क्या हम भारत की धमनियों में नशा दौड़ता हुआ देखना चाहते हैं?

मेरे कार्यक्षेत्र में विफल राज्य (failed state) और भंगुर राज्य या राष्ट्र (fragile state) शब्दों का प्रयोग आम बात है (यूनाइटेड नेशंस में राष्ट्र का क़ानूनी नाम राज्य है)।

एक तरह से कह सकते हैं कि जब मानव शरीर में समस्या आती है तो उसका इलाज डॉक्टर करता है, जब राज्यों में समस्या आती है – जैसे कि वे टूटने के कगार पर हों(भ्रष्टाचार ने राज्य को अत्यधिक कमजोर कर दिया हो),
या राज्य में अभिजात्य वर्ग की तानाशाही नाम के फोड़े ने कब्ज़ा कर लिया हो,
या फिर राज्य की धमनियों में दौड़ने वाले खून (धन) में नकली खून मिल जाए,
या टैक्स चोरी के कारण खून की सफाई न हो, रक्तचाप (मंहगाई) सीमा पार कर जाए,
या फिर मस्तिष्क (न्यायालय, मीडिया), और दिल (धर्म और संस्कृति) पर एक परिवार या अभिजात्य वर्ग का आधिपत्य जम जाए,
या फिर राज्य की रोग प्रतिरोधक शक्ति (सैनिक) को जानबूझकर कमज़ोर किया जाए, तो उन राज्यों का ‘इलाज़’ संयुक्त राष्ट्र करता है।

मैं अपने कार्य क्षेत्र में ऐसे कई राज्यों से डील कर चुका हूं और इस समय भी ऐसे ही एक राज्य की देखभाल मेरे पास है। दुर्भाग्य से इन राज्यों का नाम मैं सार्वजनिक रूप से नहीं ले सकता क्योंकि कोई भी राष्ट्र अपने आप को विफल राज्य या नाज़ुक राज्य के रूप में कहलाना पसंद नहीं करता। कुछ तो भारत के आस-पास ही स्थित है।

अगर भारत को देखें तो स्वतंत्रता के बाद एक ही परिवार ने लॉलीपॉप के द्वारा सत्ता पर कब्जा कर लिया था। भारत की धमनियों में बहने वाला खून उन्होंने भ्रष्ट धन्ना सेठों (माल्या, रक्षा सौदों में घूस इत्यादि) को गैरकानूनी तरीके से देना शुरू कर दिया। बैंको के लोन में भ्रष्टाचार और कर चोरी से खून को दूषित किया, राष्ट्र की धमनियों, जैसे कि इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़कें, बंदरगाह, नदियां, बिजली, टॉयलेट, एयरपोर्ट, संचार, सिंचाई व्यवस्था, इन सभी का विकास नहीं होने दिया गया।

सोनिया सरकार के समय में महंगाई और वित्तीय घाटा इतना बढ़ गया था कि किसी भी समय ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर पर जा सकता था। इस खून की कमी, या तो अन्य राष्ट्रों से उधार (ईरान से लोन पर तेल लेना) लेकर या फिर वित्तीय घाटे (आमदनी से कहीं अधिक खर्च) को बढ़ा कर की गयी थी।

फिर आर्मी को कमज़ोर कर दिया गया था (दस वर्षो के शासन के दौरान एक भी हथियार नहीं खरीदना)। और तो और, आर्मी चीफ को सड़क छाप गुंडा कह कर राष्ट्र की प्रतिरक्षा के मनोबल को कमज़ोर किया गया। न्यायालय और मीडिया में कुछ गिने-चुने परिवारों ने कब्जा कर लिया और उसके द्वारा वे भारत के धर्म और संस्कृति पर चोट करने लगे।

इस परिवार ने लॉलीपॉप, स्लोगन, इमरजेंसी, तुष्टिकरण, गुंडागर्दी, चमचों के द्वारा अपने आप को सत्ता के शीर्ष पर बनाये रखा। पिता, बिटिया, नाती, बहु (सरदार जी सिर्फ कठपुतली थे) ने सत्ता पर कब्ज़ा बनाये रखा, अपने और अपने खानदान को खरबों रुपये लूटकर समृद्ध किया।

ऊपर से इस परिवार की बिटिया के पति सांसद, स्टेनो सांसद और मंत्री, यार-दोस्त सांसद और मंत्री! अब अपने परिवार के एक अन्य ‘चिराग’ को थोपने की तैयारी चल रही है। और ‘चिराग’ की बहन और किसान बहनोई सरकारी बंगले में।

एक तरह से भारत बीमारू राज्य (fragile state) बनने की तरफ अग्रसर था।

तभी प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में लोकसभा के उद्बोधन में कहा कि 55 साल के सत्‍ता भोग ने कुछ दलों के लोगों की ऐसी आदत खराब कर दी है, वो अपने आप को ऐसा शहंशाह मानते हैं और बाकियों को ऐसा निकृष्ट मानते हैं, हर व्यवस्था को निकृष्ट मानते हैं, हर किसी का अपमान करना मानों उनके स्वभाव में है।

“कांग्रेस पार्टी नहीं चाहती थी कि देश की सेना और वायुसेना मजबूत हो। मैं गंभीर आरोप लगा रहा हूँ।”

“इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पार्टी और उनकी यूपीए की सरकार का सत्ता भोग के काल में एक भी रक्षा सौदा बिना दलाली हुआ ही नहीं।”

“इस देश में चोर, लुटेरे, बदमाशों का डर खत्‍म हो गया था उसी के कारण देश बरबाद हुआ है। उनके लिए डर पैदा करने के लिए देश ने मुझे यहां बिठाया है। और इसलिए हम इस काम को आगे बढ़ाने वाले हैं।”

“लेकिन मैं देख रहा हूं कि हम मोदी की आलोचना करते-करते, बीजेपी की आलोचना करते-करते देश की बुराई करने में लग जाते हैं, इसलिए देश पीछे है।”

अंत में, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि “वह जो नशा है, वह नशा परेशानी कर रहा है।”

प्रधानमंत्री किस नशे की बात कर रहे थे? क्या किसी दल के नेता को नशेड़ी माना जाता है?

क्या हम वास्तव में भारत की धमनियों में नशा दौड़ता हुआ देखना चाहते हैं?

भारत को एक स्वास्थ्य और मज़बूत राज्य बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी पर विश्वास बनाये रखें।

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