अर्थव्यवस्था-6A : फियट मनी, क्रिप्टो करेंसी, मुद्रा अवमूल्यन और गोल्ड

पिछले लेख पर एक सज्जन ने फियट मनी (Fiat Money) के बारे में जानना चाहा था और उसमें तथा क्रिप्टो करेंसी में अन्तर समझना चाहा था।

स्वर्ण मुद्राएँ और बाद में चाँदी (चाँदी भी लक्ष्मी का एक नाम है रूपा, जिससे शब्द रूपया बना है) का भारतीय इतिहास अद्भुत है, पर मैं आज आप लोगों को फियट मनी तथा अवमूल्यन के बारे में बताऊँगा।

फियट मनी और मुद्रा का अवमूल्यन समझाने के लिए मैं आपको 2000 वर्ष पूर्व रोमन साम्राज्य की यात्रा पर ले चलता हूँ। डिनेरियस (Denarius) के समय में पहली बार यूरोप में जब आधिकारिक मुद्रा बनी तब उसमें 94% चाँदी की मात्रा थी। पर धीरे धीरे रोमन साम्राज्य में चोरों और लुटेरों की संख्या, कॉलेजियम इत्यादि का भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा था।

100 AD आते आते चाँदी का प्रतिशत सिक्कों से घटकर 85% रह गया। 218 AD आते चोर ‘नीरो’ ने और अवमूल्यन करके इसे 43% कर दिया था। और उसके बाद 244 AD में फ़िलिप जब रोम का राजा बना तो वैटिकन भी अपना पैर और फर्जीवाड़ा जमा रहा था। डिनेरियस का ज़बरदस्त अवमूल्यन किया गया चाँदी का प्रतिशत केवल 0.05% रह गया।

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[अर्थव्यवस्था-5 : ज़िले जॉ और इंडिगनैंट आंदोलन]

फ़ेबियन समर्थित लोगों ने रोम में अराजकता फैला ही रखी थी और जब डिनेरियस पूरी तरह से कोलैप्स किया तो उसमें चाँदी 0.02% रह गया था। अर्थात उसमें से गला कर चाँदी निकालने से जितना ख़र्च आता उतने की चाँदी भी नहीं होती।

फियट मनी को आप सच्चे अर्थ में एक टॉयलेट पेपर ही समझिए, जिस दिन उसका बुरी तरह से अवमूल्यन हुआ उसकी कोई क़ीमत नहीं रह जाएगी।

नोटबदली के कारण भारतीय रूपए की साख कैसे बची, इस पर बाद में लिखूगा और आप लोग मोदी का पैर धोकर पीएंगे क्योंकि ‘परिवार’ की लूट और पड़ोसी देशों के रास्ते से भारतीय रूपए की कालाबाज़ारी काँग्रेस की देखरेख में चल रही थी, इस विषय पर बाद में।

आधुनिक फियट मनी का इतिहास 1971 का बना हुआ है। जब राष्ट्रपति निक्सन ने अमरीकी प्रभाव का उपयोग करते हुए, स्वर्ण के स्थान पर डॉलर को वैश्विक आधार बनवा दिया।

आधुनिक अर्थव्यवस्था को और बेहतर समझने के लिए आपको एक साधारण सा उदाहरण देता हूँ।

आप एक बार आधुनिक मेडिकल सिस्टम पर ध्यान दीजिए और उसके अप्रोच पर। एन्टी बॉयोटिक को आए हुए कुछ ही दशक हुए हैं और इसने कुछ लोगों की उम्र 72 से बढ़ाकर 75 कर दी, पर आज स्थिति यह है कि वर्ष 2050 तक नई एन्टी बॉयोटिक पर रिसर्च लगभग समाप्त हो जाएगा और रोग दबाने के स्थान पर रोग को जड़ से उखाड़ने की सनातन प्रक्रिया ही एकमात्र उपाय बचेगा। वही स्थिति अर्थशास्त्र की है।

अमेरिका के ऊपर कई ट्रिलियन डॉलर का क़र्ज़ है। संकेत दे रहा हूँ उसके पास ‘गोल्ड रिज़र्व’ है। जिस प्रकार से गोल्ड की क़ीमत बढ़ रही है मुझे यह लगता है कि अमेरिका चाहता है कि गोल्ड की वैल्यू इतनी बढ़े कि वह क़र्ज़ से अधिक हो जाय।

वैश्वीकरण का सनातनी तात्पर्य ‘स्व’ को विश्व बनाना था, यहाँ पर कल्याण की भावना थी और हम दुनिया की देखा देखी नक़लची बन्दरों के जैसे विश्व को ही ‘स्व’ बनाने में लग गए।

1991 में पूरा का पूरा यूरोपियन और अमेरिकन मॉडल ज्यों का त्यों कॉपी पेस्ट कर दिया गया। जबकि सनातन का सिद्धांत कहता है कि ‘स्व’ की सीमा का इतना विस्तार करो कि ‘अन्य’ अपना बन जाये। अन्य के ‘होने’ में अपना ‘होना’ सम्मलित हो जाये।

सनातन सदैव सह-अस्तित्व की बात करता रहा है, और सह-अस्तित्व केवल मनुष्यों के साथ नहीं बल्कि पञ्च भूतों के साथ भी।

पर समष्टि का हितकारी बनने के पहले उस व्यक्ति को व्यष्टि का हितकारी बनना पड़ता है। यदि आप प्रयाग के कुम्भ मेले में रहकर भी अपने आप को अकेला पाते हों तो आप सार्थक दिशा में नहीं हैं।

यदि आपका परिवार टूट रहा हो, और आप अपने वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में भेजकर अपना छुटकारा पाना चाह रहे हों तब सनातन का ‘अयं निजं गणोवेति… वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात पूरा विश्व ही हमारा परिवार है, का क्या अर्थ निकलेगा?

अत: अपनी उन्नति करते हुए कैसे विश्व की उन्नति हो यह सनातन के अर्थ शास्त्र का मूल रहा है जो ‘इदं न ममं’ पर आधारित है।

एक सज्जन ने कहा था कि ‘आपके दार्शनिक लेख तो ठीक, पर आप किस हैसियत से अर्थशास्त्र पर लिखते हैं’, उन सज्जन को जानकारी दे दूं कि मेरे पास भी MBA Finance की डिग्री है और जिसे भी मैं एक टॉयलेट पेपर ही समझता हूँ।

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