बस ये ध्यान रहे, व्यक्ति कभी नहीं छोड़ता अपना मूल स्वभाव

खरगोश और कछुए की कहानी तो सुनी ही होगी। कहानी का प्रमुख संदेश खरगोश का अहंकार ही है, जो फिर अति आत्मविश्वास से पैदा होता है।

यह अति हर जगह हर हाल में नुकसानदायक होती है। हम राष्ट्रवादियों का अति भावुक होना भी उसमे आता है। हम बहुत जल्दी नाराज़ हो जाते हैं तो उतनी ही जल्दी खुश भी।

अधिकांश राष्ट्रवादी मित्र आज मुलायम के बयान को लेकर अति प्रसन्न हो रहे हैं। कुछ एक मित्रों को छोड़कर।

जहां एक मित्र मुलायम के बयान को समझने का प्रयास कर रहे हैं वहीं एक अन्य मित्र इसको लेकर सशंकित हैं।

मैं उनकी बात से थोड़ा आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा हूँ।

मेरा अपना मत है कि व्यक्ति अपना मूल स्वभाव कभी नहीं छोड़ता। जो व्यक्ति श्रीराम का नहीं हुआ वो किसी का नहीं हो सकता।

याद रखिये अयोध्या में गोली किसने चलवाई थी। लोहिया से लेकर जयप्रकाश को भी राजनैतिक धोखा किसने दिया था।

माना कि वो देश हित में था, मगर सोनिया भी इनकी पटखनी का शिकार हो चुकी हैं। एक बार ममता भी इनके वादे से मुकरने को झेल चुकी हैं।

ऐसा व्यक्ति अचानक साधु तो हो नहीं सकता कि, बिना किसी मकसद के मोदी के पक्ष में यूं ही बोल पड़े।

उनके निशाने पर कई हैं। और यहां ‘कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना’ वाला मामला भी है।

मगर हमें तो उस तीर को समझना है जो हम पर साधा गया है। और उनमें से एक है इस एक कथन से हम सब का अति आत्मविश्वास में आ जाना।

जबकि मुलायम का यही कथन विपक्ष को विशेषकर उत्तरप्रदेश के सपाईयों को आक्रोशित करके और अधिक एकजुट होकर लड़ने के लिए प्रेरित भी कर सकता है।

हम एक बार नोटा की मार मध्यप्रदेश में झेल चुके हैं। इस बार हमारी हवा बनाकर हमारे नीचे से ज़मीन खींची भी जा सकती है।

यहां हम मुलायम के कथन के चक्कर में चौकीदार के भाषण को नजरअंदाज़ कर रहे हैं। उसमें उन्होंने बहुमत की सरकार का वर्णन किया है।

यह जानबूझकर दिया गया कथन है। मगर हम इसके संदेश को पकड़ नहीं पा रहे।

चौकीदार की सरकार अगर बहुमत की नहीं हुई तो वो क्या कुछ नहीं कर पाएगी, इसका सन्देश मोदी साफ़ साफ़ दे रहे हैं।

यह तो विपक्ष भी जान रहा है कि हवा मोदी की बह रही है, मगर उनकी यही कोशिश हैं कि यह लहर सुनामी बनकर बहुमत का आंकड़ा ना पार कर ले।

इसके लिए सभी पुराने खिलाड़ी अपना दांव खेल रहे हैं। लेकिन पिछले चार साल का अनुभव यह कहता है कि हम राष्ट्रवादी यह नहीं समझ पा रहे।

मुलायम के कथन में बह जाना उसी का एक प्रमाण है।

इसके बावजूद आत्मविश्वास अगर बना हुआ है तो उसका एकमात्र कारण है कि इस बार राजनीति के केंद्र में मोदी हैं, जो राजनीति के हर अध्याय से ना केवल परिचित हैं बल्कि अन्य से अधिक ही जानते हैं।

यही कारण था जो दिल्ली कभी भी नहीं चाहती थी कि गुजरात का मोदी वहां आये।

अब वो आ भी गया है और अब तो पांच साल का अनुभवी भी है, ऐसे में उसका चौकीदार के पद पर लौटना तो तय है।

हमें तो सिर्फ यह सुनिश्चित करना होगा कि हम खरगोश की तरह अति आत्मविश्वास में कहीं सोते ना रह जाएँ, बहुमत का आंकड़ा तभी पार होगा।

अतः,
लक्ष्य है अबकी बार,
400 पार,
एक बार फिर,
चौकीदार सरकार।

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