राहुल गांधी स्वयं चुटकला भी बन गए और हमें हंसी भी नहीं आ रही

पश्चिमी राष्ट्रों में कुछ समय से यह चिंता का विषय है कि हम एक ऐसे समय में रह रहे है जिसमे सत्य अब महत्वपूर्ण या प्रासंगिक नहीं है।

ऐसी स्थिति या राजनीति को post-truth या ‘सत्योपरांत’ के विशेषण से सुशोभित किया गया। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने post-truth को वर्ष 2016 के शब्द के रूप में सम्मानित किया था।

इसके प्रमुख उदाहरण के रूप में ब्रेक्सिट (ब्रिटैन द्वारा जनमत संग्रह में यूरोपियन यूनियन छोड़ने का फैसला) और प्रेज़िडेंट ट्रम्प के चुनाव को कोट किया जाता है।

इन दोनों ही स्थितियों में ‘सहिष्णु’ मीडिया और राजनीतिज्ञ यह मान रहे थे कि ब्रिटिश जनता यूरोपियन यूनियन में ही रहने का निर्णय देगी तथा अमेरिका में ट्रम्प चुनाव हार जाएंगे। लेकिन जब परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं आये, तो उन्होंने उसे सत्योपरांत निष्कर्ष बताया।

फिर, राष्ट्रपति ट्रम्प के निर्णयों – जिसमें उन्होंने अमेरिका में शरणार्थियों के आने में रोक लगाई, चीन से व्यापार पर प्रश्न उठाये, इत्यादि – को ‘सत्योपरांत’ कहा।

अब यह तथ्य सामने आया है कि 2015 में जर्मनी में शरणार्थी आगमन के समय में जर्मन मीडिया की कवरेज बहुत ही अनियंत्रित और एकतरफा थी, जिससे आम लोगों की वैध चिंताओं का मज़ाक उड़ाया गया था।

आलोचनात्मक रिपोर्टिंग के बजाय, पत्रकारों ने केवल ‘राजनीतिक अभिजात्य वर्ग के नारे और दृष्टिकोण को अपनाया था’, जिससे आम लोग राजनीतिक रूप से असुरक्षित या हाशिए पर रह गए थे। परिणाम क्या हुआ? यूरोप में शरणार्थियों के विरूद्ध माहौल बन गया जो शरणार्थी समर्थक ‘सहिष्णु’ सरकारों के भविष्य को ले डूबा।

भारत में इस समय राहुल गाँधी सत्योपरांत या गोबर राजनीति का सहारा ले रहे हैं जिसमें उन्हें भारतीय मीडिया का भयंकर समर्थन मिल रहा है। नहीं तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि रफाल पर वे लगातार इतने झूठ बोल पाते।

यह मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद दो सरकारों के मध्य हुए समझौते से हुई है। यानि कि यह समझौता विमान बनाने वाली कंपनी Dassault – दास्सो – से नहीं किया। रफाल के लिए भारत का पैसा फ्रांस के सरकारी खज़ाने में जा रहा है, न कि दास्सो के अकाउंट में।

क्या छुटभैया नेता यह आरोप लगाना चाहता हैं कि भारत के प्रधानमंत्री और फ्रांस के राष्ट्रपति ने मिलकर घूस का आदान प्रदान किया? या फिर, कि फ्रांस की सरकार ने सरकारी तिजोरी से घूस दी? या फिर, फ्रांस की सरकार ने दास्सो कंपनी से घूस मांगी और भारत सरकार को पकड़ा दी?

इसको स्पष्ट करने के लिए यह समझिए कि बोफोर्स तोपों की खरीदारी भारत सरकार ने स्वीडन की बोफोर्स कंपनी से की जो इन तोपों को बनाती थी। बोफोर्स कंपनी से तो घूस ली जा सकती है लेकिन क्या वह घूस आपको स्वीडन की सरकार से मिल जाती?

इसीलिए समाचारपत्र ‘हिन्दू’ का यह आरोप लगाना कि मोदी सरकार ने रफाल में संप्रभु गारंटी (यानि कि फ्रेंच सरकार द्वारा दास्सो कंपनी से रफाल के डिलीवरी की गारंटी) नहीं ली या फिर सत्यनिष्ठा समझौता (integrity pact) – यानी कि रफाल के अनुबंध में भ्रष्टाचार नहीं होने का समझौता नहीं किया गया – बेमानी है। क्योंकि भारत सरकार ने समझौता ही फ्रेंच सरकार से किया है, न कि किसी निजी उद्यम से।

इसी प्रकार राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट, CAG इत्यादि पर जानबूझकर झूठे आरोप इसीलिए लगा पा रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि मीडिया उनसे प्रश्न नहीं पूछेगा।

लेकिन इस पूरे ड्रामे का एक अन्य पहलू भी है। मीडिया और पॉलिटिशियन हमेशा यह चाहते है कि उन्हें गंभीरता से लिया जाए, लेकिन आज भारतीय मीडिया एक मज़ाक बन कर रह गया है।

पॉलिटिशियन को हार से भी अधिक इस बात का डर सताता है कि कहीं वे स्वयं एक चुटकला ना बन जाए।

राहुल गांधी का तो इससे भी बुरा हाल है। वे चुटकला भी बन गए है और हमें हंसी भी नहीं आ रही।

इससे बड़ी ट्रेजेडी क्या हो सकती है।

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