर लगाए गए चरखा दांव के बारे में बात करते हैं।

बात 1999 की है जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के गिरने के बाद सोनिया गांधी ने, भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए अपना दावा प्रस्तुत किया था।

इस ऐतिहासिक घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनने के लिए इटली से सोनिया गांधी का पूरा मायका, चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली पहुंच गया था। एक तरफ सोनिया के दावे के साथ ही 10 जनपथ रोड पर दीवाली, क्रिसमस एक साथ दिन रात मनने लगी थी, वहीं सोनिया गांधी टीवी पर उछल उछल कर देश को बता रही थीं “वी हैव 282, वी हैव 282!”

सोनिया गांधी, जब पूर्ण बहुमत होने का सार्वजनिक रूप से दावा कर रही थी तब उस दिन पता नहीं कहाँ से धरतीपुत्र का भारतीय होने का गौरव जाग गया। उन्हें सब मंज़ूर था लेकिन किसी विदेशी का भारत का प्रधानमंत्री बन जाना मंज़ूर नहीं था।

मुलायम सिंह यादव को अपने पहलवानी के दिन याद आ गये और सीधे राष्ट्रपति भवन पहुँच गए। वहां उन्होंने अपने सबसे प्रिय चरखा दांव का उपयोग किया और सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए, समर्थन देने से इनकार कर दिया।

उस दिन मुलायम सिंह यादव, सैफई के यादव से उठ कर स्वाभिमानी भारतीय बन गए थे।

उसके बाद समय बदला, राजनीति बदली और प्रधानमंत्री बदला।

उस घटना के 5 वर्ष बाद 2004 में सोनिया गांधी के यहाँ रात्रि भोज था, जहां गैर भाजपाई समर्थक दलों के नेता इकट्ठे हुए, मनमोहन सिंह की अगुवाई में सरकार बनाने की कोशिशे चल रही थी।

उस रात्रि भोज में धरतीपुत्र मुलायम सिंह ने अपने दूत अमर सिंह को बिना शर्त समर्थन देने वाला पत्र लेकर भेजा। अमर सिंह वहां गये लेकिन उस पत्र को लिया ही नहीं गया और अपमानजनक स्थिति में उन्हें भोज स्थल छोड़ना पड़ा था।

कल का इतिहास इस पृष्ठभूमि में रचा गया था।

अब जो मैं यह लिख रहा हूँ वह मुझे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है। इस बात की पुष्टि अभी कोई सार्वजनिक रूप से नहीं कर रहा है लेकिन बाद में लोग इस किस्से को लिख कर अपनी किताबें अवश्य बेचेंगे।

मानसून सत्र की शुरुआत में वैंकया नायडू ने, जो कि संसदीय मंत्री हैं, सर्वदलीय मीटिंग बुलाई थी जिसमें सरकार की तरफ से आने वाले बिलों के बारे में बताया गया और विपक्ष की मांगों को भी सुना गया था। वहां सभी उपस्थित दल संसद चलने देने पर तैयार थे लेकिन कांग्रेस ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्तीफे के बिना संसद चलने देने से इंकार कर दिया था।

जब कांग्रेस को वाम दलों का भी समर्थन मिल गया तो मुलायम सिंह, न चाहते हुए भी अपनी समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के पक्ष में जाकर खड़े हो गये और संसद नहीं चलने दी।

जैसे जैसे सोनिया गांधी की अव्यवहारिक ज़िद के आगे लोकतंत्र और संसद दोनों ही मानसून सत्र में स्वाहा होते दिखने लगे तब मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस की इच्छा के विरुद्ध स्पीकर से आग्रह किया कि वे विपक्ष के नेताओं की एक बैठक बुलाएं और संसद को चलने देने पर वार्ता की जाये।

सोनिया गांधी ने काफी कोशिश की कि मुलायम कुछ न बोलें, लेकिन मुलायम सिंह ने उनको अनसुना कर दिया और कहा कि अगर कांग्रेस संसद चलने देने के लिए ईमानदार है तो विपक्ष की इस्तीफे की मांग पर संसद में चर्चा होने देना चाहिए और विदेश मंत्री को सुनना चाहिए।

उसके बाद जब सुषमा स्वराज लोकसभा में आयी तब उन पर आरोपों के दौर चले लेकिन जब सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने सोनिया गांधी, राहुल गांधी के साथ साथ जब कांग्रेस का सदन में चीर हरण किया… तब सोनिया सिर्फ मुलायम को और उनके आश्वासनों को ही याद कर रही थीं। यह था धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव का चरखा दांव जिसने एक बार फिर सोनिया को चित कर दिया था।

आखिर ऐसा हुआ क्यों?

