The Making Story of RAFALE Fighter Jet

[ उत्पादक : द असॉल्ट एविएशन ]

“राफेल” फाइटर जेट बनाए जाने की कवायद, बिलकुल भी आसां नहीं थी.

पांच दशक से ज्यादह लगा, एक इंसान को इस तक पहुंचने में!

और जिस दिन उसने सुना कि “यू मेड ओमनीरोल”, वो इंसान इस दुनिया से चल बसा.

मानो, ये वाक्य सुनने के लिए ही उसकी साँसे चल रही थीं!

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इस कहानी की शुरुआत होती है, द असॉल्ट से.

द असॉल्ट!

ग़र ये नाम किसी बॉलीवुड मूवी के पीछे सफिक्स की भांति लगाया जाता, तो उस मूवी का नाम “आक्रमण” होता.

पूरा नाम कुछ यूं बनता : “आक्रमण – द असॉल्ट”.

किन्तु यहाँ कोई मूवी नहीं, रक्षा उपकरणों को बनाने वाली एक उत्पादक कंपनी के निर्माण की बात थी!

ये फ़्रांस है. ऑनर लीजन का फ़्रांस!

इसी फ़्रांस में मार्सेल ब्लॉच नामक एक जुनूनी नागरिक रहता था. उसके जीवन का ध्येय था : “अटैक इज़ द बेस्ट डिफेन्स”.

अर्थात्, आक्रमण ही रक्षा का श्रेष्ठ उपाय है!

बालिग़ होने पर मार्सेल ने अपना नाम में “ब्लॉच” हटा कर “द असॉल्ट” जोड लिया. अब वे हो गए, मार्सेल द असॉल्ट.

फ़्रेंच उच्चारण पद्धतियों के कारण उनका नाम “मार्सेल डासो” पढ़ा जाने लगा. फ़्रेंच भाषा में शब्द के आखिर का “टी” नहीं उचारा जाता है. किन्तु “एल” का लोप किस तरह हुआ, ये फ्रेंच का व्याकरणिक मसला हो सकता है. इसकी चर्चा फिर कभी!

उसी जुनूनी आदमी मार्सेल डासो ने, सन् उन्नीस सौ उनतीस में “डासो एविएशन” की स्थापना की. जिसे समूची दुनिया “डसॉल्ट एविएशन” या “द असॉल्ट एविएशन” के नाम से जानती है.

“डासो” को करीब दो दशक लगे, पहला “राफेल” बनाने में. मगर वो “राफेल” नहीं था. उसका नाम “हरीकेन” पुकारा गया. यानी कि चक्रवात!

तब से लेकर आज तक कुल तीन सौ बासठ “हरीकेन” बनाए गए हैं. इस बरस सात दशक पुराने होने जा रहे “हरीकेन”, इनदिनों फ्रेंच सेना से बाहर किये जा चुके हैं.

अपने पंखों पर फ्रेंच एविएशन का शानदार इतिहास उठाये, फ्रांसीसी एविएशन स्कूलों में खड़े हैं!

किन्तु “मार्सेल डासो” इससे संतुष्ट नहीं थे. “हरिकेन” को आए दो बरस ही हुए थे कि “डासो” ने विमानों की “मिस्ट्री” श्रृंखला लॉन्च कर दी.

सन् इक्यावन में आए “मिस्ट्री” के कुल एक सौ छियासठ जेट निर्माण किए गए. आजकल ये भी एविएशन स्कूल्स में खड़े हैं.

“मिस्ट्री सेकण्ड” और “मिस्ट्री थर्ड”, दोनों ही अपने कई कई प्रयासों में आकाश की ऊंचाइयों के बजाए जमीं की धूल पर ही नज़र आए.

सो, इनके एक एक प्रोटोटाइप के साथ ही ये हमेशा के लिए फ्रेम से बाहर हो गए.

अब, सन् बावन में आया “मिस्ट्री फोर्थ”!

