अर्थव्यवस्था-5 : ज़िले जॉ और इंडिगनैंट आंदोलन

लेख पढ़ने के पहले एक जोक पढ़िए…

यदि कोई भूखा, खाने के लिए किसी से रोटी माँगे और उसे उत्तर मिले कि यदि रोटी नहीं है खाने को तो मिठाई खाओ, पूरी खाओ, खीर खाओ…

तो भूखा व्यक्ति क्या सोचेगा? भूखा सोचेगा कि या तो अगला पागल है या उसका मज़ाक़ उड़ा रहा है।

पर आप आश्चर्यचकित मत होइए, आज से लगभग 220 वर्ष पूर्व जब फ्रांस की क्रांति हुई थी उसके पहले, भूखे लोग जब रोटी की डिमांड करते हुए फ्रांस की रानी के पास पहुँचे तो रानी ने यही कहा कि यदि तुम्हारे पास रोटी नहीं है तो केक खाओ और बियर वाईन पियो…

जैसा कि मैंने पिछली कड़ी में बताया था कि भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट करने के काम, एक औद्योगिक स्तर पर अंग्रेज़ों ने किया। अंग्रेज़ों ने भारत पर वही सब कुछ लादा, जो उन पर रोमन साम्राज्य ने लादा था, और पीछे जाने पर वही बातें ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ में देखने को मिलती है।

वास्तव में आज के क़र्ज़ और ब्याज माफ़ी की नौटंकी का आधार आपको मोज़ेक लॉ (पैग़म्बर मोज़ेज की किताब पुरानी बाईबिल) में मिल जाएगा। उसके पहले यही क़र्ज़ वाली इकॉनमी बेबिलोनिया और सुमेरु की सभ्यता में थी।

सनातन सिद्धान्त की अर्थव्यवस्था की चर्चा बाद में करेंगे।

[अर्थव्यवस्था-1 : किस ओर जा रहा है विश्व]

[अर्थव्यवस्था-2 : बौद्धिक संपदा के बाद, अगली लड़ाई Artificial Intelligence को लेकर]

[अर्थव्यवस्था-3 : अर्थव्यवस्था का मूल है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’]

[अर्थव्यवस्था-4 : क़र्ज़ माफ़ी का इतिहास]

आज के राजा कौन हैं? आज के ग्लोबलाइज़ेशन के युग में टाई बाँधे बैंकर, गिटपिट बोलते पत्रकार या वो अर्थशास्त्री हैं जो ज़मीनी हक़ीक़त से या तो बहुत दूर हैं और या धूर्त हैं और एक भ्रष्ट इकोसिस्टम के पार्ट बने हुए हैं।

भारत में ग्लोबलाइज़ेशन को लाने का काम मनमोहन सिंह ने नरसिम्हा राव की सरकार में किया, पर वही ग़लती दुहराई गई कि उस उदारीकरण को ठीक वैसा ही कॉपी पेस्ट कर दिया गया जो दस वर्ष पूर्व यूरोप और अमेरिका में किया जा रहा था। भारत के सनातनियों की मानसिकता का कोई ध्यान नहीं रखा गया।

अब इस ग्लोबलाइज़ेशन को ऐसे समझिए, जैसे खाना पकाने के लिए भारत में आपको ‘माइक्रोवेव ओवन’ दे दिया जाय। अब यूरोप में खाना मुख्यत: बेक (bake) किया जाता है अत: वह एक ओवन से हटकर दूसरे यानि माइक्रोवेव ओवन में चले गए। पर भारत में भोजन तो पकाया जाता है पर हमपर वही माइक्रोवेव ओवन थोप दिया गया। अब माइक्रोवेव में कुछ भारतीय खाने भी जल्दी बनने लग गए पर 20-25 वर्ष में ही हेल्थ प्रॉब्लम दिखने लग गई।

अब इसी माइक्रोवेव को मैं अर्थशास्त्र में बदल कर बताता हूँ। 1991 के पहले भारत के छोटे शहर नष्ट नहीं हुए थे और गाँव कराह रहे थे पर जीवित थे। परन्तु ग्लोबलाइज़ेशन ने जैसे यूरोप में किया वही काम भारत में होने लगा…

इंग्लैंड में सबकुछ लंदन में सिमटने लगा, फ्रांस में पैरिस और इसी प्रकार मेगा सिटीज बनने लग गए। इन मेगा सीटिज में मैन्युअल लेबर्स का कोई स्थान नहीं था और कम पैसा कमाने वाला या तो अभाव में जिए या बढ़ी हुई प्रापर्टी बेचकर किसी छोटे शहर में भाग जाए।

ग्लोबलाइज़ेशन की दुनिया में यह मान लिया गया कि लंदन के टैक्स तथा क्वांटिटेटिव इजिंग के ज़रिए इंग्लैंड इतना कमा लेगा कि छोटे शहरों को भी पाल लेगा। वही बात पेरिस के लिए फ्रांस ने सोचा। और वही कार्बन कॉपी दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर इत्यादि के साथ भारत में किया गया।