यह हुआ इस लिए था कि सत्र के शुरू में धरतीपुत्र के पास सत्ता पक्ष का संदेश आया था कि संसदीय मर्यादा का पालन करते हुए उन्हें सदन चलने देना चाहिए और फिर उसके बाद वह जो भी विरोध या समर्थन करना चाहते हैं वो करते रहें। लेकिन मुलायम सिंह ने उस बात को अनसुना कर दिया।

इसके बाद उनके पास फिर एक और संदेश आया कि आप जो निर्णय लेना चाहते हैं वो लें, लेकिन एक बार प्रधानमंत्री मोदी से अनौपचारिक रूप से मिल लें।

मुलायम सिंह भले वैचारिक विरोध करते हों लेकिन वे व्यवाहरिक हैं। उन्हें राजनीति से परे हो कर भी शिष्टाचार का निर्वाह करना आता है और इसी क्रम में मोदी से उनकी अनौपचारिक मुलाकात हुई।

मोदी ने पहले उनको सुना और फिर उनसे निवेदन किया कि सदन के न चलने से देश बंधक बनता जा रहा है, इस लिए चर्चा होने देना चाहिए और मंत्री, जिस पर आरोप लगे है, उनको भी अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए।

मूलतः मुलायम सिंह तो तैयार थे लेकिन एक घिसे हुए नेता होने का फ़र्ज़ निभाते हुए वहां कुछ कहने से बचते रहे।

फिर मोदी ने कहा, “मुलायम सिंह जी, मुझे अभी भी टीवी पर देखा वह दृश्य नहीं भूलता है, जब आप का बिना शर्त समर्थन देने का पत्र लेकर अपके सहयोगी अमर सिंह, सोनिया गांधी की दावत में गए थे लेकिन वहां सोनिया गांधी ने ‘ये कौन है? इसको किसने बुलाया? बाहर निकालो’ कह कर अंदर घुसने नहीं दिया था।”

उस अपमान की घड़ी की याद कर के मुलायम सिंह की पहलवानी जंघाएँ फिर से फड़कने लगी लेकिन वो चुप रहे। उसके बाद मोदी जी ने एक टाइप किया कागज़ उनको दिया और कहा, ‘नेता जी आप वही करिये जो आपको ठीक लगता है लेकिन पहले इस को देख लीजिये। यह हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी के उत्तरों के बुलेट पॉइंट्स है।’

नेता जी ने जब उस जवाब के बिंदु देखे तो उनको समझ में आ गया कि उनकी पहलवानी जंघाएँ क्यों फड़फड़ा रही हैं।

उसके बाद उन्होंने सोनिया गांधी को संदेशा पहुंचाया कि चर्चा होने दीजिये, सुषमा स्वराज के जवाब वह देख चुके है और उस जवाब के बाद बीजेपी सरकार इस मुद्दे पर अपने अस्तिव को ही खो देगी। मुलायम के कहने पर सोनिया गांधी चर्चा के लिए और सुषमा स्वराज का जवाब सुनाने को तैयार हो गईं।

और फिर जो हुआ, वो अब इतिहास ही हो गया है।

ये था सैफई के पहलवान का मारक चरखा दांव जिसको लगा कर उन्होंने अपने अपमान का बदला ले लिया था। इधर सोनिया, राहुल और कांग्रेस का पराभव हो रहा था और उधर सुनते है मोदी गीता के 11वें अध्याय के 32वें और 33वें श्लोक का मनन कर रहे थे।

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥11.32॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥11.33॥

(मैं संसार का क्षय करने के लिये प्रवृत्त हुआ काल हूँ। और इस समय इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे बिना भी, यहाँ तुम्हारे विपक्ष में जो योद्धा गण स्थित हैं, वे भविष्य में नहीं रहेंगे। इसलिये तुम उठो और अपने शत्रुयों को जीत कर यश प्राप्त करो और समृद्ध राज्य भोगो। तुम्हारे यह शत्रु मेरे द्वारा पहले से ही मारे जा चुके हैं, हे सव्यसाचिन्, तुम केवल निमित्त-मात्र ही बनो।)

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