बहरहाल, आजकल ये भी एविएशन स्कूलों की शान है. मगर इसने एक शानदार पारी खेली. कुल चार सौ ग्यारह “मिस्ट्री फोर्थ” बनाए गए, जिन्होंने फ्रांसीसी सेना और फ़्रांस के मित्र राष्ट्रों की वायु सेनाओं में स्थान पाया.

सन् छप्पन में “डासो” कुछ ऐसा लाए जो “मिस्ट्री” नहीं था. इस श्रृंखला का नाम हुआ “इटेंडर्ड”.

“इटेंडर्ड” अपने शुरुआती टेस्ट भी पास न कर सका. “इटेंडर्ड सेकण्ड” का मात्र एक प्रोटोटाइप बनाया गया. वह भी आशाओं पर खरा नहीं था.

किन्तु “मार्सेल डासो” हार मानने वालों में से नहीं थे. वे “इटेंडर्ड थर्ड” लेकर आए. किन्तु उसका हाल भी “फर्स्ट” जैसा हुआ!

अब आया “इटेंडर्ड फोर्थ”. उसका प्रोटोटाइप फ्रेंच सेना ने पसंद किया. कुल नब्बे “इटेंडर्ड फोर्थ” जेट ही आसमान में उतरे थे कि “मार्सेल डासो” ने “इटेंडर्ड फिफ्थ” के लांच की घोषणा कर दी. किन्तु उसका हश्र भी “फर्स्ट” और “थर्ड” जैसा हुआ. बिना एक भी प्रोटोटाइप बने, वे शुरूआती टेस्ट भी पास न कर सके.

फाइनली, “इटेंडर्ड सिक्स्थ” आया. और मात्र दो प्रोटोटाइप के साथ जमीं पर औंधे मुंह गिरा. इस “इटेंडर्ड” श्रृंखला ने “डासो” और “मार्सेल”, दोनों की बहुत किरकिरी करा दी थी.

किन्तु “मार्सेल डासो”ने इसे संभाल लिया. सन् छप्पन में वे “मिराज” लेकर आए. ये “मिराज थर्ड” था. जाहिर है, “मिराज” के “फर्स्ट” और “सेकण्ड” तो बिना किसी प्रोटोटाइप के ही दौड़ से बाहर हो चुके थे.

किन्तु “मिराज थर्ड” ने फाइटर जेट की दुनिया में क्रांति कर दी!

दो हज़ार सोलह में अपने छः दशक पूरे कर चुका विमान, पूरी दुनिया में कुल एक हज़ार चार सौ बाइस संख्या में मौजूद है. और आज भी सेवारत है.

“इटेंडर्ड” की किरकिरी को “मिराज” ने सुधार दिया. ऐसा दुनिया को लगता था. किन्तु “मार्सेल डासो” जानते थे कि “इटेंडर्ड” न होता तो “मिराज” को इतना बड़ा प्रायोगिक आधार न मिल पाता.

वो आदमी इतना बड़ा जुनूनी था कि साठ के दशक में अपने खाली समय को “इटेंडर्ड” जेट्स के साथ बिताता था!

इसी बीच सन् बासठ में “डासो” की “बेल्ज़क” श्रृंखला के पांचवें प्रयास ने प्रोटोटाइप टेस्ट पास किया. किन्तु फ्रेंच सेना की उँगलियों में बसे “मिराज थर्ड” के सामने “बेल्ज़क फाइव” नहीं टिक सका.

और “बेल्ज़क” बंद हो गए. एकमात्र मौजूद “बेल्ज़क फाइव” एविएशन स्कूल के किसी बरामदे में खड़ा है!

इधर “मिराज” में भी संभावित सुधारों की कवायद चलती रही. थर्ड के बाद फोर्थ, फिफ्थ, सिक्स्थ और सेवन तक अपना शुरूआती टेस्ट न पास कर सके.

