कोई दुविधा या भ्रम तो है ही नहीं

कल जब मैं एबीपी न्यूज़ के स्टूडियो में बैठकर लखनऊ का विहंगम रोड शो देख रहा था, तब कई बार ठहाका मारकर हंसने की हालत हो गई थी लेकिन किसी तरह से खुद को संभाल ले गया।

लखनऊ से चैनल के वरिष्ठ रिपोर्टर बार-बार यह दुहरा रहे थे कि ज्यादातर कार्यकर्ता अमेठी और रायबरेली से आए हैं। ध्यान रहे! कार्यकर्ता!! जनता नहीं।

तब हमारे साथ बैठे तीन प्रमुख विद्वान इंदिरा प्रियदर्शिनी पार्ट 2 के चरणों में दंडवत थे। एक विद्वान बंगाली बाबू तो यहां तक कह गए कि इतनी भीड़ है! ये सिर्फ़ कार्यकर्ताओं की नहीं हो सकती इसमें तो बहुत भारी संख्या जनता की है!

क्लोज़ शॉट से सौ लोगों को कवर करें तो बहुत नज़र आते हैं। महाशय उसी चक्कर में फंस गए ऊपर से दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है!

विद्वानों से इतर एंकर तो बिछी ही जा रही थी। ये देखिए उनकी मुस्कुराहट! वो देखिए कनेक्ट! ये देखिए आंखों का ध्यान!

कई बार लगा जैसे मुझे मूर्छा आने वाली है।

एक विद्वान ने यह भी कहा कि मीडिया जिस तरह से प्रियंका को कवरेज दे रहा है उससे लगता है कि बड़ा फर्क पड़ा है।

हे प्रभु! पत्रकारों के भीतर कितना कांग्रेसी खून है!! हमारे बाप दादा की पीढ़ी सुधर गई। कांग्रेसी से भाजपाई हो गई। ये नहीं बदले।

इनका वश चले तो ये नरेन्द्र मोदी को नोच कर खा जाएं। आश्चर्य है! इन्होंने पिछले साढ़े चार वर्षों में क्या क्या न किया। निरंतर मोदी के विरुद्ध अभियान चलाया। कभी असहिष्णुता तो कभी अर्थव्यवस्था। कभी नोटबंदी तो कभी रोज़गार। कभी अभिव्यक्ति की आज़ादी तो कभी कश्मीर।

वह आदमी चुपचाप काम करता रहा। जहां बोलने की ज़रूरत थी वहां दहाड़ा भी। उस व्यक्ति ने महज़ चार वर्षों में भारतीय राजनीति की अत्यंत जटिल संरचना को छिन्न-भिन्न कर मोदी बनाम अन्य कर दिया। और यह सब सकारात्मक विकास से संभव हुआ।

ध्यान रहे कि वंशवाद, जातिवाद, तुष्टिकरण और खाने खिलाने की राजनीति करते हुए वे कभी ऐसा न कर पाते। उनमें सत्य और धर्म की शक्ति है तभी आज सारे शिकारी मिल गए हैं।

आज भारत का विशाल जनसमूह उनके साथ खड़ा है। जो उनका विरोधी है, वह देशद्रोही, कट्टर, बेईमान, परम जातिवादी और भ्रष्ट है। इस घुन लगे हुए देश में इतने छोटे समय में संरचनात्मक और गुणात्मक परिवर्तन लाना अभूतपूर्व उपलब्धि है।

मोदी ने भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार किया। विकास की रोशनी वहां तक पहुंचाने में बड़ी सफ़लता पाई, जहां सिर्फ़ वायदों का अंधेरा पहुंचता रहा। देश का गरीब आज अनुभव कर रहा कि सच्चे अर्थों में कोई उनकी चिन्ता कर रहा। कोई है जो जात पात, निजी स्वार्थ, लूटपाट, धन-संचय, दलाली से मुक्त है।

आधुनिक भारत का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव सामने है। इस निर्णायक क्षण में बहुत षड़यंत्र रचे जाएंगे। न जाने किन-किन कंदराओं से सर्वे निकालें जाएंगे। रिपोर्ट छापी जाएगी। झूठ के बुर्ज खड़े किए जाएंगे परंतु जनता को स्थिर होकर सिर्फ अपनी आंखें खोलनी है। कोई दुविधा या भ्रम तो है ही नहीं।

बाक़ी सब स्वार्थी, मक्कार, झूठे, बहुत भ्रष्ट और देशघाती हैं जिन्होंने इस देश को सिर्फ लूटा है और अपनी वंशवृद्धि की है। बस एक नरेन्द्र हैं जिन्होंने इस भारतभूमि के उत्थान का संकल्प लिया है। मेरी पत्रकारिता का प्रतिपल उनको ही समर्पित है क्योंकि मेरे लिए देश ही सर्वोपरि है। यही मेरा निजधर्म, यही मेरी पत्रकारिता का भी धर्म।

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