काँग्रेस मुक्त भारत : चर्चाओं में मुलायम के संदेश का दब जाना!

भारतीय राजनीति में ऐसा दुर्लभ होता जब विभिन्न पक्षों के लोग एक सी भाषा बोलने लगें। हालांकि कई ऐसे मौके होते हैं जब लोग अपनी प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर अपने मन की बात करते हैं।

सोलहवीं लोकसभा के सत्र का आखिरी दिन भी उन्हीं में से एक था, जब सब एक-दूसरे से गिले-शिकवे भुलाने में लगे थे। ऐसे मौकों पर लोग बह जाते हैं। आम भारतीय तो वैसे ही अधिक भावुक होता है।

इसी क्रम में वरिष्ठ समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव के भाषण का एक अंश बड़ा चर्चित हो रहा है। अपने संदेश में वो सबको धन्यवाद देते हुए प्रधानमंत्री की भी प्रशंसा कर रहे हैं और उनके पुनः प्रधानमंत्री बनने की कामना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘प्रधानमंत्री जी, आपने सबका काम किया, सबको साथ लेकर चलने का पूरा प्रयास किया और हम जब भी किसी काम को लेकर आपसे मिले, आपने तुरंत आर्डर किया।’

उनके इस संदेश को सब अपने-अपने तरीके से और सहूलियत के हिसाब से व्याख्या दे रहे हैं, कुछ मानते हैं कि ये औपचारिकता थी। कुछ मानते हैं कि अब उनकी उम्र हो गई है इसलिए इस बयान को उसी नजरिये से देखा जाना चाहिए और इसका राजनीतिक मतलब नही निकाला जाना चाहिए।

सत्ता पक्ष के लोगों के लिए ये किसी जैकपॉट की तरह है, तो व्यंग्य करने वाले लोग यह भी मानते हैं कि इतिहास में मुलायम सिंह ने जिन्हें भी शुभकामनाएं दी, वो दुबारा लौटकर नही आया। मसलन, डॉ मनमोहन सिंह, कल्याण सिंह और अपने पुत्र अखिलेश यादव को भी उन्होंने ऐसी ही शुभकामनाएं दी थीं।

इन सब के बीच ये सबसे अधिक असहज करने वाली स्थिति विपक्ष के लिए है। एक तरफ समूचा विपक्ष जहाँ प्रधानमंत्री मोदी पर आपातकाल लागू करने, बदले की भावना से काम करने जैसे आरोप लगा रहा है, वहीं उनके महत्वपूर्ण और सबसे कद्दावर नेताओं में से एक ने उन्हें सबको साथ लेकर चलने वाला बता दिया है। यहाँ तक कि खुद उनके पुत्र भी सरकार के खिलाफ मुखर रहे हैं। ऐसे में उन सब के लिए ये बयान परेशानी का सबब बनना तय है।

बहरहाल, इन सबके बीच मुलायम सिंह यादव के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण अंश छूट गया। यूँ कहिए कि उसपर ध्यान देना किसी ने मुनासिब नही समझा। उसपर बात करने से पहले जरा इतिहास में चलते हैं।

दो दशक पूर्व, अटल जी की सरकार गठबंधन के साथियों के कारण गिर गई थी। सोनिया गांधी ने अपने पास बहुमत होने का दावा कर दिया था। उन्होंने 283 सांसदों के समर्थन होने की घोषणा भी कर दी थी। काँग्रेस के खेमे में राष्ट्रपति से मिलने और शपथग्रहण की तैयारियां भी शुरू हो चली थी। माना जा रहा था कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री होंगी।

उनके विदेशी मूल का मुद्दा भी ज़ोर पकड़ ही रहा था कि तभी कुछ ऐसा घटा जिसने लोगों को सच मे हैरान किया। लाल कृष्ण आडवाणी को जॉर्ज फ़र्नान्डिस ने फोन किया कि वो उन्हें किसी विशेष शख़्स से मिलवाना चाहते हैं। उन्होंने आडवाणी को बगैर सुरक्षा के चुपचाप आने को कहा, ताकि किसी को खबर न हो। जया जेटली आडवाणी को लाने गईं। जया के घर पर ही जॉर्ज उस मेहमान के साथ उनका इंतजार कर रहें थे।

मुलायम सिंह यादव को वहाँ देखकर आडवाणी को भी आश्चर्य हुआ। मगर जॉर्ज और मुलायम पुराने साथी थे, यह बात उन्हें पता थी। जॉर्ज ने मुलायम की इच्छा उन्हें बताई। मुलायम काँग्रेस को समर्थन नही देना चाहते थे, लेकिन उनकी शर्त थी कि भाजपा दुबारा सरकार बनाने का प्रयास नही करेगी। लाल कृष्ण आडवाणी ने भरोसा दिया कि वो ऐसा नही करेंगे, भाजपा का मत भी दुबारा चुनाव में जाने का ही था।

