राफ़ेल का भुगतान : राहुल गांधी का दर्द

राहुल गांधी का राफ़ेल प्रलाप विक्षिप्तता के शिखर पर पहुंच गया है।

मुझे शुरू में इस बात को लेकर डर लगता था कि राफ़ेल के चक्कर में कहीं राहुल गांधी पूरी तरह से अपना मानसिक संतुलन न खो दें, लेकिन जिस अहंकारपूर्ण निर्लज्जता से गांधी परिवार पोषित है, उसकी संभावना अब कम ही लग रही है।

राहुल गांधी ने अपनी पूरी दिनचर्या राफ़ेल को समर्पित कर दी है। उनका एक ही कार्य है कि नित्य रात को स्वप्न में राफ़ेल का आह्वान करके नए झूठ का सृजन करना और सुबह उसका उद्वेलित हो कर उवाच करना है। और फिर दिन के ढलने तक उसी उवाच की विष्ठा में अपना मुंह सनाये, नये झूठ के सृजन में लग जाना है।

पिछले 6 माह से राहुल गांधी राफ़ेल को लेकर सीएजी (कैग) की रिपोर्ट के पीछे पड़ा था और अब वह सार्वजनिक हो गयी है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार द्वारा किया गया राफ़ेल सौदा यूपीए सरकार द्वारा 2012 में किये गए अपूर्ण सौदे से 2.86% सस्ता है, जिससे भारत की सरकार को 27000 करोड़ रूपए की बचत हुई है।

अब यही 27000 करोड़ की संख्या है जो राहुल गांधी और कांग्रेस को न सोने दे रही है और न ही रोने दे रही है। इस नए सौदे से भारत सरकार को लाभ हुआ है वह दरअसल सोनिया गांधी सहायतार्थ कोष का विशुद्ध नुकसान है। राहुल गांधी का यह राफ़ेल विलाप, उसके माँ के प्रलाप की अंतर्कथा है।

यह भारतीय राजनीति और पत्रकारिता की विशुद्ध दरिद्रता ही है कि इस पूरी राफ़ेल गाथा में भारत की सरकार द्वारा प्रयुक्त भुगतान प्रक्रिया पर कोई बात नहीं की गयी है। ऐसा नहीं है कि इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी लेकिन इस पर मौन बना हुआ है क्योंकि उसके तथ्य दुराग्राही मीडिया के एजेंडा के अनुकूल नहीं है। मैं आज उसी को लिख रहा हूँ जिसपर मीडिया चुप है।

जब भारत द्वारा राफ़ेल युद्धक विमान को खरीदने का अनुबंध किया गया तब इन विमानों का भुगतान करने के लिए एक कोष बनाया गया। इसके लिए फ्रांस की सरकार ने अपने राष्ट्रीय बैंक में एक ट्रेज़री एकाउंट खोला है जिसपर फ्रांस की सरकार का नियंत्रण है।

इस खाते में भारत की सरकार एक मुश्त रकम का भुगतान जमा नहीं करती है बल्कि इसमे श्रृंखलावार पैसा जमा करती है। इससे भुगतान की प्रक्रिया, फ्रांस व भारत के प्रतिनिधियों के बीच हर तिमाही होने वाली उस बैठक के अनुसार होती है जो राफ़ेल सौदे की प्रगति की समीक्षा करती है। यह सब फ्रांस में, भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टेन रैंक के अधिकारी की निगरानी में होता है।

जब दोनों ही पक्ष, फ्रांस व भारत, इस परियोजना के लक्ष्यों की प्रगति को लेकर आपसी सहमति बना लेते हैं, तब इस खाते से दास्सो एविएशन और मिसाइल बनाने वाली कम्पनी को धन संवितरित किया जाता है। इसके अलावा, भारत व फ्रांस के बीच हर 6 माह पर सामरिक सहभागिता के स्तर की बैठक होती है, जो राफ़ेल सौदे की समीक्षा करती है।

यहां यह बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट है कि भारत की सरकार राफ़ेल परियोजना में भागी बने विभिन्न विक्रेताओं को कोई भी सीधे भुगतान नहीं कर रही है। भारत द्वारा राफ़ेल युद्धक विमान के लिए सभी तरह का भुगतान करने के लिए जो कोष बनाया गया है वह फ्रांस के राष्ट्रीय बैंक में बना है और उस पर सीधा नियंत्रण फ्रांस की सरकार का है।

राफ़ेल परियोजना के भुगतान के लिए बना कोष व उससे भुगतान करने की प्रक्रिया ही अपने आप में स्पष्ट कर देती है कि यह राफ़ेल सौदा पूरी तरह से दो राष्ट्रों, भारत और फ्रांस के बीच है, न कि दास्सो एविएशन और भारत के बीच है। राहुल गांधी की नैराश्य से उपजी विक्षिप्तता यही सोच कर है कि यह सौदा दास्सो एविएशन और सोनिया गांधी सहायतार्थ कोष के बीच क्यों नहीं हुआ?

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