ऎसी दीवानगी, देखी नहीं कभी…

अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन की तूती बोलती थी। आज के नौजवानों, बच्चों को पता भी नहीं है कि टिकट ब्लैक करना क्या होता है लेकिन उस वक़्त अमिताभ की अधिकांश फिल्मों के टिकट ब्लैक होते थे। अमिताभ के चाहने वाले दुगने, तिगुने और कई बारी 10 गुना तक ज़्यादा दाम चुकाकर टिकट खरीदते थे।

अमिताभ की पर्दे पर एंट्री होते से ही सिनेमा हॉल सीटियों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता था। अमिताभ के डायलॉग्स पर लोग सिक्के उछालते थे।

तब ड्रेस सर्कल का 1 रुपये 60 पैसे में टिकट लेकर अधिकांश लोग केवल यही सिक्के लूटने जाया करते थे और इन्हीं लूटे हुए पैसों से बार बार फ़िल्म देखते थे। अमिताभ के चाहने वाले उनकी फिल्मों को दो से अधिक बार जरूर देखते थे।

जब कुली फ़िल्म की शूटिंग के दौरान अमिताभ घायल हुए तब देश विदेश से अमिताभ प्रेमी उनके लिए दुआएँ कर रहे थे, पूजा हवन करवा रहे थे, कई दीवाने हज़ारों मील दूर का सफर पैदल करते हुए मुंबई पहुँचे थे। उनके अस्पताल घर के बाहर हज़ारों की तादाद में प्रशंसक जमा रहते थे। देश और दुनिया भर से हज़ारों लाखों चिट्ठियाँ उनको मिलती थीं।

ये दौर था अमिताभ बच्चन का और ऐसी दीवानगी थी। यही दीवानगी 70 बसंत पार कर चुके अमिताभ के लिए आज भी है, आज भी हर रविवार उनके घर के बाहर प्रशंसकों का हुजूम उमड़ता है और अमिताभ कुछ देर के लिये उनसे मुखातिब होते हैं। अमिताभ के लिये इस दीवानगी के लिए पैसे देकर भीड़ नहीं जुटाई जाती।

अमिताभ का ये जलवा आज भी कायम है उनके समकालीन अभिनेता आज जहाँ गुमनामी में जी रहे हैं वहीं अमिताभ आज भी उतने ही व्यस्त हैं जितने वो अपने स्टारडम के समय हुआ करते थे। उनके साथी अभिनेताओं और आज की खान ब्रिगेड को आज भी इस बात का मलाल है कि वो लोग अमिताभ की इस चमक के 10 प्रतिशत तक भी नहीं पहुँच पाए हैं।

आज़ादी के पहले और बाद में अनेक नेता इस देश में हुए। अनेक प्रधानमंत्री हुए लेकिन कोई भी मोदी जैसा करिश्माई नहीं हुआ। 2014 में जिनको लहर नज़र नहीं आती थी वो सुनामी में उड़ गए थे। इस बार भी ये लोग वही ग़लती कर रहे हैं या शायद नियति उनसे करवा रही है।

मोदी के चाहनेवाले, दीवाने भी वैसे ही हैं जो अमिताभ के हुआ करते थे। बल्कि मोदी के रूप में एक वास्तविक नायक को देखने जानने का अनुभव देश की जनता को हुआ है। आज विवाह पत्रिकाओं में, कैरी बैग में, बिल में लोग मोदी को दुबारा चुनने की अपील कर रहे हैं। ‘नमो अगेन’ की टी शर्ट्स, स्टिकर्स, लोग स्वयं प्रिंट करवा रहे हैं खरीद रहे हैं।

इस दीवानगी को विपक्ष समझ नहीं पा रहा है या समझ रहा है तो ये उसके गले नहीं उतर रहा है कि ऐसा भी हो सकता है।

देश की जनता ने ही 2014 में मोदी पर भरोसा करके पूर्ण बहुमत की सरकार सौंपी थी और 2019 में भी यही जनता मोदी को दुबारा चुनने का मन बना चुकी है।

सोशल मीडिया पर लाखों करोड़ों लोग मोदी के समर्थन में बिना किसी लालच के लिख रहे हैं। जिनको कोई पैसे नहीं दिए जा रहे बल्कि लोग अपनी स्वेच्छा से तन मन धन से इस काम में जुटे हैं।

आज के इस आधुनिक युग में भी कांग्रेस अगर ये सोच रही है कि रॉफेल जैसे गुब्बारे को फुलाकर या प्रियंका वाड्रा की नाक उसकी दादी से मिलवाकर वो चुनाव जीत सकती है तो ये वैसे ही है जैसे रेगिस्तान में रेतीले तूफान के आने पर शुतुरमुर्ग रेत में अपना मुँह घुसा लेता है और सोचता है कि उसके न देखने से तूफान ख़तम हो जाएगा।

कल लखनऊ में भाई बहनों के रोड शो की हालत ये रही कि वो हिट था ये दिखाने के लिए तेलंगाना की रैली के फोटो दिखाने पड़े और तलवे चाटु भांड मीडिया बजाय असली भीड़ (?) के केवल बस की छत पर ही फोकस किये बैठा था और सोच रहा था कि वो इस बार भी अटलजी वाली कहानी दोहरा लेगा।

दरबारी मीडिया के मुताबिक अगर कल का रोड शो ये दिखाता है कि प्रियंका वाड्रा को जनता ने स्वीकार कर लिया है और कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ जायेगी तो मोदी के रोड शो और रैलियों को देखकर तो 2019 में चुनावों पर होने वाले खर्च को बचाकर मोदी को निर्विरोध प्रधानमंत्री बना देना चाहिए।

विपक्ष को ये समझ लेना चाहिए कि चुनाव नेता नहीं जनता जिताती और हराती है। ये क्रिकेट मैच नहीं बल्कि जन भागीदारी का महाखेला है यहाँ जनता ही खेलती है और अंपायर बनकर फैसला देती है।

महाठगबंधन आज भी ज़मीनी हक़ीक़त से कोसों दूर है मोदी के खिलाफ तमाम साज़िशें, बयानबाज़ी आखिर में उसे ही भारी पड़ेगी।

ताकि सनद रहे…

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