मुलायम सिंह ने घोषणा कर दी कि वो काँग्रेस को समर्थन नही देंगे। सोनिया गांधी के लिए ये बड़ा झटका था। उनके दावों की हवा निकल गई। देश दुबारा चुनाव में गया, और अटलजी फिर से प्रधानमंत्री बने। मुलायम के उस कदम के पीछे आज भी कई तर्क दिए जाते हैं, जिनमें सोनिया गांधी के विदेशी मूल से होने से लेकर मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने के इच्छा तक की बात होती है।

इस बार चुनाव में विदेशी मूल का मुद्दा नहीं है। इस सहिष्णु देश ने सोनिया को स्वीकार कर लिया है। कोई ये भी नही कह सकता कि मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनना चाहते होंगे। जाहिर है, वो अपनी पारी खेल चुके हैं। लेकिन तब याद करिए लोहिया को… मुलायम सिंह के उद्भव को… सामाजिक आंदोलन को… जिसकी बुनियाद ही काँग्रेस के विरोध पर टिकी थी। याद करिए आपातकाल को, याद करिए इंदिरा को और काँग्रेस के वंशवाद को, जो दो पीढ़ी और आगे बढ़ चुकी है।

ये सच है कि इस सफर में मुलायम सिंह कई बार काँग्रेस के साथ गए। कई समझौते उन्होंने किए शासन-सत्ता और अलग-अलग कारणों के लिए। लेकिन कुछ चीजें इन सबसे परे होती हैं। इसलिए जब लोग तमाम कारण गिनाते हैं, मैं बात के मूल में लौटना चाहता हूँ। काँग्रेस और वंशवाद का विरोध मुलायम के अस्तित्व के मूल में है और जब इंसान भावुक होता है तो वो स्वाभाविक तौर पर अपने जड़ों से जुड़ जाता है। आज मुलायम भावुक थे, क्योंकि वो जानते होंगे कि यदि वो चुनाव नही लड़ेंगे तो ये उनका अंतिम संसदीय भाषण होगा।

लौटते हैं उनके भाषण पर, ‘प्रधानमंत्री जी आप फिर बनें प्रधानमंत्री’, ये कहने से ठीक पहले उन्होंने कहा, ‘मैं तो ये भी चाहता हूँ, हम लोग तो इतने बहुमत में नही आ सकते हैं। प्रधानमंत्री जी, आप फिर बनें…’ उनकी एक पंक्ति में तमाम सवालों के जवाब छुपे थे। उनके जीवन का सार छुपा था। वो बुजुर्ग जो अपने हिस्से का जी चुका है। वो जानता है कि जिस मकसद को लेकर वो आया था उसका अंजाम कहाँ है… उन तमाम समझौतों से ऊपर उठकर आज का दिन उनके लिए मन की कह जाने का था… उन्हें उतना बहुमत नही मिल सकता, जो मोदी को मिल सकता है… निश्चित ही किसी ज़बरदस्ती बनाए गए खानदानी नेता की तुलना में ज़मीन से उठा हुआ एक नेता बेहतर प्रधानमंत्री होगा। मुलायम ये बात जानते हैं…

लोग ठीक कह रहें कि इसके राजनैतिक अर्थ नहीं निकालने चाहिए… क्योंकि एक बुजुर्ग जब बिना कुछ खोने-पाने की परवाह किए बगैर, आगे-पीछे देखे बगैर बोलता है तो उसमें राजनीति के अंश और राजनीतिज्ञ की सी चातुर्य नही होते। वो बस अपने दौर की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है… जो आज के दौर में भी प्रासंगिक है… वो आकांक्षा, जिसमें इंसान काँग्रेस से इतर बदलाव को देखने लगा था… मुलायम जानते थे कि वो भले उस बदलाव का सिरमौर न हो सके, लेकिन बदलाव की सर्वस्वीकार्य दिशा को वे अपनी स्वीकृति तो दे ही सकते हैं…

तब जबकि पीढियां 1999 के उनके फैसले को याद करेगी, तो वो कहेंगी कि उसके मूल में विदेशी मूल जैसा कोई मसला या किसी पद का लोभ नहीं था। बल्कि वो एक बड़े लक्ष्य के लिए था। इतिहास जब उनका मूल्यांकन करेगा, तो निश्चित ही एक अध्याय ये भी होगा!

काँग्रेस को सचमुच बदलावों और विकल्पों के विषय में सोचना चाहिए। एक परिवार के इतर भी देश है, इस भावना को जबतक वो नही समझेंगे, तबतक उन्हें ऐसे झटकों के लिए तैयार रहना चाहिए। ठीक ही कहते हैं मोदी, काँग्रेस मुक्त भारत का नारा सिर्फ उनका थोड़े है…

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