इस सूरत में प्रधानमंत्री के रूप में किसे देखना चाहेंगे आप?

आश्चर्य पर आश्चर्य हो रहा है कि और कितना अपना चेहरा ये लोग काला करेंगे आखिर?

भाजपा प्रवक्ता डॉ संबित पात्रा ने इस देश के तथाकथित सबसे ‘सभ्य और सम्बल रखने वाले’ परिवार को बहुत ही अच्छी उपाधि दी – ‘बेल (Bail) परिवार’। यह दो शब्द ही बहुत सारी कहानियां कह जाते हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या!

इतने सारे कुकृत्य करने पर, घोटाले करने पर, बिचौलियों को बचाने पर या ‘निगल’ जाने पर, आपराधिक रिकॉर्ड रखने पर, देश की जनता के साथ धोखा करने पर, सत्य को छुपाने पर, अपराधियों का साथ देने पर, आतंकवादियों का साथ देने पर, देश के साथ और भी गद्दारी करने पर, देश के जवानों / सैनिकों को कमज़ोर रखने पर, देश के अंदर धर्मान्तरण करने वालों का साथ देने पर और कई अन्य (लिखते लिखते थक जाऊंगी लेकिन इनके कुकृत्यों की लिस्ट न ख़त्म होगी), यह सब जनता के सामने होते हुए भी जनता आखिर धोखा ‘खा’ कैसे सकती है?

और तो और, दशक दर दशक इतना सब कुछ करने पर भी लोगों को कैसे अपनी शक्ल दिखाने में ‘इन्हें’ शर्म भी नहीं आती।

आज की तारीख़ में यह आलम है कि कुछ समय पूर्व ये लोग एक दूसरे पर छींटाकशी करते थे, आज वे ही लोग एक-दूसरे का साथ देते हुए (कि तुम हमें बचाओ हम तुम्हें बचा लेंगे – ‘आगे’, एक बार सत्ता तो हाथ में आ जाए) मोदी जी को गरियाते चलते हैं।

वे भूल जाते हैं कि मोदी जी के कई बिंदुओं में से एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी था, जब 2014 के चुनावों के दौरान कहते थे – “ना मैं खाऊंगा और ना खाने दूंगा”।

उनके सरकार में आने के कुछ महीने बाद लोगों ने कहना भी शुरू कर दिया था – “कहाँ ला पाया पैसा मोदी, कहने से कुछ नहीं होता है, ये सब करना बहुत मुश्किल है” (यहाँ जैसे लोगों को बोलते सुना ठीक वैसे ही रखा है)। आज उन्हीं लोगों से पूछना चाहिए कि क्या राय है ‘अब’?

अब भी अगर लोगों को इस की किसी भी पार्टी पर विश्वास है तो इससे बड़ी बदनसीबी कुछ नहीं हो सकती।

मुझे तो ये लगता है कि आज देश की सबसे पुरानी पार्टी जो हर प्रकार से अपना वर्चस्व खो चुकी है, जिसके पास अब ठीक संख्या में सीट्स तक नहीं हैं, जो नैतिकता के आधार पर अपनी बात तक कहने में असमर्थ है, जिसके ‘कभी’ बड़ी पार्टी होने पर छोटी पार्टियां इसके साथ आती थीं – आज खुद ही दूसरों की ऊँगली पकड़ने पर मजबूर है – बैसाखियों का सहारा लेना पड़ रहा है, “वो” पार्टी मोदी जी और उनके कार्यशैली को चुनौती दे रही है?

पूरी कहानी की धुरी यहाँ है (मेरी समझ से) कि लूटे गए पैसों की कहानी आख़िरकार आज जब जनता के सामने आ रही है तो बहुत बुरा लग रहा है इन्हें, आज इन्हें अपनी इज़्ज़त मिटटी में मिलती दिख रही है। और चूँकि सही तरीके से पैसे (देश के लिए) बढ़ाना जाना नहीं सो, तकलीफ और भी है।

इतना अधिक जटिल बना रखा था सब कुछ कि आम जनता ग़र ध्यान न दे तो उसे तो समझ ही न आए। वो तो भला हो मोदी जी का जिनकी वजह से आज सोशल मीडिया इतनी सक्रिय है। नहीं तो मुझे स्मरण नहीं आता कि मोदी जी के सबसे पहले selfie (अपनी माता जी के साथ, बिलकुल 2014 चुनावों को जितने बाद) के पहले ठीक से लोग यह शब्द भी जानते होंगे, उसके बाद की कहानी तो कहना ही क्या।

इसीलिए तो कहती हूँ कि अफसोस that vote ‘fission’ is highly restricted by any voter where so many candidates are there in Mahagathbandhan with so many Prime Ministerial candidates (if, still, someone is planning to vote for this Mahagathbandhan)।

किसे देखना चाहेंगे आप प्रधानमंत्री के रूप में इस सूरत में?

जय भारत।

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