मुलायम ने एक तीर से साधे कई निशाने

वर्ष 1999 में एक वोट से गिरी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ मत देकर लोकसभा से बाहर निकले चंद्रशेखर ने कहा था कि यदि मुझे आभास होता कि अटल जी की सरकार गिर जाएगी तो मैं अपना मत अटल सरकार के पक्ष में देता।

कल 16वीं लोकसभा के अन्तिम सत्र में मुलायम सिंह यादव ने जब यह कहते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को शुभकामनाएं दी कि आप एकबार फिर प्रधानमंत्री बनें तो 1999 में की गई चंद्रशेखर की टिप्पणी की याद ताज़ा हो गयी।

क्योंकि 1999 में अटल सरकार गिरने के तत्काल बाद प्रधानमंत्री बनने का सपना पालकर प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी का पत्र लेकर राष्ट्रपति भवन पहुंची सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर उन्हें समर्थन देने से मुलायम सिंह यादव ने बाकायदा पत्र लिखकर स्पष्ट इनकार कर दिया था।

परिणामस्वरूप सोनिया गांधी का वह सपना अधूरा ही रह गया था। (अतः इस बात का सेहरा डॉक्टर स्वामी पर लादने की कोशिश जब तब करनेवाले विद्वान अपनी वह त्रुटि सुधार लें)

2004 में केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद मुलायम सिंह यादव को अपनी इस बेबाकी की भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। तत्कालीन यूपीए सरकार के इशारे पर उनके खिलाफ दायर हुईं PIL के माध्यम से यूपीए ने मुलायम के खिलाफ CBI जांचों की झड़ी लगा दी थी। लेकिन उस बहुत कठिन दौर से गुज़रने के बावजूद मुलायम सिंह यादव ने सोनिया गांधी और कांग्रेस के खिलाफ समर्पण नहीं किया था।

13 फरवरी को संसद में बोलते समय राजनेता मुलायम सिंह यादव जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पुनः प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद दे रहे थे उस समय यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी उनकी बगल में ही बैठी हुई थीं। लेकिन इससे प्रभावित हुए बगैर मुलायम सिंह यादव ने अपनी बात बहुत बेबाकी के साथ खुलकर कही।

ज्ञात रहे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व वाला यूपीए पिछले लगभग एक वर्ष से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी मनमानी करने वाला, किसी की बात नहीं सुनने वाला तानाशाह बताकर उनके खिलाफ बहुत तीखा और आक्रामक अभियान चला रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2019 में किसी भी कीमत पर दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनने देने के लिए यूपीए भरसक प्रयास कर रहा है।

इसके ठीक विपरीत 13 फ़रवरी को लोकसभा में बोलते समय मुलायम सिंह यादव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए भी खुलकर प्रशंसा यह कहते हुए की कि “आपने सबके साथ मिलजुलकर काम किया है। सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है। आपने हर दल के हर नेता, हर सांसद की बात को हमेशा बिना किसी भेदभाव के सुना और उनके हर सही काम को लटकाने के बजाय स्वयं पहल कर के तत्काल कराया।”

लोकसभा में मुलायम सिंह यादव की यह स्वीकारोक्ति आनेवाले दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए राजनीतिक वरदान सिद्ध हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्ष के सबसे बड़े और गम्भीर आरोप (मनमानी करने वाला तानाशाह) को सत्य एवं सही सिद्ध करने के लिए मोदी विरोधी विपक्षी खेमे को बहुत परिश्रम करना पड़ेगा।

लोकसभा में मुलायम सिंह यादव का बयान आने वाले दिनों में उत्तरप्रदेश के चुनावी कुरुक्षेत्र में मोदी विरोधी गठबंधन के राजनीतिक समीकरणों के ताने-बाने पर निर्णायक प्रभाव डालने वाला है।

उनके इस बयान ने बसपा सुप्रीमो मायावती के माथे पर राजनीतिक चिंताओं की उन लकीरों को निश्चित रूप से कई गुना गाढ़ा कर दिया होगा, जिन रेखाओं को उनके माथे पर खींचने का काम मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव कुछ महीनों पहले ही कर चुके हैं।

ज्ञात रहे कि समाजवादी पार्टी की मुख्य राजनीतिक ताकत माने जाने वाले यादव समुदाय के दिलोदिमाग पर मुलायम सिंह यादव आज भी एकछत्र राज्य करते हैं। ऐसी स्थिति में मुलायम सिंह यादव के बयान ने यूपी में सपा-बसपा महागठबंधन की बसपा कोटे वाली 38 तथा रालोद कोटे की 4 सीटों पर अपने ताकतवर यादव वोट बैंक के लिए बसपा के बजाय दूसरे विकल्प को चुनने का बहुत स्पष्ट सन्देश दे दिया है।

ज्ञात रहे कि रालोद के चौधरी अजित सिंह के साथ मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कटुता, शत्रुता का स्तर यह है कि दोनों नेताओं ने पिछले 30 वर्षों से (1989 से आजतक) एकदूसरे से बात नहीं की है। बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मुलायम सिंह यादव ने 1989 से चौधरी अजित सिंह तथा 1995 से मायावती का नाम तक अपनी जुबान से नहीं लिया है।

यह राजनीतिक रहस्योद्घाटन स्वयं मुलायम सिंह यादव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तब किया था जब उनसे चौधरी अजित सिंह से सम्बन्धित प्रश्न पूछा गया था।

अतः भारतीय राजनीति के अखाड़े के जुझारू योद्धा कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने अपने इन दोनों चिर राजनीतिक शत्रुओं को लोकसभा में केवल कुछ मिनटों के अपने भाषण के सधे हुए दांव से उत्तरप्रदेश में 2019 की चुनावी राजनीतिक कुश्ती के प्रारंभिक राउंड में ही चित्त कर दिया है।

मायावती और अजित सिंह को इस झटके से उबरने में कितनी सफलता मिलेगी? मिलेगी भी या नहीं मिलेगी? इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।

अन्त में यह उल्लेख अत्यावश्यक है कि पार्टी पर अपना शत प्रतिशत वर्चस्व कायम करने के लिए पिछले डेढ़-दो वर्षों के दौरान अपनी कथनी और करनी से मुलायम सिंह यादव को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक सिद्ध करने की शातिर सांकेतिक कोशिशें करते रहे अखिलेश यादव की रातों की नींद मुलायम सिंह यादव ने अपने बयान से उड़ा दी है।

स्तरहीन, सतही, चाटुकार सलाहकारों से घिरी, राजनीतिक महत्वाकांक्षा के आत्मघाती नशे में चूर अपनी संतान अखिलेश यादव को भी मुलायम सिंह यादव ने कल यह सन्देश दिया है कि राजनीति के अपराजेय योद्धा को अप्रासंगिक समझने की राजनीतिक भूल अखिलेश यादव को बहुत महंगी पड़ेगी। मुलायम सिंह यादव के इस संदेश का असर भी कुछ दिनों में ही अवश्य दिखाई देगा।

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