शौर्यम् दक्षम्

युद्धघोष, अर्थात् “बैटल-क्राय” या “वॉर-क्राय”। यानी कि युद्ध के मोर्चे पर पराक्रम को जागृत करने हेतु किया जाने वाला “घोष”।

ये “घोष” सदैव दो भागों में होते हैं। पहला भाग कमांडर उचारता है और दूजा भाग पूरी कम्पनी उचारती है।

फ़िल्म “उरी” में कई युद्धघोषों का उल्लेख किया गया है। जैसे कि “हाउ इज़ द जोश?”

कमांडर के पश्चात् कम्पनी कहती है : “हाई सर”।

कमांडर और कम्पनी के बीच का ये प्रश्नोत्तर भारतीय सेना के “गोरखा राइफ़ल्स” के घोष “केटा नाइन जीआर को” से प्रभावित है।

इस पंक्ति में कमांडर पूछता है : “बॉय इज़ ऑफ़ नाइन गोरखा राइफ़ल्स?” तिस पर कम्पनी की हर एक आवाज़ कहती है : “हो हो हो”।

यों ही, एक घोष “वन्दे मातरम्” भी है। कमांडर को “वन्दे” कहना है और कम्पनी को “मातरम्”।

इसी फ़िल्म में, एक युद्धघोष “शौर्यम् दक्षम्…” भी है। वस्तुतः ये सूक्ति फ़िल्म के लिए निर्मित की गयी है। चूँकि इस तरह की सूक्ति किसी भी सेना के अंग का घोष नहीं है।

[ जहाँ तक ज्ञात संस्कृत साहित्य का प्रश्न है, ये सूक्ति कहीं नहीं मिलेगी। ]

फ़िल्म का ये दृश्य भी वास्तविक दुनिया में घटे एक दृश्य से प्रभावित है।

वो घटना कुछ यूँ है कि कर्नल एमएन राय की शहादत पर भावुक हुयी उनकी बिटिया ने उन्हें पुष्प अर्पित करने की रस्म में, उनके रेजिमेंट का “घोष” उचारा था।

ये वही कर्नल हैं, जिनकी पत्नी ने वैवाहिक सालगिरह पर उनकी पत्थर की मूरत के साथ सेल्फ़ी ली है।

कर्नल गोरखा रेजिमेंट से थे। उनकी बिटिया ने घोष किया : “केटा नाइन जीआर को?” तब वहाँ मौजूद अन्य सैनिकों में “हो हो हो” का स्वर किया था।

वास्तविक रूप से घटे इस दृश्य को फ़िल्म में उतार लिया गया है। बस बदलाव इतना हुआ कि उस बालिका ने कहा : “शौर्यम् दक्षम्…”

तो उपस्थित सैनिकों ने कहा : “बलिदान परम धर्म:”, “बलिदान परम धर्म:”, “बलिदान परम धर्म:”।

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“शौर्यम् दक्षम्…” सूक्ति का तीसरा शब्द क्या है?

तीसरा शब्द “युद्ध” है! ये शब्द अपने आप में कई प्रश्नों को जन्म देता है।

जैसे कि ये उच्चारण “युद्धे” है? या “युद्धे:” है? अथवा “युद्धै:” है? क्या है सही उच्चारण?

सम्पूर्ण भ्रम इसके उच्चारण पर टिका हुआ है!

अव्वल तो यहाँ स्पष्ट किया जाए कि विकल्प सिर्फ़ दो हैं। या तो “युद्धे” हो सकता है, अथवा “युद्धै:” हो सकता है। “युद्धे:” जैसी शब्द-वर्तनी संस्कृत में व्याप्त ही नहीं है। समग्र विश्व के किसी शब्दकोश में नहीं मिलेगी। यदि मिलती है, तो वो टंकण त्रुटि है!

अतः केवल दो शब्दों पर अन्वेषण करना है : “युद्धे” अथवा “युद्धै:”।

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संस्कृत में प्रत्येक शब्द के “रूप” होते हैं।

“युद्ध” शब्द के रूपों में कुल तीन बार “युद्धे” आता है। और एक बार “युद्धै:”।

“युद्धे” की बात करें तो कुल तीन बार आए इस शब्द-रूप में से सिर्फ़ एक ही हमारे काम का है। चूँकि वही एकवचन में है।

शेष दोनों “युद्धे” द्विवचन में हैं। अतः “शौर्यम् दक्षम्…” में जो “युद्धे” होगा, या तो वो वर्तमान एक युद्ध के बारे में बात करेगा अथवा सभी युद्धों के बारे में।

ये तो संभव नहीं कि कोई “युद्धघोष” केवल दो युद्धों हेतु बात करे।

अतः, अब बचते हैं दो शब्द :

“युद्धे” [ सप्तमी विभक्ति एकवचन ]
“युद्धै:” [ तृतीया विभक्ति बहुवचन ]

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यदि फ़िल्म में प्रयुक्त “युद्धघोष” का रूप “शौर्यम् दक्षम् युद्धे” है, तो इसका अर्थ होगा :

“युद्ध में शौर्य और दक्षता चाहिए।”

अथवा, एक और अर्थ हो सकता है इसका!

“युद्ध पर शौर्य और दक्षता ले जाएँ।”

दूसरी ओर, यदि “युद्धघोष” का रूप “शौर्यम् दक्षम् युद्धै:” है, तो इसका अर्थ होगा :

“युद्धों ने हमें शौर्य और दक्षता को प्रदान किया है।”

या, “युद्धों से शौर्य और दक्षता मिलती है।”

अथवा, “युद्धों द्वारा शौर्य और दक्षता मिलती है।”

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तो एक बार मेरे साथ मिलकर “युद्धघोष” कीजिए :

“शौर्यम् दक्षम् युद्धै:!”

“बलिदान परम धर्म:, “बलिदान परम धर्म:, “बलिदान परम धर्म:”।

इति नमस्कारान्ते।

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