चाँद के पास जो सितारा है : लड़की को लड़का बनाने की अफगानी परम्परा

यूँ तो पूरी दुनिया में बेटा होना शान समझा जाता है, पर अफगानिस्तान के अति पिछड़े इलाके के लोगों में बेटे का क्रेज कुछ ज्यादा ही है। यहां जिन घरों में बेटा नहीं होता, उनको हेय दृष्टि से देखा जाता है। नाते रिश्तेदारों में उन्हें वांछित सम्मान नहीं मिलता। जो सच्चे दोस्त होते हैं वे अक्सर घर आकर सहानुभूति जता जाते हैं।

जिन घरों में लगातार तीन लड़कियों का आगमन हो जाता है, वे हताश होकर उन्हीं में से किसी एक की परवरिश लड़कों जैसा करने लगते हैं। लड़कों के कपड़े। लड़कों जैसे छोटे बाल। नाम भी लड़कों का रख दिया जाता है। घरों में उन्हें लड़की के नाम से ही पुकारा जाता है। स्कूल में लड़के के नाम से जाना जाता है। ये बेचारी दोहरी जिंदगी जीने लगती हैं। कहा जाता है कि ऐसा करने से घरों में लड़के का जन्म होता है। अफगान की यह परंपरा बाचा पोश कहाती है।

बाचा पोश की मुख्य वजह आर्थिक भी होती है। इस बहाने लड़कियाँ घरों से बाहर निकलने का मौका मिलता है। वे बाहर जाकर कुछ कमा कर लाती हैं। घर को आर्थिक मदद मिलती है। 10-12 साल की लड़कियाँ लड़कों के भेष में टॉफ़ी, चूइंग गम और पानी की बोतलें बेचती हैं।

घरों में अतिरिक्त आय होती है। बाचा पोश वाली लड़कियाँ अपने पिता के साथ बाहर काम करती हैं। पिता बेटे न होने का गम भूल जाते हैं। बहनों को एक भाई मिल जाता है। माँ को समाज से ताना मिलना बंद हो जाता है। लेकिन यह सब कुछेक सालों के लिए ही होता है।

बाचा पोश वाली लड़कियाँ तरुणाई आने पर फिर अपनी यथा स्थिति में लौट आतीं हैं। उन्हें पर्दे में रहना पड़ता है। आश्चर्य का विषय है कि जिन मर्दों के साथ मिलकर वे काम करती थीं, उन्हीं से अब पर्दा करना होता है। शादी करनी पड़ती है। बच्चे जनना पड़ते हैं।

वापस लौटना इतना आसान नहीं होता। वे एक सामान्य लड़की की तरह महसूस नहीं कर पातीं। उन्हें अपना वह पिछला दौर याद आता है जब वे आजाद हो, उच्चश्रृंखल हो घूमती थीं। “पंछी बनू उड़ती फिरुं “की जगह उन्हें घर की चारदिवारी में कैद होकर रह जाना पड़ता है।

समाज शास्त्री इसे मानव अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। हम किसी का थोड़े समय के लिए लिंग नहीं बदल सकते। स्त्री को पुरुष नहीं बना सकते। ऐसे में बाचा पोश वाली लड़कियों को आईडेंटिटी क्राइसिस का सामना करना पड़ता है। यह पूरी मानवता के खिलाफ है।

लेख में चित्र सितारा का है। सितारा लड़के के भेष में ईंट के भट्ठे पर अपने पिता के साथ में काम करती हैं। एक दिन में 500 ईंट बना लेती हैं। पिता कहते हैं कि यह बेटी नहीं मेरा बेटा है। सितारा बेटे के रोल में कई जनाजों को कांधा भी दे चुकी हैं।

अब उन पर तरुणाई तारी हो रही है। उन्हें अब दूसरा चोला धारण करने में बहुत डर लगता है। उन्हें घर का काम बिल्कुल नहीं आता। लड़की का चोला पहनने के लिए पिता की तरफ से भी दबाव पड़ रहा है। सितारा ने तय किया है कि वह वापस अपने पुराने चोले में नहीं जाएंगी। यदि शादी करनी भी पड़ी तो पति नाम के जीव की इतनी कुटाई करेंगी कि वह खुद ही तलाक ले लेगा।

उनके हाथ ईंट बनाते बनाते ईंट की ही तरह काफी मजबूत हो गये हैं। सितारा पिता का सम्बल बनना चाहती हैं। उन्हें छोड़कर कहीं भी नहीं जाना चाहतीं।

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