आज फ्रांस की स्थिति यह है कि दो ज़िले जो आपस में 200 मील की दूरी पर हैं वहाँ पर जाने के लिए एक ज़िले से 200 मील दूर पहले पेरिस जाइए, फिर पेरिस से 200 मील दूर उस दूसरे जिले में जाइए या फिर पब्लिक ट्रेन न लेकर अपनी कार लेकर जाइए।

वही स्थिति मैड्रिड की है, वही लंदन की… अर्थात ग्लोबलाइज़ेशन का प्रयोग जो यूरोप ने 1975 के बाद प्रारम्भ किया था उसकी बत्ती गुल होने लगी है पर यूरोप तथा अमेरिका के बड़े तथाकथित थिंक टैंक अभी भी शुतुरमुर्ग के जैसे अपनी गर्दन रेत में डाले हुए हैं।

आप अपनी आँखों से देख रहे हैं कि डी-ग्लोबलाइज़ेशन प्रारम्भ हो चुका है। दावोस, जो कि फ्रॉड ग्लोबलिस्टों का अड्डा है उससे भी कई राजनेताओं का मोह भंग हुआ है। ग्लोब ऑर्गनाइज़ेशन जैसे ह्यूमन राइट्स, वीमन राइट्स, पेटा इत्यादि मज़ाक से अधिक कुछ भी नहीं है और इनपर ग्लोबलिस्ट वामपन्थियों का क़ब्ज़ा जैसा ही बना हुआ है।

तो इस बार के ग्लोबल नौटंकी दावोस में न मोदी गए, न ट्रम्प, न टेरिज़ा मे और न ही मैंक्रां… भारत की ओर से काँग्रेस नेता और फ़िलहाल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ज़रूर गए थे। मेरा यह मानना है कि 2020 तक आते आते दावोस को कदाचित कोई न पूछे।

अब एक बात और समझ लीजिए, यदि आप भारत में कोई आंदोलन देखें और उसका समर्थन बरखा दत्त या रविश कुमार कर रहे हों या गुरमेहर कौर या तैमूर की मां करीना या जिग्नेश मेवानी, या हार्दिक पटेल या कन्हैया फ़ॉर्म टुकड़े गैंग कोई बैनर लेकर खड़ें हो जाए उस आंदोलन के समर्थन में, तब आप पक्का जान जाते हैं कि यह आंदोलन एक पूरा का पूरा फर्जीवाड़ा है।

पर यदि कोई फ्रॉड सेलिब्रिटी यदि किसी आंदोलन का समर्थन नहीं कर रहा तो आप आँख खोलकर देखिए की कोई इनके समर्थन में क्यों नहीं आया।

जैसा कि ऊपर बताया, कि ग्लोबलाइज़ेशन के कारण बहुत धन तो आया पर वह धन लंदन, पैरिस, मैड्रिड, मुंबई, दिल्ली, NCR जैसे महानगरों में क़ैद हो गया, और वही ग़ुस्सा आज फ्रांस में ज़िले ज़ॉ (gilets jaunes) या स्पेन में इंडिगनैंट आंदोलन (indignant movement) के रूप में फूट पड़ा है।

छोटे शहरों और क़स्बों के लाखों लोग पीली जर्सी पहन कर हर शनिवार को आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन करने वाले बेरोज़गार नहीं हैं, ये डॉक्टर हैं, इंजिनियर हैं, नर्सेज़ हैं, छोटे दुकानदार हैं तथा छोटे शहरों के अन्य कर्मचारी हैं जिनके लिए पैरिस या लंदन या मैड्रिड पहुँच से बाहर हो चुके हैं और वे लोग खुद को सेकेन्ड ग्रेड नागरिक जैसा अनुभव कर रहे हैं।

यूरोप में हुई छोटी सी घटना को भी मेन स्ट्रीम मीडिया दिन भर प्रचारित करता है और भारत का बिकाऊ मीडिया भी वही काम करता है, पर ज़िले जॉ या डिप्लोरबल या इंडिगनैंट का कोई समाचार main steam media नहीं दिखा रहा है और भारत में इसकी चर्चा न के बराबर है, और एक भी सेलिब्रिटी इन लाखों लोगों के समर्थन में एक भी ट्वीट तक नहीं किया है।

ज़िले ज़ॉ, यूरोप के बिखरे हुए समाज का दर्पण है जिसे न तो वामपंथी स्वीकार रहा है और न ही नशे में चूर पूँजीवादी और भारत में तो कुएँ में भांग पड़ी ही हुई है।

अगली कड़ी में थोड़ी चर्चा ‘बिट क्वाईन’ तथा अन्य अल्गोरिथमिक समाज पर करेंगे।

क्रमश:..

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