मियां व्यस्त, काँग्रेस मस्त, मुल्क पस्त

मुस्लिम कानूनों यानी शरिया में, औलाद अल्लाह की देन है। उसकी उत्पत्ति में कोई अवरोध उत्पन्न करना मुसलमानों के लिए हराम है।

हराम से भी आगे बढ़ कर यह कुफ़्र है। अतः कंडोम का उपयोग हराम है, भले बलात्कार करते हुए कोई एड्स का शिकार हो जाए। क्या बुराई है? बहत्तर हूरें, गिलमा लौंडे और शराब की नदी ज़मज़म हाज़िर है। और क्या चाहिए? मियां मस्त।

औरत आदमी की ऎसी खेती है, जिसे वह जब चाहे, जैसे चाहे, जहां चाहे, जिस तरह चाहे, जिस वजह से चाहे, बिना वजह चाहे; अपनी मर्ज़ी से जोत सकता है। आगे से आओ, पीछे से आओ, ऊपर से आओ, नीचे से आओ, दाएं से आओ, बाएं से आओ। और भी कोई एंगल संभव है, तो उससे आओ। आपकी खेती हमेशा हाज़िर है। उसे कोई हक़ नहीं कि अपना दर्द बयान करे। करे, तो ‘तीन’ हाज़िर।

अनेक आलिम-फ़ाज़िल मौलाना बताते हैं कि औरत में आदमी की तुलना में चौथाई दिमाग़ होता है।

दिल्ली हो या बसरा जैसा पाक मुक़द्दस शहर, निजाम एक सा है। कोई मुक़दमा हो, एक औरत की गवाही के कोई मायने नहीं। एक आदमी अगर गवाह है, तो उसके मुकाबले पीड़ित का काम एक से नहीं चलेगा, दो महिलाएं पेश करनी पड़ेंगी। अर्थात दो औरतों की गवाही एक आदमी के बराबर।

शादी या कहें कि निकाह के समय मेहर की रकम का निर्धारण भी ग़ज़ब है। मसलन, शाह बानो आपा के निकाह के वक्त यह तय हुई चांदी के दो-चार सिक्के। उस वक़्त मौजूद उम्मा वाह-वाह कर उठी। इसलिए कि उस वक्त यह बहुत बड़ी रकम थी। किसी ने यह सोचा ही नहीं कि इस रकम की औकात दस-बीस साल बाद क्या होगी? हश्र न किसी ने सोचा था, न किसी को पता था।

शौहर हुजूर ने कुछ साल में एक पूरी क्रिकेट टीम शाह बानो आपा से उत्पन्न की और जब मन चाहा उन्हें एक विशेष शब्द तीन बार सुनाया – तलाक़, तलाक़, तलाक़; और उन्हें सड़क पर धकेल दिया। इस वक्त शाह बानो आपा की उम्र थी पचहत्तर साल।

मुल्क काँग्रेस के कम्प्यूटर और मोबाइल से खेलने वाले अत्याधुनिक नेता और तत्कालीन पीएम राजीव गांधी के सेक्लयूलर शासन का सुफल भोग रहा था। शाह बानो आपा शौहर के इस अन्याय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं और वहां से फैसला आया कि शाह बानो आपा गुज़ारा भत्ता की हक़दार हैं। इसमें न तो कोई मज़हबी क़ानून आड़े आता है, न किसी क़बीलाई निज़ाम को दखल देने का अधिकार है। एक नितांत अशक्त बूढ़ी महिला को अपने जीवनयापन के लिए मदद मिलनी ही चाहिए।

देश की अत्याधुनिक डॉटर प्रियंका वाड्रा के अत्याधुनिक अब्बा हुजूर पीएम फ़ौरन वोटों के लालच में सारी आधुनिकता भूल गए। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उलट कर उस बूढ़ी महिला को भूखों मरने के लिए छोड़ दिया गया। यह तक नहीं सोचा गया कि तलाक़ के लिए शरिया में कुछ प्रावधान हैं। इद्दत यानी सभी तलाक़ के बीच एक निश्चित अवधि है और उसके बाद अंतिम फैसला है। एक साथ तीन बार बोला गया तलाक़ उसी मज़हबी यानी शरिया क़ानून के ही खिलाफ है, जिसकी दुहाई दी जाती है।

दरअसल, वोटों की लहलहाती फसल के सामने किसी काँग्रेसी को कुछ भी सुहाता ही नहीं। इसके लिए वह कुछ भी कर गुज़र सकता है। सो, कर दिया।

आज वर्तमान सरकार शरिया के खिलाफ चल रहे एक साथ ‘तीन तलाक़’ को ख़त्म करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट से करवा कर उसे लागू करवाना चाहती है, तो यह मुल्ला-मौलवियों के वोटों की भूखी जमात फिर लाखों-करोड़ों महिलाओं का भविष्य अंधकार में धकेलने पर आमादा है। इसके हौसले इतने बुलंद हैं कि साफ़ घोषणा कर दी गई है – हम सत्ता में आये, तो एनडीए सरकार और सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को उलट देंगे।

और मैं कहता हूं – अगर औरत की आह में दम है और ऊपर किसी आसमान में कोई अल्लाहतआला वाकई है, तो वह तुम्हारी क़िस्मत पलट देगा। तुम अब कभी सत्ता पर क़ाबिज़ नहीं हो सकते।

आमीन।

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