“मिराज एड्थ” के कुल दो प्रोटोटाइप भी बने. मगर वो “हार्ड तो हैंडल” सिद्ध हुआ. अतः असमय बंद हो गया.

सन् छियासठ के शुरूआत में “मिराज ऍफ़-वन” आये. शानदार मिराज, जिसने अपने ही मॉडल “मिराज थर्ड” को आउटप्लेड कर दिया. समूचे विश्व में कुल सात सौ बीस संख्या के साथ आज भी कार्यरत है!

इसी बरस के आखिर में, “मिराज ऍफ़-टू” आ गया. एक प्रोटोटाइप से ज्यादा बनाया जाए, ऐसी खूबियां उसमें नहीं थीं. अतः चलन में न आ सका.

सन् सड़सठ में “मिराज जी” भी सिर्फ दो प्रोटोटाइप के साथ असफलताओं का एक और प्रतिमान बन गया. किन्तु इसी साल के आखिर में आया “मिराज फाइव एंड फिफ्टी”, आज भी संख्या में पांच सौ बयासी होकर कार्यरत है!

फ़्रांस का लड़ाकू विमानन कार्यक्रम “मिराज थर्ड”, “मिराज फाइव एंड फिफ्टी” और “मिराज ऍफ़-वन” जैसे जेट्स के साथ लगभग संतृप्त हो चुका था.

कुलमिला कर लब्बोलुआब यह था कि “मार्सेल डासो” की “मिराज” श्रृंखला ही उनके जीवन भर के श्रम का परिणाम रही!

किन्तु ऐसा संसार को लगता था. “मार्सेल डासो” खुद ऐसा नहीं मानते थे. वे अब भी अपना खाली समय “इटेंडर्ड” के साथ बिता रहे थे.

और सत्तर के दशक के शुरूआती चार साल बीतने के बाद, एक दिन उन्होंने फ़्रांस की ही एक और एविएशन उत्पादक “ब्रेग्वेट” के साथ मिलकर “इटेंडर्ड” लॉन्च कर दिया.

“इटेंडर्ड” के खराब इतिहास और “मिराज” की सफलताओं ने इस “लॉन्च” को दबा दिया. किन्तु ये जेट्ज़ इतने शानदार बने कि इनकी वर्तमान संख्या “पिचासी” है और ये फ्रेंच सेना में आज भी कार्यरत हैं.

“मिराज” का अंतिम सफल विकास “मिराज 2000” के रूप में हुआ. कुल छह सौ एक संख्या के साथ ये कई देशों की वायुसेनाओं में कार्यरत हैं.

“मिराज 4000” का एकमात्र प्रोटोटाइप फेल होने के कारण “मार्सेल डासो” ने इसका उत्पादन बंद करवा दिया.

अब भी, संसार यही मानता था कि “मार्सेल डासो” का सबसे शानदार काम “मिराज” ही है!

मगर “मार्सेल” को “ओमनीरोल” भी बनाने थे. यानी कि वायु में ही दुश्मन के प्रहारों से बचने के लिए “मल्टीरोल” कर सकने में सक्षम जेट्स.

और उनका ये सपना सन् छियासी में पूरा हुआ. जब “मार्सेल डासो” ने सुना कि जेट को “ओमनीरोल” कराने का सपना पूरा हुआ, लंबी बीमारी से जूझते हुए उस कमज़ोर शरीर से उस दिव्य आत्मा का पारगमन हो गया.

उनका जाना शोक का नहीं, उत्सव का कारण था. जिस लक्ष्य हेतु वे जमीं पर आए थे. उसे पूरा कर के जा रहे थे. भले, इस जादुई जेट को सन् दो हज़ार एक में फ्रेंच सेना ने अपनाया, किन्तु ये सन् छियासी से ही शानदार था. इक्कीसवीं सदी की सोच तक अपनी पैठ बनाने वाला जेट. राफेल!

राफेल बोंजू, राफेल बोंस्वा…

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